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आपराधिक कानून
बाल न्यायालय को किशोर के वयस्क के रूप में विचारण का स्वतंत्र रूप से आकलन करना अनिवार्य है
05-Oct-2026
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पी.एस. बनाम ओडिशा राज्य "इसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि बाल न्यायालय सांविधिक अवधारण को दरकिनार करने के लिये स्वतंत्र है..." न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा |
स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा ने पी.एस. बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले में अभिनिर्धारित किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (किशोर न्याय अधिनियम) की धारा 19(1) के अधीन, बाल न्यायालय को यह निर्णय स्वयं लेना होगा कि किसी किशोर पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाना चाहिये या नहीं। यह केवल किशोर न्याय बोर्ड (JJ Act) की रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं कर सकता। न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि और दंडादेश को अपास्त कर दिया क्योंकि विचारण न्यायालय ने इस प्रक्रम को छोड़ दिया था।
पी.एस. बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इस मामले में 5 फरवरी 2016 को FIR दर्ज की गई थी।
- इसमें आरोप लगाया गया था कि अभियुक्त-अपीलकर्त्ता, जो एक अवयस्क है, ने फरवरी 2015 और फरवरी 2016 के बीच एक अवयस्क पीड़िता के साथ बार-बार लैंगिक संबंध बनाए थे, और पीड़िता गर्भवती हो गई थी।
- यह मामला भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 450, 376(2)(i) और 376(2)(ढ) के अधीन, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act)) की धारा 6 के साथ पढ़ा गया था।
- किशोर न्याय बोर्ड (JJB) की रिपोर्ट में यह अनुशंसा की गई कि अपीलार्थी का विचारण वयस्क के रूप में किया जाना चाहिये।
- विचारण न्यायालय ने इसे स्वीकार कर लिया। उसने स्वयं इस प्रश्न का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन नहीं किया और सीधे आरोप विरचित करने के लिये आगे बढ़ गया।
- विचारण के बाद, अपीलकर्त्ता को इन आरोपों में दोषी पाया गया।
- उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील की। उन्होंने तर्क दिया कि:
- किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19(1) के अधीन बाल न्यायालय को किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के निष्कर्ष की परवाह किये बिना, स्वतंत्र रूप से यह तय करने की आवश्यकता है कि क्या किसी किशोर पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाना चाहिये।
- विचारण न्यायालय ने इस अनिवार्य चरण को छोड़ दिया और सीधे विचारण की कार्यवाही शुरू कर दी, इसलिये उसका आदेश गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण था।
- न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या इस दोष को एक ऐसी अनियमितता मानते हुए, जिसे सुधारा जा सकता है, दोषसिद्धि को बरकरार रखा जा सकता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 19(1) के अधीन विवेकाधिकार की प्रकृति पर:
- धारा 19(1) के अधीन विवेकाधिकार केवल इस बारे में है कि बाल न्यायालय द्वारा यह विचार करने के बाद कि क्या बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने की आवश्यकता है, कौन सा रास्ता अपनाया जाए।
- यह बाल न्यायालय को उस निर्णय को पूरी तरह से नजरअंदाज करने की अनुमति नहीं देता है।
- इसका अन्यथा अर्थ निकालने पर धारा 19 में दिया गया सुरक्षा उपाय अर्थहीन हो जाएगा।
- इससे दो चरणों वाली प्रक्रिया (किशोर न्याय बोर्ड (JJB), फिर बाल न्यायालय) एक ही चरण में बदल जाएगी, जिसे पूरी तरह से किशोर न्याय बोर्ड द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।
अजीत गुर्जर बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) पर निर्भरता पर:
- उच्चतम न्यायालय ने माना कि धारा 19(1)(i) के अधीन जांच एक खोखली औपचारिकता नहीं है।
- यदि बाल न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि बालक पर वयस्क के रूप में विचानर चलाने की आवश्यकता नहीं है, तो बालक को अलग व्यवहार का अधिकार है। तब उसके विरुद्ध केवल न्यायिक न्याय अधिनियम की धारा 18 के अधीन ही कार्रवाई की जा सकती है।
बरुण चंद्र ठाकुर बनाम मास्टर भोलू (2023) पर निर्भरता पर:
- उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय बोर्ड (JJB) द्वारा धारा 18(3) के अधीन किसी मामले को बाल न्यायालय में अंतरित करने के बाद भी, बाल न्यायालय को स्वयं यह परीक्षा करनी होगी कि क्या बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाना चाहिये।
अनुपालन न करने के प्रभाव पर:
- विचारण न्यायालय ने अन्यथा वैध विचारण में केवल एक त्रुटि नहीं की।
- यह सांविधिक आकलन करने में विफल रहा, जो बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने के उसकी अधिकारिता के लिये एक पूर्ववर्ती शर्त थी।
- यह विफलता विचारण की वैधता से ही संबंधित थी, इसलिये इस दोष को दूर नहीं किया जा सका।
निष्कर्ष
- न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली और अपीलकर्त्ता के विरुद्ध पारित दोषसिद्धि के निर्णय और दंडादेश के आदेश को अपास्त कर दिया।
किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19 क्या है?
बारे में:
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 19 में बाल न्यायालय की शक्तियों का उल्लेख किया गया है, जब कोई मामला किशोर न्याय बोर्ड (JJB) द्वारा उसे अंतरित किया जाता है।
- यह धारा 15 (किशोर न्याय बोर्ड (JJB) का प्रारंभिक मूल्यांकन) और धारा 18(3) (न्यायालय द्वारा विचारण को बाल न्यायालय में अंतरित करने की शक्ति) के साथ मिलकर काम करता है।
दो-चरणीय तंत्र:
- चरण 1, किशोर न्याय बोर्ड (JJB) (धारा 15):
- यह नियम तब लागू होता है जब 16 से 18 वर्ष की आयु के किसी बालक पर जघन्य अपराध करने का आरोप लगाया जाता है।
- किशोर न्याय बोर्ड (JJB) अपराध करने के लिये बालक की मानसिक और शारीरिक क्षमता, उसके परिणामों को समझने की क्षमता और उन परिस्थितियों का प्रारंभिक मूल्यांकन करता है जिनमें कथित तौर पर अपराध किया गया था।
- अंतरण (धारा 18(3)): यदि किशोर न्याय बोर्ड (JJB) को लगता है कि बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने की आवश्यकता है, तो वह विचारण को बाल न्यायालय में अंतरित करने का आदेश दे सकता है।
- चरण 2, बाल न्यायालय (धारा 19(1)): प्रारंभिक मूल्यांकन प्राप्त करने के बाद, बाल न्यायालय स्वयं दो विकल्पों में से एक का निर्णय लेता है:
- धारा 19(1)(i): बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने की आवश्यकता है। तब बाल न्यायालय विचारण चलाता है और धारा 19 और 21 के अधीन रहते हुए, बालक की विशेष आवश्यकताओं, निष्पक्ष विचारण और बाल-अनुकूल वातावरण को ध्यान में रखते हुए आदेश पारित करता है।
- धारा 19(1)(ii): बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। बाल न्यायालय तब एक बोर्ड के रूप में जांच करता है और धारा 18 के अधीन आदेश पारित करता है।
मुख्य उपबंध :
- धारा 19(2): अंतिम आदेश में बालक के पुनर्वास के लिये एक व्यक्तिगत देखरेख योजना शामिल होनी चाहिये।
- धारा 19(3): विधि का उल्लंघन करने वाला बालक 21 वर्ष की आयु तक सुरक्षित स्थान में रखा जाएगा और उसके पश्चात ही उसे जेल में अंतरित किया जाएगा।
- धारा 21: विधि का उल्लंघन करने वाले किसी बालक को मृत्युदण्ड अथवा छोड़ने की संभावना के बिना आजीवन कारावास से दण्डित नहीं किया जा सकता।
आपराधिक कानून
पहले से अभिरक्षा में रह रहे अभियुक्त की द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी है
05-Oct-2026
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मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "अभिरक्षा में रहते हुए द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी।" न्यायमूर्ति मनीष माथुर |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। उन्होंने माना कि किसी ऐसे अभियुक्त की औपचारिक गिरफ्तारी, जो पहले से ही किसी पुराने मामले में रिमांड में है, एक नई गिरफ्तारी है, इसलिये गिरफ्तारी के आधार पर सांविधानिक सुरक्षा उपाय इस पर लागू होते हैं। यद्यपि, याचिका खारिज कर दी गई, क्योंकि रिमांड को चुनौती विचारण के शुरू होने के बाद दी गई थी।
मोती राम जाट बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त को पहले से दर्ज एक FIR के सिलसिले में अभिरक्षा में लिया गया था।
- इसके बाद आतंकवाद-विरोधी दस्ता (ATS) ने एक अन्य मामले में प्रोडक्शन वारण्ट के माध्यम से उसकी पेशी की मांग की। वह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 148, 152 और 61(2) के अधीन दर्ज किया गया था।
- बाद वाले मामले में उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया और न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया।
- अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में रिमांड आदेश को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि:
- न तो उन्हें और न ही उनके परिवार के सदस्यों को उनकी गिरफ्तारी का कारण बताया गया।
- इससे अनुच्छेद 22(1) के अधीन उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है, इसलिये रिमांड आदेश को अपास्त किया जाना चाहिये।
- राज्य ने इस याचिका का विरोध किया। उसने तर्क दिया कि:
- बाद में रिमांड आदेश पारित होने के समय अभियुक्त पहले से ही अभिरक्षा में था।
- तो यह केवल अभिरक्षा में परिवर्तन था, नई गिरफ्तारी नहीं।
- इसलिये अनुच्छेद 22(1) या संबंधित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का अनुपालन करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
क्या द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी?
- न्यायालय ने धनराज अश्वानी बनाम अमर एस. मुलचंदानी के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया। उस निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि एक मामले में अभिरक्षा में लिये गए व्यक्ति को पहले मामले में अभिरक्षा में रहते हुए ही दूसरे मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके बाद, उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के लिये बंदी पारगमन (PT) वारण्ट प्राप्त किया जा सकता है।
- इस सिद्धांत को लागू करते हुए, उच्च न्यायालय ने माना कि द्वितीय गिरफ्तारी या अभिरक्षा को पिछली गिरफ्तारी की निरंतरता नहीं माना जा सकता। यह एक नई गिरफ्तारी है।
- इसलिये, बाद के किसी मामले में औपचारिक गिरफ्तारी केवल अभिरक्षा में परिवर्तन नहीं है।
अनुच्छेद 22(1) और धारा 48(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की प्रयोज्यता पर:
- चूँकि बाद की गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी है, इसलिये संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अधीन सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिये, जिसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48(2) के साथ पढ़ा जाना चाहिये।
- गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार संविधान के भाग 3 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है।
विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य के मामले पर आधारित:
- गिरफ्तारी के कारणों को इस प्रकार संप्रेषित किया जाना चाहिये जिससे गिरफ्तार व्यक्ति को उससे जुड़े बुनियादी तथ्यों की पर्याप्त जानकारी मिल सके। यह जानकारी उसे समझ में आने वाली भाषा में दी जानी चाहिये।
- यदि अभियुक्त अनुपालन पर विवाद करता है, तो अन्वेषण अधिकारी या एजेंसी को यह साबित करना होगा कि अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन किया गया था।
- अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन न करने पर गिरफ्तारी और उसके परिणामस्वरूप जारी किये गए रिमांड आदेश अमान्य हो जाते हैं।
- यद्यपि, इससे अन्वेषण, आरोप पत्र या विचारण की वैधता समाप्त नहीं होती। आरोप पत्र दाखिल करने से सांविधानिक आवश्यकता का भंग भी दूर नहीं होता।
- गिरफ्तारी के कारणों को गिरफ्तार व्यक्ति के मित्रों, रिश्तेदारों या उसके द्वारा नामित व्यक्तियों के साथ भी साझा किया जाना चाहिये, जिससे वे विधिक रूप से उचित होने पर उसकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिये त्वरित विधिक कदम उठा सकें।
जिस मंच पर इस प्रकार की चुनौती उठाई जा सकती है:
- न्यायालय ने माना कि विहान कुमार में चर्चा की गई अनुच्छेद 22(1) सुरक्षा उपाय धारा 167 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रारंभिक गिरफ्तारी और रिमांड के चरण में लागू होते हैं।
- एक बार धारा 190 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन संज्ञान ले लिया गया हो, और धारा 204 और 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता का अनुपालन कर लिया गया हो, तो उन सुरक्षा उपायों का उपयोग मूल निरोध को चुनौती देने के लिये नहीं किया जा सकता है।
- इस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका था, संज्ञान लिया जा चुका था और विचारण शुरू हो चुका था। इसलिये प्रारंभिक निरोध और रिमांड को चुनौती देने पर विचार नहीं किया जा सकता था।
निष्कर्ष
- विधिक स्थिति: किसी अन्य मामले में पहले से ही अभिरक्षा में लिये गए अभियुक्त की औपचारिक गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48(2) का अनुपालन अनिवार्य है।
- परिणाम: याचिका खारिज कर दी गई, क्योंकि गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती विचारण की शुरुआत के बाद उठाई गई थी।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(1) क्या है?
बारे में:
- अनुच्छेद 22 कुछ मामलों में गिरफ्तारी और निरोध से सुरक्षा प्रदान करता है। यह भाग 3 (मौलिक अधिकार) के अंतर्गत आता है।
- अनुच्छेद 22(1) के अधीन, गिरफ्तार किये गए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की सूचना यथाशीघ्र दिये बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं किया जा सकता।
- गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के कानूनी सलाहकार से परामर्श करने और उसके द्वारा बचाव किए जाने के अधिकार से भी वंचित नहीं किया जा सकता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 48 के अधीन गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति पर यह दायित्व है कि वह दूसरों को गिरफ्तारी और गिरफ्तार व्यक्ति को कहाँ रखा जा रहा है, इसकी जानकारी दे।
- यह उपबंध पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता (1973) की धारा 50क के अंतर्गत आता था।
- गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की सूचना देने का कर्त्तव्य स्वयं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 में निहित है। यह पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 थी।
मुख्य उपबंध:
- 48(1): गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति को गिरफ्तारी और निरोध के स्थान के बारे में जानकारी तुरंत निम्नलिखित के साथ साझा करनी होगी:
- गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा बताए गए या नामित नातेदार, मित्र या अन्य व्यक्ति, और
- जिले में नामित पुलिस अधिकारी।
- 48(2): पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने लाए जाने के तुरंत बाद इस अधिकार के बारे में सूचित करना होगा।
- 48(3): पुलिस थाने में रखी गई एक किताब में यह अभिलिखित किया जाना चाहिये कि गिरफ्तारी की सूचना किसे दी गई थी।
- 48(4): जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाता है, उसे यह जांच करनी चाहिये कि इन आवश्यकताओं का अनुपालन किया गया है।