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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

यालय किसी व्यक्ति को आरोप विरचित न किये गए अपराध के लिये दोषसिद्ध कब कर सकता है?

 16-Sep-2026

पिंचेमालंगाकी बरेह बनाम मेघालय राज्य 

"यह तय करने के लिये कि क्या न्याय में कोई विफलता हुई हैयह परीक्षा करना सुसंगत होगा कि क्या अभियुक्त उस अपराध के मूल तत्त्वों से अवगत था जिसके लिये उसे दोषी ठहराया जा रहा है।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ नेपिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन विचारण किए गए अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 64) के अंतर्गत बलात्संग के अपराध के लिये दोषसिद्ध किया जा सकता हैभले ही उक्त धारा के अंतर्गत कोई पृथक आरोप विरचित न किया गया होक्योंकि दोनों अपराधों में समान आपराधिक कृत्य (Actus Reus) निहित था और अभियुक्त को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ था। 

पिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 3/4 के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दोषी ठहराया गया था। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सका क्योंकि अभियोजन पक्ष किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के अधीन पीड़ित की आयु का पता लगाने में असफल रहा।  
  • अपीलकर्त्ता ने इस आधार पर दोषमुक्त होने की मांग की कि पीड़िता का अवयस्क होना साबित नहीं हुआ थाऔर अलग से यह तर्क दिया कि उसे बलात्संग के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन कोई आरोप विरचित नहीं किया गया थाऔर उसे उस आरोप पर अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर नहीं दिया गया था। 
  • यह मामला अपील के जरिए उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 के अधीन बिना आरोप वाले अपराध के लिये दोषी ठहराने की शक्ति पर: 
    न्यायमूर्ति मिश्रा द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 के अधीनअपील या पुनरीक्षण न्यायालय किसी अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिये दोषी ठहरा सकता है जिसके लिये कोई आरोप विरचित नहीं किया गया थाजब तक कि ऐसा करने से न्याय में विफलता न हो। 
  • न्याय की विफलता के परीक्षण पर: 
    न्यायालय ने माना कि न्याय की विफलता हुई है या नहींयह तय करने में यह परीक्षा करना सुसंगत है कि क्या अभियुक्त उस अपराध के मूल तत्त्वों से अवगत था जिसके लिये उसे दोषी ठहराया जा रहा हैक्या उसके विरुद्ध स्थापित किये जाने वाले मुख्य तथ्यों को उसे स्पष्ट रूप से समझाया गया थाऔर क्या उसे अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर मिला था। 
  • बलात्संग और प्रवेशन लैंगिक हमले के सामान्य कृत्य के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अधीन बलात्संग के लिये कृत्य वही है जो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये हैएकमात्र अंतर पीड़िता की अवयस्कता हैऔर जहाँ बलात्संग का तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित हो चुका हैवहाँ बलात्संग का आरोप न लगाना अभियुक्त के हित में नहीं होगा। 
  • प्रवेशन लैंगिक हमले के साथ बलात्संग का समरूप अपराध होने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि चूँकि बलात्संग का अपराध प्रवेशन लैंगिक हमले के साथ समरूप हैइसलिये अभियुक्त को पहले अपराध के लिये दोषी ठहराने में कोई अंतर नहीं हैभले ही आरोप केवल दूसरे अपराध के लिये ही विरचित किये गए हों।     
  • अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर दिये जाने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि जहाँ अभियुक्त को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन लगाए गए आरोप के विरुद्ध अपनी प्रतिरक्षा करने का अवसर दिया गया हैजो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन अपराध के समान प्रकृति का हैवहाँ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन उसे दोषी ठहराने में न्याय का उल्लंघन नहीं होताभले ही औपचारिक आरोप न लगाया गया होयदि अभियोजन पक्ष पीड़ित के अवयस्क होने को साबित करने में असफल रहता है।   
  • दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) पर निर्भरता के संबंध में: 
    न्यायालय ने दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले का हवाला दियाजिसमें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302, 498-क और 304-ख के अधीन विचारण चलाए गए एक अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दोषी ठहराया गया थाजिस पर आरोप नहीं लगाया गया थाऔर दोहराया कि एक अपील या पुनरीक्षण न्यायालय किसी अभियुक्त को बिना आरोप वाले अपराध के लिये दोषी ठहरा सकता है यदि अभियुक्त को इसके मूल तत्वों की जानकारी थीउसके विरुद्ध मुख्य तथ्य स्पष्ट रूप से बताए गए थेऔर उसे अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर दिया गया था। 
  • अपील शक्तियों के दायरे पर: 
    न्यायालय ने माना कि आवश्यक आरोप विरचित करने में विचारण न्यायालय की त्रुटि से अपील न्यायालय की शक्तियां सीमित नहीं होती हैंऔर ऐसी शक्तियां निष्कर्षों और दण्ड की प्रकृति और सीमा को बदलने के लिये पर्याप्त व्यापक हैंजिसमें कोई भी संशोधन या परिणामी आदेश देना शामिल है जो न्यायसंगत हो सकता है। 
  • उपरोक्त को ध्यान में रखते हुएअपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गयाजिसमें अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन संशोधित किया गयासाथ ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन उसकी दोषसिद्धि और दण्ड को बरकरार रखा गया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 510, जो पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 के अनुरूप है और उसका स्थान लेती हैदोषसिद्धि और दण्ड को केवल आरोप विरचित करने में त्रुटिलोप या अनियमितता के कारण स्वतः अमान्य होने से बचाती है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 के प्रमुख उपबंध: 

  • साधारण नियम (उपधारा 1):किसी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित कोई भी निर्णयदंडादेश या आदेश केवल इसलिये अमान्य नहीं माना जाएगा कि कोई आरोप निर्धारित नहीं किया गया थाया आरोप में कोई त्रुटिलोप या अनियमितता (आरोपों का कुसंयोजन सहित) थीजब तक कि अपीलपुष्टिकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की यह राय न हो कि वास्तव में न्याय में विफलता हुई है। 
  • न्याय में विफलता पाए जाने पर उपचारात्मक शक्तियां (उपधारा 2):जहाँ अपीलपुष्टि या पुनरीक्षण न्यायालय यह पाता है कि वास्तव में न्याय में विफलता हुई हैतो वह — 
    • यदि विफलता आरोप विरचित करने में लोप के कारण हुई होतो आरोप विरचित करने और आरोप विरचित होने के तुरंत बाद से विचारण को पुनः प्रारंभ करने का आदेश देनाया 
    • यदि विफलता आरोप में किसी त्रुटिलोप या अनियमितता के कारण हुई होतो वह किसी भी उपयुक्त तरीके से विरचित किये गए आरोप पर नए सिरे से विचारण का निदेश दे सकता है। 
  • परंतुक — अनिवार्य रूप से दोषसिद्धि रद्द करना:यदि न्यायालय यह पाता है कि साबित तथ्यों के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध कोई वैध आरोप नहीं बनता हैतो उसे पुनर्विचार का आदेश देने के बजाय दोषसिद्धि को रद्द करना होगा। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 के बीच तुलना: 

पहलू 

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 

उपबंध संख्या 

धारा 464 

धारा 510 

न्याय की विफलता” की कसौटी 

आरोप के अभाव या आरोप में त्रुटि के कारण कोई निष्कर्षदंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगाजब तक कि उसके परिणामस्वरूप न्याय की विफलता कारित न हुई हो। 

समान शब्दों में यथावत् रखा गया है। 

आरोप विरचित न किये जाने पर शक्ति 

न्यायालय आरोप विरचित किये जाने का आदेश दे सकता हैतत्पश्चात् विचारण उसी बिंदु से पुनः प्रारंभ होगा। 

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

आरोप में त्रुटि/अनियमितता होने पर शक्ति 

न्यायालय अपने विवेकानुसार विरचित आरोप के आधार पर नए विचारण का निदेश दे सकता है। 

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

दोषसिद्धि निरस्त करने संबंधी परंतुक 

यदि साबित किये गए तथ्यों के आधार पर कोई वैध आरोप विरचित नहीं किया जा सकतातो दोषसिद्धि निरस्त की जानी होगी।  

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

सारभूत परिवर्तन  

 

कोई नहींभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के पुनर्संरचनात्मक क्रम में केवल उपबंध की संख्या बदली गई है तथा इसके पाठविस्तार या विधिक प्रभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। 

पूर्व निर्णयों की निरंतर प्रयोज्यता 

सहजात/लघुतर ऐसे अपराधों के लिए दोषसिद्धि को नियंत्रित करता थाजिनके संबंध में आरोप विरचित नहीं किया गया था (उदाहरण के लियेदलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य)। 

धारा 464 के अधीन दिये गए पूर्व निर्णय लागू होते रहेंगेजैसा कि पिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) में पुनः प्रतिपादित किया गया है। 


सांविधानिक विधि

रोगी द्वारा प्राधिकृत किये जाने पर, आपातकालीन स्थिति में समलैंगिक साथी चिकित्सीय निर्णय ले सकते हैं

 16-Sep-2026

अर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ एवं अन्य 

"किसी व्यक्ति को केवल उसके साथी के लिंगलैंगिक पहचान या लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर या इसलिये कि उनका संबंध विवाह की पारंपरिक समझ के दायरे में नहीं आता हैउसे बाहर करने का कोई चिकित्सीय या नैतिक औचित्य नहीं है।" 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के समक्षकेंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) नेअर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामलेमें यह तर्क दिया है कि एक सक्षम वयस्क को अपने साथी को नामित करने की अनुमति दी जानी चाहियेजिसमें गैर-विषमलिंगी या समलैंगिक संबंध में साथी भी शामिल हैजिससे यदि वे बाद में अक्षम हो जाते हैं तो उनकी ओर से चिकित्सा संबंधी निर्णय लिये जा सकें।  

अर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अर्शिया टक्कर द्वारा यह याचिका दायर की गई थीजिसमें रोगी के गैर-विषमलिंगी साथी को उनके चिकित्सा प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने के लिये दिशानिर्देश तैयार करने की मांग की गई थीजिन्हें चिकित्सा स्थितियों में सहमति देने का अधिकार हो। 
  • विकल्प के तौर परयाचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि किसी मरीज द्वारा अपने गैर-विषमलिंगी साथी को पहले से दी गई मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नीचिकित्सा उपचार या आपात स्थिति के दौरान ऐसे साथी को विधिवत रूप से गठित चिकित्सा प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने की अनुमति देने के लिये पर्याप्त होनी चाहिये 
  • याचिकाकर्त्ता ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् विनियम, 2002 का खंड 7.16 पर विश्वास कियाजो चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिये "पति या पत्नीअवयस्क के मामले में माता-पिता या संरक्षकया स्वयं रोगी" से सहमति अनिवार्य करता हैऔर तर्क दिया कि समलैंगिक संबंधों में भागीदारों की स्पष्ट मान्यता का अभाव उसे अपने साथी के लिये महत्त्वपूर्ण चिकित्सा निर्णय लेने में प्रभावी रूप से शक्तिहीन बना देता है - एक ऐसा अधिकार जो विषमलैंगिक जोड़ों को आसानी से उपलब्ध है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने नवतेज जोहर बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 15 के अधीन लिंग के आधार पर "व्यवस्थित बहिष्कार" और विभेद का गठन करता हैजिसमें लैंगिक अभिविन्यास को "लिंग" के अर्थ के अंतर्गत शामिल किया गया हैऔर आगे तर्क दिया कि यह बहिष्कार अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। 
  • पिछले महीनेन्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केंद्र से मौखिक रूप से प्रश्न किया था कि यदि समलैंगिक भागीदारों को संबंध और सहवास का अधिकार हैतो उन्हें एक-दूसरे के लिये चिकित्सा सहमति देने के विकल्प से क्यों वंचित किया जाना चाहिये 

केंद्र ने न्यायालय के समक्ष क्या प्रस्तुत किया है? 

  • विद्यमान ढाँचे के भीतर अनुतोष को समायोजित करने के संबंध में:केंद्र ने प्रस्तुत किया कि याचिका में मांगा गया अनुतोष लागू विधि और उचित सुरक्षा उपायों के अधीनविद्यमान विधि और नैतिक ढाँचे के भीतर पर्याप्त रूप से समायोजित किया जा सकता हैं। 
  • LGBTQIA+ समुदाय को सांविधानिक गारंटी का सम्मान करने के संबंध में:केंद्र ने कहा कि वह गरिमानिजतास्वायत्ततासमानता तथा व्यक्तिगत चयन से संबंधित उन सांविधानिक गारंटी को मान्यता देता है और उनका सम्मान करता हैजो LGBTQIA+ समुदाय के सदस्यों सहित सभी व्यक्तियों को उपलब्ध हैं। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा प्रस्तुत उत्तर का उद्देश्य क्वीर संबंधों (Queer Relationships) में रहने वाले व्यक्तियों को उपलब्ध सांविधानिक संरक्षण पर प्रश्न उठाना नहीं था। 
  • लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर बहिष्कार के औचित्य के अभाव पर:केंद्र ने प्रस्तुत किया कि जहाँ एक सक्षम वयस्क ने अक्षमता की स्थिति में अपनी ओर से कार्य करने के लिये अपने साथी को नामित या अन्यथा अधिकृत किया हैवहाँ केवल भागीदारों के लिंगलैंगिक पहचान या लैंगिक अभिविन्यास के कारणया इसलिये कि उनका संबंध विवाह की पारंपरिक समझ के अंतर्गत नहीं आता हैऐसे व्यक्ति को बाहर करने का कोई चिकित्सा या नैतिक औचित्य नहीं है। 
  • देखरेख संबंधी संबंधों का वैवाहिक या रक्त संबंधों तक सीमित न होना:केंद्र ने पाया कि प्रशासनिक उपाय पहले से ही इस बात की निरंतर मान्यता दर्शाते हैं कि देखरेखनिर्भरता और पारस्परिक जिम्मेदारी के संबंध औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त वैवाहिक या रक्त संबंधों तक ही सीमित नहीं हैंऔर किसी सक्षम वयस्क को चिकित्सा संबंधी निर्णय लेने के लिये एक समलैंगिक साथी को नामित करने की अनुमति देना उसी सिद्धांत का एक तार्किक और उपयुक्त विस्तार होगा। 
  • IMC विनियम, 2002 के खंड 7.16 की व्याख्या के संबंध में:केंद्र ने प्रस्तुत किया कि खंड 7.16 की व्याख्या विद्यमान विधिक ढाँचे के साथ सामंजस्यपूर्ण एवं उद्देश्यपरक रूप से की जानी चाहियेजिससे किसी सक्षम वयस्क रोगी द्वारा विधिवत् नामित या प्राधिकृत साथी को केवल लिंगजेंडरलैंगिक अभिविन्यास अथवा औपचारिक रूप से मान्य वैवाहिक संबंध के अभाव के आधार पर अपवर्जित न किया जाए। 
  • पूर्व नामांकन के अभाव में स्थिति के संबंध में:केंद्र ने प्रस्तुत किया कि पूर्व नामांकन के अभाव मेंउचित परिस्थितियों में और लागू विधिसत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन रहते हुएचिकित्सा संबंधी निर्णय लेने के प्रयोजनों के लिये साथी को भी देखरेख के रिश्ते में व्यक्ति या निकटतम मित्र के रूप में माना जा सकता है। 
  • सांविधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के संबंध में:केंद्र ने प्रस्तुत किया कि इस प्रकार का निर्वचनरोगी की सुरक्षा और उचित प्रक्रिया को बनाए रखते हुएस्वायत्ततागरिमासमता और गैर-भेदभाव के सांविधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाएगी। 
    • केंद्र सरकार ने आग्रह किया कि याचिकाकर्त्ता की प्रार्थनाओं की परीक्षा विद्यमान वैधानिक प्रावधानोंन्यायिक निर्णयों और सरकारी नीतिगत उपायों के आलोक में की जाएक्योंकि चिकित्सा संबंधी निर्णय अंततः उपचार की प्रकृतिपरिस्थितियोंरोगी की इच्छाओं और लागू विधिक ढाँचे पर निर्भर करते हैं। यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है। 

LGBTQIA+ क्या है? 

बारे में: 

  • LGBTQIA+ एक संक्षिप्ताक्षर (Acronym) हैजो समलैंगिक महिला (Lesbian), समलैंगिक पुरुष (Gay), उभयलिंगी (Bisexual), ट्रांसजेंडर (Transgender), क्वियर (Queer), इंटरसेक्स (Intersex) तथा अलैंगिक (Asexual) व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है 
  • "+" उन अनेक अन्य पहचानों का प्रतिनिधित्व करता है जिनकी अभी भी खोज और समझ की जा रही हैयह संक्षिप्त रूप लगातार विकसित हो रहा है और इसमें गैर-बाइनरी (non-binary) और पैनसेक्सुअल (Pansexual) जैसे शब्द शामिल हो सकते हैं। 
  • "क्वीर (Queer)" शब्द के बारे में: "क्वीर" शब्दजिसका प्रयोग अब एक समावेशी और आत्म-पहचान बताने वाले लेबल के रूप में किया जाता हैपहले उन लोगों के विरुद्ध एक अपमानजनक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता था जो विषमलिंगी या सिसजेंडर मानदंडों के अनुरूप नहीं थे। बाद में इस समुदाय ने इसे गर्व और आत्म-पहचान के प्रतीक के रूप में अपनाया और आज इसका प्रयोग एक व्यापक शब्द के रूप में किया जाता है जो उन सभी व्यक्तियों को शामिल करता है जिनकी लैंगिक अभिवृतिलिंग पहचान या लिंग अभिव्यक्ति पारंपरिक विषमलिंगी या द्विलिंगी मानदंडों से बाहर आती है - जिनमें समलैंगिकगेउभयलिंगीट्रांसजेंडर या गैर-द्विलिंगी के रूप में पहचान करने वाले लोग शामिल हैंलेकिन इन्हीं तक सीमित नहीं हैं। 

भारत में LGBTQIA+ समुदाय की मान्यता का इतिहास: 

औपनिवेशिक युग और कलंक (1990 के दशक से पूर्व): 

  • 1861:ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 लागू की गईजिसमें "प्रकृति के विरुद्ध लैंगिक संबंध" को अपराध घोषित किया गया और यह भारत में LGBTQIA+ अधिकारों के लिये एक बड़ी बाधा बन गई। 

प्रारंभिक पहचान और सक्रियता (1990 का दशक): 

  • 1981:प्रथम अखिल भारतीय हिजड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। 
  • 1991:एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन (ABVA) ने भारत में LGBTQIA+ लोगों की स्थिति पर पहली सार्वजनिक रिपोर्ट "लेस दैन गे" प्रकाशित की, जिसमें विधिक परिवर्तन की मांग की गई।  

महत्त्वपूर्ण मामले और असफलताएँ (2000 का दशक): 

  • 2001:नाज़ फाउंडेशन ने धारा 377 को चुनौती देते हुए एक लोकहित याचिका (PIL) दायर की। 
  • 2009:दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाज़ फाउंडेशन बनाम दिल्ली सरकार के मामले में सहमति से किये गए समलैंगिक कृत्यों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दियाजिसे LGBTQIA+ अधिकारों के लिये एक बड़ी जीत के रूप में देखा गया। 
  • 2013:उच्चतम न्यायालय ने एक अप्रत्याशित निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया और धारा 377 को बरकरार रखा। 

हालिया प्रगति और जारी संघर्ष (2010 का दशक - वर्तमान): 

  • 2014:राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (NALSA निर्णय) मामले में उच्चतम न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को "तीसरे लिंग" के रूप में मान्यता दी। 
  • 2018:उच्चतम न्यायालय ने नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ के मामले में धारा 377 को निरस्त कर दियाजिससे सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। 
  • 2019:ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 पारित किया गयाजो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को विधिक मान्यता प्रदान करता है और उनके विरुद्ध विभेद को प्रतिबंधित करता है। 
  • 2020:उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने समलैंगिक जोड़ों के लिव-इन संबंधों को विधिक संरक्षण प्रदान करने की मान्यता दी। 
  • 2021:अंजली गुरु संजना जान बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले मेंबॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि याचिकाकर्त्ताएक ट्रांसजेंडर महिलाजिसका ग्राम पंचायत चुनाव आवेदन (महिला उम्मीदवार के रूप में दायर किया गया) खारिज कर दिया गया थाको अपने लिंग की पहचान स्वयं करने का अधिकार थाऔर उसके आवेदन को स्वीकार करता है। 
  • 2022:अगस्त 2022 मेंउच्चतम न्यायालय ने "परिवार" की परिभाषा का विस्तार करते हुए उसमें समलैंगिक जोड़ों और क्वीर संबंधों को शामिल किया। 
  • 2023:अक्टूबर 2023 मेंउच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने भारत में समलैंगिक विवाह को वैध बनाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दियायह मानते हुए कि उसके पास समलैंगिक जोड़ों को शामिल करने के लिये प्रावधानों को जोड़ने या हटाने के द्वारा विशेष विवाह अधिनियम, 1954 को संशोधित करने का अधिकार नहीं हैऔर यह स्पष्ट किया कि ऐसी विधियों को अधिनियमित करने का उत्तरदायित्व संसद और राज्य विधानसभाओं का है।