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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 छद्म रूप से द्वितीय पुनरीक्षण के रूप में प्रयुक्त नहीं की जा सकती

 29-Sep-2026

रामपाल और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य 

"जब सेशन न्यायालय पुनरीक्षण अधिकारिता के माध्यम से किसी आदेश की सत्यता का परीक्षण कर चुका हो... तो धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दायर याचिका वस्तुतः एक छद्म द्वितीय पुनरीक्षण याचिका में परिवर्तित हो जाती है, जो प्रक्रिया संहिता (BNSS) के अधीन शाब्दिक और भावना दोनों ही दृष्टि से निषिद्ध है।" 

न्यायमूर्ति सुमीत गोयल 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने रामपाल और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ सेशन न्यायालय पुनरीक्षण आदेश की पहले ही परीक्षा कर चुका है, वहाँ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय के समक्ष आगे की चुनौती "अत्यंत सीमित दायरे" में ही संभव है। न्यायालय ने उपखंड मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें रिसीवर को कैथल जिले में लगभग 514 कनाल भूमि एक समाधि को सौंपने का निदेश दिया गया था। 

रामपाल एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद कैथल जिले के गोहाना गाँव में स्थित लगभग 514 कनाल 6 मरला भूमि से संबंधित था। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने 6 जून 1970 को रजिस्ट्रीकृत पट्टा विलेख के अधीन अपने अधिकारों का दावा किया, जिसे समाध बाबा निहाल गिर के मोहतमिम द्वारा 99 वर्षों (1971 से 2070) के लिये 60,000 रुपए में निष्पादित किया गया था। उन्होंने निरंतर खेती के कब्जे को स्थापित करने के लिये 1972 के उत्परिवर्तन और बाद के जमाबंदी (अधिकार अभिलेख) और खसरा गिरदावरी (कब्जा अभिलेख) पर विश्वास किया। 
  • याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार, उन्हें 2008 में पता चला कि गिरदावरी प्रविष्टियों में समाध के पक्ष में परिवर्तन किया गया था। प्रथम वर्ग के सहायक कलेक्टर ने उनके पक्ष में प्रविष्टियों को सही किया, लेकिन अपील पर मामला वापस भेज दिया गया और अभी भी लंबित है। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थियों ने 18.05.2015 को जबरन कब्जा लेने का प्रयास किया, जिसके बाद उन्होंने व्यादेश के लिये सिविल वाद दायर किया। इसके बाद निजी प्रत्यर्थियों ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 और 146 के अधीन कार्यवाही शुरू की।  
  • 01.06.2015 को कैथल के SDM ने भूमि को अटैच कर लिया और नायब तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया। 11.12.2017 को अपर सेशन न्यायाधीश ने इस आदेश को अपास्त कर दिया क्योंकि मजिस्ट्रेट ने धारा 145 के अधीन अपेक्षित संतुष्टि दर्ज नहीं की थी। 
  • निजी प्रत्यर्थियों द्वारा एक नए आवेदन पर, SDM ने दिनांक 04.01.2018 के आदेश द्वारा रिसीवर को निदेश दिया कि वह समाध बाबा निहाल गिर को उसके महंत के माध्यम से कब्जा सौंप दे। 
  • कैथल के अपर सेशन न्यायाधीश ने 26.07.2024 को याचिकाकर्त्ताओं की पुनरीक्षण याचिका को यह देखते हुए खारिज कर दिया कि उनका सिविल वाद 29.08.2015 को, उनकी प्रथम अपील 10.01.2023 को खारिज कर दी गई थी, और एक नियमित द्वितीय अपील उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी। 
  • इसके बाद याचिकाकर्त्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिया की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया। 

पक्षकारों के तर्क: 

  • याचिकाकर्त्ता ओं ने तर्क दिया कि SDM पट्टा विलेख, राजस्व प्रविष्टियों और राजस्व अधिकारियों की उन रिपोर्टों पर ठीक से विचार करने में असफल रहे हैं जो निरंतर कब्जे को दर्शाती हैं। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि एक बार जब 2015 के कुर्की आदेश को अपास्त कर दिया गया था, तो कब्जे की सुपुर्दगी का निदेश देने वाला बाद का आदेश अस्थिर था, और 2070 तक चलने वाले मौजूदा पट्टे के अधीन उनके अधिकारों को धारा 145 और 146 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्यवाही के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता था। 
  • राज्य ने यह तर्क दिया कि विवाद मूलतः निजी प्रकृति का था। 
  • निजी प्रत्यर्थियों ने तर्क दिया कि SDM के आदेश में कोई अवैधता या धिकारित संबंधी त्रुटि नहीं थी, कि सिविल न्यायालय पहले ही याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध विवाद का निर्णय कर चुका था, और पुनरीक्षण न्यायालय ने राजस्व अभिलेख और सिविल न्यायालय के निर्णय पर विधिवत विचार किया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के दायरे पर: 

  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिये, केवल न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये ही किया जाना चाहिये। 
  • इसने दो प्रकार की चुनौतियों के बीच अंतर स्पष्ट किया। 
  • जब प्रथम दृष्ट्या न्यायालय या प्राधिकरण के किसी आदेश के विरुद्ध सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जाती है, तो उच्च न्यायालय के पास विकृति या अवैधता की परीक्षा करने के लिये व्यापक दायरा होता है। वहीं, जब सेशन न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण में पारित किसी आदेश को चुनौती दी जाती है, तो उच्च न्यायालय की जांच का दायरा कहीं अधिक सीमित होता है। 

धारा 528 को एक छद्म द्वितीय पुनरीक्षण के रूप में: 

  • न्यायालय ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकारिता स्वयं स्पष्ट अवैधता, प्रक्रियात्मक अनुचितता, अधिकारिता संबंधी त्रुटि और न्याय के स्पष्ट उल्लंघन तक ही सीमित है। 
  • अतः, पुनरीक्षण आदेश के विरुद्ध धारा 528 के अंतर्गत दी गई कोई भी चुनौती प्रभावी रूप से एक परोक्ष पुनरीक्षण बन जाती है, जिस पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता द्वारा वर्जित है। 
  • न्यायालय ने कहा: "परिणामस्वरूप, ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप करने के लिये याचिकाकर्त्ता पर न्याय की घोर विफलता या अधिकारिता संबंधी स्पष्ट दोष को साबित करने का अत्यधिक भार होता है।" 

तथ्यों के विवादित प्रश्नों पर: 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि यह प्रतिबंध उस स्थिति में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है जहाँ विवाद कब्जे, स्वामित्व और पट्टा विलेख के विधिक प्रभाव के जटिल और विवादास्पद प्रश्नों पर आधारित होता है, जो "संक्षिप्त कार्यवाही के लिये अनुपयुक्त" होते हैं। 

लंबित सिविल कार्यवाही के संबंध में: 

  • न्यायालय ने कहा कि विवाद अब केवल राजस्व अभिलेख तक सीमित नहीं रह गया है। याचिकाकर्त्ताओं का सिविल वाद और प्रथम अपील दोनों खारिज हो चुकी हैं, और द्वितीय अपील लंबित है। याचिकाकर्त्ता निरस्त करने की याचिका के माध्यम से पक्षकारों के अधिकारों का पूर्ण पुनर्निर्णय नहीं मांग सकते। 

वर्ष 2017 के पूर्ववर्ती आदेश और पट्टा विलेख पर: 

  • न्यायालय ने माना कि ASJ का 11.12.2017 का आदेश याचिकाकर्त्ताओं के लिये सहायक नहीं था, क्योंकि यह उस समय विद्यमान सामग्री और परिस्थितियों पर आधारित था। न्यायालय ने यह भी माना कि इस स्तर पर रजिस्ट्रीकृत पट्टा विलेख को कब्जे का निश्चायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता। 

पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश पर: 

  • न्यायालय ने पाया कि पुनरीक्षण न्यायालय ने याचिका को निरर्थक रूप से खारिज नहीं किया था, अपितु सिविल और राजस्व कार्यवाही सहित बाद के घटनाक्रमों पर विचार किया था। याचिकाकर्त्ता यह साबित करने में असफल रहे कि यह तर्क गलत था या किसी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज या सांविधिक उपबंध की अनदेखी की गई थी। 

निष्कर्ष: 

  • कोई असाधारण परिस्थिति न पाते हुए, जिसके कारण हस्तक्षेप उचित हो, न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां किसी भी सिविल, राजस्व या अपील मंच के समक्ष लंबित पक्षकारों के किसी भी मौलिक अधिकार या दावे पर राय की अभिव्यक्ति नहीं थीं। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सुरक्षित रखती है। यह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 के अनुरूप है। 
  • यह उपबंध कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करता; यह उच्च न्यायालय को एक उच्च न्यायालय के रूप में निहित शक्तियों को मान्यता देता है, जिनका प्रयोग असाधारण मामलों में किया जाना है। 

उपबंध: 

धारा 528 में कहा गया है: 

  • इस संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी बनाने के लिये, या किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये, या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये आवश्यक आदेश देने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करता हो। 

वे उद्देश्य जिनके लिये अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है: 

  • संहिता के अंतर्गत किसी भी आदेश को प्रभावी बनाना। 
  • किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये। 
  • न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के लिये। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन द्वितीय पुनरीक्षण पर क्या प्रतिबंध है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 438 (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 397 के अनुरूप) उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश को किसी अधीनस्थ आपराधिक न्यायालय के किसी भी निष्कर्ष, दण्ड या आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य की परीक्षा करने के लिये समवर्ती पुनरीक्षण अधिकारिता प्रदान करती है। 

धारा 438(3): 

  • यदि इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति द्वारा उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश के समक्ष आवेदन किया गया है, तो उसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई और आवेदन उनमें से किसी एक द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा। 
  • यह खंड एक ही व्यक्ति द्वारा द्वितीय बार पुनरीक्षण याचिका दायर करने को वर्जित करता है। न्यायालयों ने सर्वसम्मत रूप से यह माना है कि प्रक्रिया के दुरुपयोग या न्याय के उल्लंघन से जुड़े असाधारण मामलों को छोड़कर, उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग इस रोक को दरकिनार करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 

सिविल कानून

निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में भी हुक्का सेवा वर्जित है

 29-Sep-2026

X बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रत्याभूत एक मौलिक अधिकार है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(छ) के अधीन व्यापार का अधिकार रखने वाले प्रतिष्ठान के वाणिज्यिक हित द्वारा कम नहीं किया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर निर्णय लेते हुए निर्णय दिया कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार का संचालन और रेस्तरां द्वारा हुक्का सेवाएं प्रदान करना, यहाँ तक ​​कि निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र के भीतर भी, निषिद्ध है।  

  • न्यायालय ने माना कि ऐसी गतिविधि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियम, 2008 (2017 में संशोधित) के नियम 4(3) का उल्लंघन करती है, जिसे सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA) के साथ पढ़ा जाता है। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • उत्तर प्रदेश भर में हुक्का बार के संचालन और रेस्तरां में हुक्का सेवाएं प्रदान करने के संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष कई संबंधित याचिकाएं दायर की गईं। 
  • न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह नहीं था कि हुक्का के माध्यम से तंबाकू पीना अपने आप में निषिद्ध है या नहीं। मुद्दा यह था कि क्या रेस्तरां और इसी प्रकार के प्रतिष्ठान निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र के भीतर ग्राहकों को हुक्का सेवा प्रदान कर सकते हैं। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने हुक्का सेवाओं को जारी रखने के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किये: 
    • सबसे पहले, यह तर्क दिया गया कि नामित धूम्रपान क्षेत्र के भीतर हुक्का सेवा की अनुमति है, इसके लिये उच्चतम न्यायालय के नरिंदर एस. चड्ढा बनाम बृहन्मुंबई नगर निगम (2014) के निर्णय पर विश्वास किया गया। 
    • दूसरा, रेस्तरां "स्व-सेवा" मॉडल अपना सकते हैं, जिसके अधीन हुक्का तैयार करके ग्राहक को सौंप दिया जाएगा, और फिर ग्राहक बिना किसी सहायता के उसका सेवन कर सकेगा। 
    • तीसरा, हुक्का उपकरण की आपूर्ति करना सेवा प्रदान करने के बजाय उपकरण किराए पर देने के समान था। 
    • चौथा, खाद्य सुरक्षा विभाग और नगर निगम के पास हुक्का बार के लिये लाइसेंस देने या विनियमित करने की अधिकारिता नहीं थी, और पुलिस के पास सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) के अधीन प्रवर्तन शक्तियां नहीं थीं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) योजना और निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों पर:  

  • न्यायालय ने पाया कि सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) के अधीन सामान्य नियम सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध है, और निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र उस सामान्य प्रतिबंध से अलग बनाया गया एक अपवाद मात्र है। 
  • जबकि निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र किसी व्यक्ति को धूम्रपान करने की अनुमति देता है, यह किसी रेस्तरां को हुक्का सेवा के रूप में प्रदान करने की अनुमति नहीं देता है, क्योंकि संशोधित नियम 4 (3) धूम्रपान क्षेत्र में किसी भी सेवा को प्रतिबंधित करता है। 

2017 के संशोधन के प्रभाव और नरिंदर एस. चड्ढा पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि संशोधन से पहले के नियम 4(3) के अनुसार धूम्रपान क्षेत्र का उपयोग केवल धूम्रपान के लिये ही किया जाना था, और "कोई अन्य सेवा" की अनुमति नहीं थी। इस भाषा की व्याख्या करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने नरिंदर एस. चड्ढा मामले में धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का परोसने की अनुमति अप्रत्यक्ष रूप से दे दी थी, जबकि भोजन और अन्य वस्तुओं की सेवा पर प्रतिबंध लगा दिया था। 
  • यद्यपि , 2017 में केंद्र सरकार ने नियम 4(3) को प्रतिस्थापित करते हुए यह उपबंधित किया कि "धूम्रपान क्षेत्र या धूम्रपान के लिये उपलब्ध कराए गए किसी भी स्थान में कोई सेवा की अनुमति नहीं होगी।" 
  • उच्च न्यायालय ने भाषा में इस परिवर्तन को महत्त्वपूर्ण माना। न्यायालय ने कहा कि नरिंदर एस. चड्ढा को पूर्ववर्ती सांविधिक पाठ के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिये, और संशोधित नियम 4(3) अब निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र के भीतर भी हुक्का सेवा प्रदान करने पर रोक लगाता है। 

स्व-सेवा मॉडल पर: 

  • न्यायालय ने स्व-सेवा के तर्क को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि हुक्का तैयार करने में कई चरण शामिल होते हैं, जिनमें उपकरण को जोड़ना, कटोरे में तंबाकू डालना, तल को पानी से भरना, पन्नी तैयार करना और गर्म कोयला रखना शामिल है, जिनके लिये विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। 
  • न्यायालय ने कहा: "याचिकाकर्त्ताओं द्वारा सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) और संशोधित नियमों के शिकंजे से बचने के लिये काल्पनिक रूप से संश्लेषित स्व-सेवा मॉडल एक व्यवहार्य मॉडल नहीं है, क्योंकि हुक्का के संचालन की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से 'सेवा' शामिल होती है, जिसे इसमें विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिये और यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे अप्रशिक्षित और नौसिखिए ग्राहक कर सकें।" 

हुक्का को किराए पर देने के बजाय सेवा के रूप में देना: 

  • न्यायालय ने इस व्यवस्था को सामान्य किराए से अलग बताया, जिसमें संपत्ति का कब्ज़ा और नियंत्रण ग्राहक को हस्तांतरित हो जाता है। यहाँ, ग्राहक को निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र के भीतर ही रहना होता है और वहीं हुक्का पीना होता है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की: "निर्दिष्ट धूम्रपान क्षेत्र के अंदर ग्राहक द्वारा हुक्का का अनिवार्य सेवन इस तथ्य को पूरी तरह से स्पष्ट करता है कि उसे केवल एक 'सेवा' प्रदान की जा रही है।" 
  • सामान्यतः आवश्यक निरंतर सहायता, जैसे कि कोयला भरना, राख हटाना और तंबाकू बदलना, को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने माना कि शुल्क लेकर हुक्का तैयार करना, असेंबल करना, वितरित करना, जलाना, ईंधन भरना और उसकी देखरेख करना एक प्रकार की सेवा प्रदान करने के समान है। 
  • इसमें इस बात पर बल दिया गया कि संव्यवहार का सार ही निर्णायक होता है, न कि प्रतिष्ठान द्वारा अपनाया गया नाम। 

अनुच्छेद 21 और 19(1)(छ) पर: 

  • न्यायालय ने माना कि सार्वजनिक स्थान पर स्वच्छ हवा में सांस लेने का धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति का अधिकार अनुच्छेद 21 के अधीन एक मौलिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(छ) के अधीन व्यापार करने के अधिकार का दावा करने वाले प्रतिष्ठान के वाणिज्यिक हितों द्वारा कम नहीं किया जा सकता है। 

लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के बारे में: 

  • न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं की इस अभिवचन को स्वीकार किया कि खाद्य सुरक्षा विभाग और नगर निगम हुक्का बार के संचालन को अधिकृत करने वाले लाइसेंस जारी नहीं कर सकते। खाद्य सुरक्षा ढाँचा ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है, और नगर निगम के पास ऐसा कोई सांविधिक उपबंध नहीं है जो उसे अलग से हुक्का बार लाइसेंस जारी करने का अधिकार देता हो। 

पुलिस की प्रवर्तन शक्तियों पर: 

  • न्यायालय ने पुलिस शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) की धारा 12, 13 और 15 पुलिस अधिकारियों को उचित मामलों में तलाशी, जब्ती, संपत्ति ज़ब्ती और दण्ड सहित अधिनियम को लागू करने का अधिकार देती हैं। 

राज्य विधान की आवश्यकता पर: 

  • न्यायालय ने हुक्का बार से संबंधित मुद्दों को सुलझाने और दण्ड एवं जुर्माने को बढ़ाने के लिये गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक द्वारा उठाए गए विधायी उपायों का उल्लेख किया। 
  • इसमें यह उम्मीद जताई गई कि उत्तर प्रदेश "इस अवसर पर खरा उतरेगा", जिसमें निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का परोसने के लिये कठोर दण्ड का प्रावधान करने वाली अधिसूचना पर विचार करना भी शामिल है। 
  • न्यायालय ने हुक्का पीने से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और इस गलत धारणा पर भी ध्यान दिया कि हुक्का सिगरेट की तुलना में कम हानिकारक होता है। 

निष्कर्ष: 

न्यायालय ने माना कि उत्तर प्रदेश में रेस्तरां द्वारा हुक्का बार का संचालन और हुक्का सेवाएं प्रदान करना नियम 4(3) का घोर उल्लंघन है और सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) की योजना और उद्देश्य के विपरीत है। 

संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया गया और निर्णय की एक प्रति सूचना और आवश्यक अनुपालन के लिये उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजने का निदेश दिया गया। 

सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA) क्या है? 

बारे में: 

  • सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) एक केंद्रीय विधि है जिसे सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन पर रोक लगाने और उनके व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को विनियमित करने के लिये बनाई गई है। 
  • इसका उद्देश्य लोक स्वास्थ्य की रक्षा करना है, विशेष रूप से गैर-धूम्रपान करने वालों के स्वास्थ्य को, तंबाकू के सेवन और परोक्ष रूप से फैलने वाले धुएं के हानिकारक प्रभावों से बचाना है। 

मुख्य उपबंध: 

  • धारा 4: सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध है। हालांकि, इस परंतुक के अधीन तीस या उससे अधिक कमरों वाले होटल, तीस या उससे अधिक बैठने की क्षमता वाले रेस्तरां और हवाई अड्डों को धूम्रपान क्षेत्र या स्थान के लिये अलग से व्यवस्था करने की अनुमति है। 
  • धारा 12: अधिकृत अधिकारियों को उन परिसरों में प्रवेश करने और तलाशी लेने का अधिकार देती है जहाँ उन्हें यह विश्वास करने का कारण हो कि अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा है। 
  • धारा 13: उल्लंघन के मामलों में अधिकृत अधिकारियों को तंबाकू उत्पादों और संबंधित सामग्रियों को जब्त करने का अधिकार प्रदान करती है। 
  • धारा 21: धारा 4 के उल्लंघन में सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करने पर जुर्माने का उपबंध करती है। 

सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिषेध संबंधी नियम, 2008 का नियम 4 क्या है? 

बारे में: 

  • सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिये केंद्र सरकार द्वारा सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) के अधीन ये नियम बनाए गए थे। 
  • नियम 4 होटलों, रेस्तरां और हवाई अड्डों में एक अलग धूम्रपान क्षेत्र या स्थान के प्रावधान से संबंधित है जो धारा 4 के परंतुक के अंतर्गत आते हैं, और ऐसे क्षेत्रों के लिये शर्तें निर्धारित करता है, जिसमें भौतिक पृथक्करण, पर्याप्त वेंटिलेशन और प्रवेश और निकास द्वारों से दूर स्थान शामिल हैं। 

नियम 4(3) — संशोधन से पूर्व: 

  • "धूम्रपान क्षेत्र या स्थान का उपयोग केवल धूम्रपान के उद्देश्य से किया जाएगा और किसी अन्य सेवा की अनुमति नहीं होगी।" 

नियम 4(3) — 2017 के बाद का संशोधन: 

  • धूम्रपान क्षेत्र या धूम्रपान के लिये उपलब्ध कराए गए किसी भी स्थान में कोई भी सेवा प्रदान करने की अनुमति नहीं होगी।