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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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आपराधिक कानून
गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी गिरफ्तार व्यक्ति को दी जानी चाहिये
28-Aug-2026
केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
डॉ. न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ की पीठ ने मुहम्मद अशफाक सी. बनाम भारत संघ और संबंधित मामलों (2026) में यह अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 22(1) के अधीन सांविधानिक सुरक्षा उपाय - गिरफ्तारी के आधारों की सूचना - का पालन निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रथम बार पेशी के प्रक्रम में किया जाना चाहिये, भले ही वह पेशी केवल पारगमन (ट्रांजिट) या ट्रांजिट रिमांड प्राप्त करने के उद्देश्य से हो, और भले ही उस मजिस्ट्रेट के पास अपराध पर अधिकारिता न हो।
मुहम्मद अशफाक सी. बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- न्यायालय स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के अधीन अपराधों के अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा दायर जमानत आवेदनों के एक समूह पर विचार कर रहा था।
- याचिकाकर्त्ताओं को दिल्ली से उन सह-अभियुक्तों द्वारा दी गई सूचना के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें स्वयं केरल से गिरफ्तार किया गया था।
- याचिकाकर्त्ताओं को ट्रांजिट वारण्ट प्राप्त करने के लिये दिल्ली के पटियाला हाउस न्यायालय के मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, और उसके बाद उन्हें केरल लाया गया और सेशन न्यायालय के समक्ष पेश किया गया।
- याचिकाकर्त्ताओं ने इस आधार पर जमानत मांगी कि दिल्ली में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किये जाने से पहले, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 और संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अधीन आवश्यक रूप से, गिरफ्तारी के कारणों की सूचना उनके रिश्तेदारों को विधिवत रूप से नहीं दी गई थी।
- अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि गिरफ्तार किये गए व्यक्तियों और उनके रिश्तेदारों को पेशी से पहले गिरफ्तारी के कारणों के बारे में सूचित कर दिया गया था, और आगे यह तर्क दिया कि जहाँ गिरफ्तारी गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के अधिकारिता से बाहर होती है, वहाँ इन प्रावधानों का तत्काल अनुपालन आवश्यक नहीं है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 22(1) और अनुच्छेद 22(2) के बीच अंतर पर:
न्यायालय ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 और 48, जो अनुच्छेद 22(1) को प्रभावी बनाती हैं, को अनुच्छेद 22(2) के अनुरूप पढ़ा जाना चाहिये। अनुच्छेद 22(1) के प्रयोजन के लिये, मजिस्ट्रेट का अधिकारिता प्राप्त मजिस्ट्रेट होना आवश्यक नहीं है, जबकि अनुच्छेद 22(2) के लिये, पेशी निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष होनी चाहिये। इसका कारण यह है कि प्रथम पेशी में गिरफ्तारी की वैधता की परीक्षा की जानी चाहिये, न कि जमानत के प्रश्न की। - अनुपालन किये जाने के प्रक्रम के संबंध में:
न्यायालय ने देखा कि अनुच्छेद 22(1) के अधीन जांच और संतुलन को निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रथम बार पेश किये जाने के समय संतुष्ट किया जाना चाहिये - जिसके पास मामले पर अधिकारिता हो भी सकती है और नहीं भी - और अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष बाद में पेश किये जाने तक स्थगित नहीं किया जाना चाहिये। - ट्रांजिट रिमांड को पुलिस अभिरक्षा के रूप में देखना:
न्यायालय ने तर्क दिया कि ट्रांजिट रिमांड भी एक रिमांड ही है, जो पुलिस अभिरक्षा में सौंपने के समान है, और किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी को वैध ठहराए बिना पुलिस अभिरक्षा में नहीं सौंपा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि इस प्रक्रम पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 को लागू न मानना अनुच्छेद 22 को ही कमजोर कर देगा। - याचिकाकर्त्ताओं के मामलों पर:
न्यायालय ने पाया कि दो याचिकाकर्त्ताओं के संबंध में, उनके रिश्तेदारों को दिल्ली में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किये जाने के बाद ही गिरफ्तारी के कारणों की सूचना दी गई थी, जिससे उनकी गिरफ्तारी अमान्य हो गई। समय को लेकर तथ्यात्मक विवाद से जुड़े तीसरे मामले में, अभियोजन पक्ष अपने पक्ष के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा, और न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के इस दावे को स्वीकार कर लिया कि उसके पिता को गिरफ्तारी के कारणों की सूचना देने में 13 घंटे की देरी हुई थी, और यह भी विधिक आवश्यकता से कम पाया गया। - न्यायालय ने तदनुसार तीनों जमानत आवेदनों को मंजूर कर लिया और याचिकाकर्त्ताओं को शर्तों के अधीन जमानत पर छोड़ दिया।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 22 क्या है?
- अनुच्छेद 22 मनमानी गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 22(1) प्रत्याभूत करता है कि गिरफ्तार किये गए किसी भी व्यक्ति को यथाशीघ्र गिरफ्तारी के कारणों की सूचना दिये बिना निरुद्ध नहीं किया जाएगा, और उसे अपनी पसंद के विधिक सलाहकार से परामर्श करने और प्रतिरक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा।
- अनुच्छेद 22(2) के अनुसार प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा समय को छोड़कर, गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना आवश्यक है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 और 48 क्या हैं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47 (गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और जमानत के अधिकार की सूचना दी जानी चाहिये) - पूर्ववर्ती धारा 50, दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुरूप है:
(1) प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति जो बिना वारण्ट के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करता है, उसे तुरंत उस अपराध का पूरा विवरण या ऐसी गिरफ्तारी के अन्य आधारों की जानकारी देगा।
(2) जहाँ कोई पुलिस अधिकारी अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को बिना वारण्ट के गिरफ्तार करता है, तो वह गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित करेगा कि वह जमानत पर छोड़े जाने का हकदार है और वह उसकी ओर से प्रतिभू की व्यवस्था कर सकता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 48 (गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति का रिश्तेदार या मित्र को गिरफ्तारी आदि की सूचना देने का दायित्व) - पूर्ववर्ती धारा 50क, दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुरूप है:
(1) इस संहिता के अधीन कोई गिरफ्तारी करने वाला प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति ऐसी गिरफ्तारी और उस स्थान के बारे में सूचना तुरंत उसके किसी रिश्तेदार, मित्र या ऐसे अन्य व्यक्तियों को देगा जिन्हें गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा ऐसी सूचना देने के उद्देश्य से प्रकट या नामित किया गया हो और साथ ही जिले के नामित पुलिस अधिकारी को भी देगा।
(2) पुलिस अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने लाए जाने के तुरंत बाद उपधारा (1) के अधीन उसके अधिकारों के बारे में सूचित करेगा।
(3) इस तथ्य की प्रविष्टि कि ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी की सूचना किसे दी गई है, पुलिस थाने में रखी जाने वाली एक पुस्तक में ऐसे प्ररूप में की जाएगी जैसा कि राज्य सरकार नियमों द्वारा निर्धारित कर सकती है।
(4) जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाता है, उसका यह कर्त्तव्य होगा कि वह स्वयं को संतुष्ट करे कि ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति के संबंध में उपधारा (2) और उपधारा (3) की आवश्यकताओं का अनुपालन किया गया है।
सिविल कानून
वादी केवल ‘वाद के स्वामी’ होने के आधार पर उचित पक्षकार को वाद में सम्मिलित किए जाने का विरोध नहीं कर सकता
28-Aug-2026
गुवाहाटी उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति मृदुल कुमार कलिता ने किमी सरदा बनाम कृष्णा शर्मा और अन्य (2026) में संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन एक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह अभिनिर्धारित किया कि वादी की आपत्ति के होते हुए भी आदेश 1 नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एक उचित पक्षकार को वाद में पक्षकार बनाया जा सकता है, और वाद के स्वामी के रूप में वादी की स्थिति ऐसे पक्षकार को पक्षकार बनाने के न्यायालय के विवेक को समाप्त नहीं करती है।
किमी सरदा बनाम कृष्णा शर्मा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता ने विवादित संपत्ति पर अपने अधिकार, स्वामित्व और हित की घोषणा, प्रतिवादियों की बेदखली और स्थायी व्यादेश की मांग करते हुए एक स्वामित्व वाद दायर किया था।
- वाद के लंबित रहने के दौरान, प्रत्यर्थी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश I नियम 10 को धारा 151 के साथ पठित करते हुए, स्वयं को प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाए जाने हेतु एक आवेदन प्रस्तुत किया।
- प्रत्यर्थी ने कहा कि उसने प्रतिवादियों में से एक से विवादित संपत्ति के ऊपर स्थित एक कमरा मासिक किराए पर लिया था, एक किराएदारी करार किया गया था, और वह उस परिसर से खुदरा बिजली के सामान की दुकान चला रहा था।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन मंजूर कर लिया और उसे पक्षकार बनाने का निदेश दिया, जिसके बाद याचिकाकर्त्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि प्रत्यर्थी एक आवश्यक पक्षकार नहीं थी और वाद का स्वामी होने के नाते, उसके पास यह विकल्प था कि वह किसे प्रतिवादी के रूप में सम्मिलित करे, और आगे यह भी कहा कि उसके और प्रत्यर्थी के बीच कोई मकान मालिक-किराएदार संबंध मौजूद नहीं था।
- प्रयर्थी ने तर्क दिया कि वह विवादित संपत्ति पर कब्जे में था और प्रभावी न्यायनिर्णय के लिये तथा मुकदमेबाजी की बहुलता से बचने के लिये उसका पक्षकार बनना आवश्यक था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- वाद के स्वामी के सिद्धांत के न्यायिक विवेक के अधीन होने के संबंध में:
न्यायालय ने माना कि वाद के स्वामी के रूप में वादी को उन व्यक्तियों को चुनने की अनुमति देने वाला सामान्य नियम, जिनके विरुद्ध वाद करना है, सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन न्यायालय के विवेकाधिकार के अधीन है, जिसके अधीन मामले के अनुसार आवश्यक या उचित पक्षकारों को पक्षकार बनाया जा सकता है। - प्रत्यर्थी की उचित पक्षकार के रूप में स्थिति:
न्यायालय ने इस बात पर कोई विवाद नहीं पाया कि प्रत्यर्थी वाद परिसर में एक कमरे पर कब्जा रखता था और वहाँ अपनी दुकान चला रहा था, और यह माना कि उसकी उपस्थिति से विचारण न्यायालय को वाद में विवादित सभी मामलों पर पूरी तरह, प्रभावी ढंग से और पर्याप्त रूप से निर्णय लेने में सहायता मिलेगी, जिससे वह एक उचित पक्षकार बन जाता है, भले ही वह एक आवश्यक पक्षकार हो या न हो। - आदेश 1 नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन विवेकाधिकार के प्रयोग पर:
न्यायालय ने माना कि प्रत्यर्थी को पक्षकार बनाने में विचारण न्यायालय द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग किसी भी दृष्टि से मनमाना नहीं प्रतीत होता। - अनुच्छेद 227 के अधीन पर्यवेक्षी अधिकारिता के दायरे पर:
न्यायालय ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग संयमपूर्वक और विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिये, और यह केवल वहीं उचित है जहाँ अधीनस्थ न्यायालय ने मनमाने ढंग से, सनकीपन से या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किये बिना अपने विवेक का प्रयोग किया हो। - विचारण न्यायालय के कारणों की वैधता पर:
न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन अपने विवेक का प्रयोग करने के लिये वैध कारण दिये थे और यह माना कि यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने के लिये अनुच्छेद 227 के अधीन असाधारण शक्तियों का आह्वान करने की आवश्यकता हो। - न्यायालय ने तदनुसार पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और वाद पर रोक लगाने वाले अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 1 नियम 10 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10 के अधीन न्यायालय को वाद की कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में, किसी पक्षकार द्वारा आवेदन करने पर या स्वयं के विवेक पर, वाद में पक्षकारों को हटाने या जोड़ने का अधिकार है, जहाँ ऐसा जोड़ना न्यायालय के लिये वाद में शामिल प्रश्नों पर प्रभावी और पूर्ण रूप से निर्णय लेने और उनका निपटारा करने के लिये आवश्यक हो।
महत्त्वपूर्ण अवधारणाएं:
- आवश्यक पक्षकार: वह पक्षकार जिसकी अनुपस्थिति में कोई प्रभावी निर्णय पारित नहीं किया जा सकता है, और जिसके बिना वाद आगे नहीं बढ़ सकता है।
- उचित पक्षकार: एक ऐसा पक्षकार जिसकी उपस्थिति मामले के गुणदोष पर निर्णय लेने के लिये आवश्यक नहीं है, लेकिन जिसकी उपस्थिति न्यायालय को विवाद के सभी मामलों पर पूर्णतः, प्रभावी ढंग से और पर्याप्त रूप से निर्णय करने में सक्षम बनाती है।
- वाद का स्वामी (Dominus Litis): वह सिद्धांत कि वादी, वाद के स्वामी के रूप में, सामान्यतः उन पक्षकारों को चुनने का अधिकार रखता है जिनके विरुद्ध अनुतोष मांगा जाता है - एक नियम जो आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन आवश्यक या उचित पक्षकारों को शामिल करने के लिये न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति के अधीन रहता है।