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आपराधिक कानून
संज्ञान के चरण पर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अंतर्गत अभिलिखित कथनों पर विचार किया जा सकता है
13-Oct-2026
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मृत्युंजय कुमार चौधरी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य "दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथनों पर, निस्संदेह, विचारण के दौरान विश्वास नहीं किया जा सकता, किंतु संज्ञान लेने के प्रक्रम पर निश्चित रूप से उन पर विचार किया जा सकता है..." न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मृत्युंजय कुमार चौधरी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 161, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180 के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है, के अधीन अभिलिखित कथनों पर संज्ञान लेने के चरण पर विचार किया जा सकता है, यद्यपि विचारण के दौरान उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसके द्वारा मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने संबंधी आदेश को निरस्त किया गया था, तथा मजिस्ट्रेट के उक्त आदेश को पुनः बहाल कर दिया।
मृत्युंजय कुमार चौधरी बनाम बिहार राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता मृतक का पिता था, जिसकी मृत्यु डूबने से हुई थी।
- उन्होंने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी संख्या 2 ने मृत्यु में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
- परिस्थितिजन्य साक्ष्य काफी मजबूत थे, और गवाहों ने आरोपी को घटनास्थल से भागते हुए देखा था।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी, लेकिन अन्वेषण के बाद पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि कोई मामला नहीं बनता (क्लोजर रिपोर्ट)।
- अपीलकर्त्ता ने क्लोजर रिपोर्ट के विरुद्ध एक विरोध याचिका दायर की, जिसे परिवाद मामले के रूप में पुनः क्रमांकित किया गया।
- मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेने से इंकार कर दिया। अपीलकर्त्ता ने सेशन न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर करके इसे चुनौती दी।
- अपर सेशन न्यायाधीश ने धारा 161 के अधीन दिये गए कथनों की परीक्षा की, प्रथम दृष्टया यह पाया कि विचारण के लिये पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, और मजिस्ट्रेट को अंतिम रिपोर्ट पर नए सिरे से विचार करने का निदेश दिया।
- रिमांड पर, मजिस्ट्रेट ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 और 201 के अधीन अपराधों का संज्ञान लिया।
- पटना उच्च न्यायालय ने धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अभिलिखित किये गए कथनों पर विश्वास करते हुए संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन दिये गए कथनों के प्रयोग पर:
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन अभिलिखित किये गए कथनों पर विचारण में विश्वास नहीं किया जा सकता।
- यद्यपि, संज्ञान लेते समय इन पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि ये अंतिम रिपोर्ट के साथ पुलिस द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सामग्री का भाग हैं।
क्लोजर रिपोर्ट के होते हुए भी संज्ञान में लेना:
- यह स्थापित विधि है कि पुलिस द्वारा क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत किये जाने के बावजूद न्यायालय अपराध का संज्ञान लेने के लिये सक्षम है।
- उच्च न्यायालय ने इस सुस्थापित विधिक स्थिति की उपेक्षा की।
उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण के संबंध में:
- अपर सेशन न्यायाधीश का पुनरीक्षण आदेश विस्तृत था। इसमें विशेष रूप से धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथनों पर विचार किया गया था तथा प्रथमदृष्टया यह मत व्यक्त किया गया था कि विचारण की कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध थी।
- अपर सेशन न्यायाधीश ने क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद संज्ञान लेने के संबंध में दिये गए न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया था।
- अभिलेख पर उपलब्ध अत्यंत प्रभावशाली परिस्थितियों के बावजूद उच्च न्यायालय ने इन निष्कर्षों को सरसरी तौर पर निरस्त कर दिया।
विचारण पर निष्कर्षों के प्रभाव के संबंध में:
- न्यायालय को मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर लिए गए संज्ञान में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं मिला।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संज्ञान लेते समय अथवा उसकी पुष्टि करते समय अपर सत्र न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा व्यक्त किये गए विचार किसी भी प्रकार से विचारण को नियंत्रित अथवा विनियमित नहीं करेंगे।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने अपील मंजूर करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया तथा मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान संबंधी आदेश को पुनः बहाल कर दिया। प्रत्यर्थी संख्या 2 को मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने का निदेश दिया गया, जो विधि के अनुसार सुपुर्दगी की कार्यवाही संपन्न करेंगे।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 180 अन्वेषण के दौरान पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा से संबंधित है।
- यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अनुरूप है।
उपबंध:
- धारा 180(1): अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति की मौखिक परीक्षा कर सकता है, जिसके मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों से परिचित होने की संभावना हो।
- धारा 180(2): ऐसा व्यक्ति मामले से संबंधित सभी प्रश्नों का सत्यतापूर्वक उत्तर देने के लिए बाध्य है, सिवाय उन प्रश्नों के जिनके उत्तर उसे किसी आपराधिक आरोप, दण्ड अथवा संपत्ति की जब्ती के लिये स्वयं को अनावृत करने की प्रवृत्ति रखते हों।
- धारा 180(3): पुलिस अधिकारी कथन को लिखित रूप में अभिलिखित कर सकता है तथा उसे श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी अभिलिखित कर सकता है। कुछ लैंगिक अपराधों के किये जाने का आरोप जिस महिला के विरुद्ध हो, उसका कथन महिला पुलिस अधिकारी अथवा किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाएगा।
कथनों के उपयोग पर प्रतिबंध (धारा 181 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता):
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 181 (जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के समकक्ष है) यह उपबंधित करती है कि अन्वेषण के दौरान पुलिस अधिकारी को दिया गया कथन, कथन देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित नहीं किया जाएगा।
- ऐसे कथन का किसी भी जाँच अथवा विचारण में किसी प्रयोजन के लिये उपयोग नहीं किया जा सकता, सिवाय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 148 (जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 145 के अनुरूप है) में उपबंधित रीति से साक्षी का खंडन करने के प्रयोजन के।
- यही कारण है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथन विचारण के दौरान सारभूत साक्ष्य नहीं होते, यद्यपि संज्ञान लेने का निर्णय करते समय न्यायालय पुलिस रिपोर्ट के भाग के रूप में उन पर विचार कर सकता है।
क्लोजर रिपोर्ट प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध विकल्प:
- धारा 193 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (धारा 173 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन अंतिम रिपोर्ट प्राप्त होने पर, जिसमें यह कहा गया हो कि कोई अपराध नहीं बनता है, मजिस्ट्रेट निम्नलिखित कार्य कर सकता है:
- रिपोर्ट स्वीकार करके कार्यवाही समाप्त कर देना; या
- रिपोर्ट से असहमत होकर अपराध का संज्ञान लेना तथा समन या अन्य प्रक्रिया जारी करना; या
- आगे अन्वेषण करने का निदेश देना।
- क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से पूर्व मजिस्ट्रेट के लिए सूचनाकर्ता को सूचना देना तथा उसकी सुनवाई करना अनिवार्य है, जैसा कि भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त (1985) में कहा गया है।
- सूचनाकर्ता विरोध याचिका (Protest Petition) भी प्रस्तुत कर सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट परिवाद के रूप में मानकर विधि के अनुसार आगे की कार्यवाही कर सकता है।
सांविधानिक विधि
वयस्क महिला को माता-पिता के पास लौटने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता
13-Oct-2026
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बशीर अहमद बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य "किसी वयस्क व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति के साथ रहने या उसका साथ देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही वह व्यक्ति उसका माता-पिता ही क्यों न हो।" न्यायमूर्ति संजय धर |
स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय धर ने बशीर अहमद बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण का उद्देश्य अवैध निरोध से मुक्ति सुनिश्चित करना है तथा इसका उपयोग किसी वयस्क व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने के लिये बाध्य करने हेतु नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने एक पिता द्वारा प्रस्तुत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने अपनी वयस्क पुत्री को वापस दिलाए जाने की मांग की थी। पुत्री ने स्वेच्छा से अपना घर छोड़ दिया था और अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर लिया था।
बशीर अहमद बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता बशीर अहमद ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर अधिकारियों को अपनी 20 वर्षीय पुत्री का पता लगाने और उसे वापस लाने के निदेश देने की मांग की। उन्होंने यह भी मांग की कि उसकी गुमशुदगी के अन्वेषण के लिये एक निर्धारित समय सीमा के भीतर एक विशेष टीम गठित की जाए।
- उन्होंने यह तर्क दिया कि:
- उनकी पुत्री 11 जुलाई 2026 को घर से निकलने के बाद लापता हो गई, वह उच्च माध्यमिक विद्यालय के पार्ट-I की वार्षिक परीक्षा में शामिल होने जा रही थी।
- उन्होंने 12 जुलाई 2026 को पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन उसे ढूंढने के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।
- उन्हें आशंका थी कि उसका अपहरण किया गया होगा या उसे विधिविरुद्ध रूप से निरोध में लिया गया होगा।
- कार्यवाही के दौरान, पुत्री ने प्रत्यर्थी के रूप में शामिल होने की मांग की और अपना जवाब दाखिल किया। उसने कहा कि:
- उसने बिना किसी दबाव या अनुचित प्रभाव के, स्वेच्छा से अपने माता-पिता का घर छोड़कर अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी की थी।
- वह वयस्क थी, अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहती थी, और यह भी नहीं चाहती थी कि उसकी कस्टडी उसके पिता को सौंपी जाए।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
पुत्री के साथ व्यक्तिगत बातचीत के बारे में:
- न्यायालय ने पुत्री को अपने समक्ष उपस्थित होने का निदेश दिया और उससे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की।
- उसने बताया कि उसकी आयु 19 वर्ष से अधिक है और वह किश्तवार में अपने पति मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ स्वतंत्र रूप से रह रही है, जिससे उसने अपनी मर्जी से शादी की थी।
- उसने न्यायालय को यह भी बताया कि उसने और उसके पति ने पहले उत्पीड़न से सुरक्षा की मांग करते हुए एक अलग रिट याचिका दायर की थी, जिसमें उनके पक्ष में निदेश जारी किये गए थे।
- इसके बाद रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल द्वारा शपथ पर उनका कथन अभिलिखित किया गया। उन्होंने दोहराया कि उन्होंने स्वेच्छा से शादी की थी, अपने पति के साथ रहना चाहती थीं और अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती थीं।
वयस्क व्यक्ति के चुनाव करने के अधिकार पर:
- एक बार जब कोई वयस्क महिला स्वेच्छा से और स्पष्ट रूप से अपने पति के साथ रहने का विकल्प चुनती है, तो उस निर्णय को विधिक मान्यता प्राप्त होती है।
- किसी वयस्क व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति के साथ रहने या उसका साथ देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही वह व्यक्ति उसका माता-पिता ही क्यों न हो।
बंदी प्रत्यक्षीकरण के दायरे पर:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) की अधिकारिता का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध या विधिविरुद्ध निरोध से रिहा कराना है।
- इसका प्रयोग किसी वयस्क को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने के लिये मजबूर करने के लिये नहीं किया जा सकता है।
मामले के तथ्यों के आधार पर:
- अभिलेख में मौजूद सामग्री से यह साबित नहीं हुआ कि पुत्री को किसी विधिविरुद्ध निरोध में रखा गया था।
- परिस्थितियों से पता चलता है कि वह स्वेच्छा से अपने माता-पिता का घर छोड़कर अपने पति के साथ रहने चली गई थी।
- चूँकि यह अवैध निरोध का मामला नहीं था, इसलिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आवश्यक आधार मौजूद नहीं था।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि पुत्री, वयस्क होने के नाते, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिये स्वतंत्र है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) एक लैटिन पद है, जिसका अर्थ है “आप उस व्यक्ति को प्रस्तुत करें"।
- यह उन व्यक्तियों के लिये एक विधिक उपचार है, जिन्हें अवैध रूप से निरुद्ध किया गया है। इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध निरोध या कारावास से मुक्त कराना है।
- इस रिट के माध्यम से न्यायालय निरुद्ध व्यक्ति को अपने समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश देता है, जिससे वह यह परीक्षण कर सके कि निरोध विधिसम्मत है या नहीं।
सांविधानिक उपबंध:
- उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के अधीन तथा उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के अधीन बंदी प्रत्यक्षीकरण सहित विभिन्न रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
- अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिये रिट जारी कर सकता है।
- अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों की अधिकारिता अधिक व्यापक है। वे मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।
- उच्चतम न्यायालय की रिट संबंधी अधिकारिता भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र तक विस्तृत है।
- उच्च न्यायालय अपनी प्रादेशिक अधिकारिता के भीतर स्थित किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को रिट जारी कर सकता है अथवा ऐसी स्थिति में भी रिट जारी कर सकता है, जहाँ वाद-हेतुक पूर्णतः या आंशिक रूप से उसकी प्रादेशिक सीमा के भीतर उत्पन्न हुआ हो।
याचिका कौन प्रस्तुत कर सकता है:
- वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से परिरुद्ध या निरुद्ध किया गया हो।
- निरुद्ध व्यक्ति की ओर से कोई अन्य व्यक्ति, जैसे उसका संबंधी या मित्र, जिसे मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों की जानकारी हो।
- शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मान्यता प्रदान की कि जहाँ निरुद्ध व्यक्ति स्वयं न्यायालय का दरवाजा खटखटाने में असमर्थ हो, वहाँ उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति याचिका प्रस्तुत कर सकता है।
जब याचिका खारिज हो जाती है:
- जब निरुद्ध करने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी के संबंध में न्यायालय के पास प्रादेशिक अधिकारिता न हो।
- जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश के अधीन किया गया हो।
- जब निरुद्ध व्यक्ति को पहले ही मुक्त कर दिया गया हो।
- जब निरोध में विद्यमान दोषों को दूर कर दिया गया हो और निरुद्ध रखना विधिसम्मत हो गया हो।
- जब किसी सक्षम न्यायालय द्वारा याचिका पहले ही गुण-दोष के आधार पर खारिज की जा चुकी हो।
- जब, वर्तमान मामले की भाँति, निरोध की कोई स्थिति ही विद्यमान न हो और कोई वयस्क महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ रह रही हो।
प्रकृति और विस्तार:
- कानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट, दार्जिलिंग (1974) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि बंदी प्रत्यक्षीकरण एक प्रक्रियात्मक रिट है, न कि मूल रिट। इसका मुख्य उद्देश्य निरोध की वैधता का आकलन करना है, तथा निरुद्ध व्यक्ति को शारीरिक रूप से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं है।
- सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) के मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इस रिट का उपयोग न केवल सदोष परिरोध के विरुद्ध, अपितु निरुद्ध करने वाले प्राधिकारी द्वारा बंदियों को दुर्व्यवहार एवं भेदभाव से संरक्षण प्रदान करने के लिये भी किया जा सकता है।
- पूर्व-न्याय (Res Judicata) का सिद्धांत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर कठोरता से लागू नहीं होता। अतः नए आधारों पर क्रमिक याचिकाएँ प्रस्तुत की जा सकती हैं।
सबूत का भार:
- निरुद्ध करने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी पर यह संतुष्ट करने का भार होता है कि निरोध विधिसम्मत है।
- जहाँ निरुद्ध व्यक्ति यह अभिकथन करता है कि निरोध दुर्भावनापूर्ण है अथवा संबंधित प्राधिकारी की शक्तियों से परे है, वहाँ ऐसे अभिकथनों को सिद्ध करने का भार निरुद्ध व्यक्ति पर होता है।