- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
करेंट अफेयर्स और संग्रह
होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह
आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 का उल्लंघन अभिग्रहण को दूषित नहीं करता है
15-Oct-2026
|
रामकृष्ण प्रह्लाद डोंगारदिवे बनाम महाराष्ट्र राज्य "वस्तुओं के वैध अभिग्रहण को साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर था..." न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति उज्जल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने रामकृष्ण प्रह्लाद डोंगारदिवे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 100, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 103 है, के अनुपालन में विफलता मात्र से अभिग्रहण स्वतः दूषित नहीं हो जाता; तथापि, अन्य त्रुटियों के साथ विचार किये जाने पर यह साक्ष्यिक मूल्य को प्रभावित कर सकता है। न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय (औरंगाबाद खंडपीठ) के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसके द्वारा दोषमुक्ति के निर्णय को उलट दिया गया था, तथा विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति के आदेश को पुनः बहाल कर दिया।
रामकृष्ण प्रह्लाद डोंगारदिवे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता पर भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 409 के अधीन आपराधिक न्यासभंग का विचारण चलाया गया, जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 316(5) है।
- अन्वेषण के दौरान, कथित तौर पर अपीलकर्त्ता के घर से दस्तावेज अभिगृहीत किये गए थे।
- विचारण न्यायालय ने पाया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100(7) के अधीन विहित प्रक्रिया का पालन तलाशी और अभिग्रहण के दौरान नहीं किया गया था, और अपीलकर्त्ता को दोषमुक्त कर दिया।
- राज्य ने बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ के समक्ष दोषमुक्त किये जाने के निर्णय के विरुद्ध अपील की।
- उच्च न्यायालय ने दोषमुक्ति के निर्णय को पलटते हुए अपीलकर्त्ता को दोषी ठहराया।
- आगे किसी भी पुष्टि के बिना, केवल अन्वेषण अधिकारी (IO) के परिसाक्ष्य पर विश्वास करते हुए, अभिग्रहण को वैध माना गया।
- यह माना गया कि अभिगृहीत पंचनामा पर अपीलकर्त्ता के हस्ताक्षर का न होना महत्त्वपूर्ण नहीं था।
- यह तर्क दिया गया कि पुलिस अधिकारी के पास अभिग्रहण के बारे में मिथ्या साक्ष्य देने का कोई कारण नहीं था।
- जब्त किए गए दस्तावेजों को एक ऐसे दोषी ठहराने वाले कारक के रूप में माना गया जिसे अपीलकर्ता समझाने में विफल रहा था।
- उच्च न्यायालय ने ऐसा तब किया जब अभिगृहीत की गई वस्तुओं की सूची अपीलकर्त्ता को उपलब्ध नहीं कराई गई थी और दोनों पंच साक्षी पक्षद्रोही हो गए थे।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 का अनुपालन न करने पर:
- धारा 100(4) और 100(7) दण्ड प्रक्रिया संहिता का उल्लंघन हुआ है क्योंकि उनकी आवश्यकताओं का अनुपालन नहीं किया गया है।
- ऐसी परिस्थितियों में, केवल अन्वेषण अधिकारी के कथन के आधार पर, आगे की पुष्टि के बिना, अभिग्रहण को साबित नहीं माना जा सकता था।
- अन्वेषण अधिकारी ने इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि अपीलकर्त्ता के घर से अभिगृहीत की गई वस्तुओं की सूची उन्हें क्यों नहीं दी गई।
सबूत प्रस्तुत करने का भार:
- वैध अभिग्रहण साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर होता है, जो विधि के अनुसार इसे निभाने में असफल रहा।
- उच्च न्यायालय ने अभिग्रहण पर विश्वास करने और इसे अपीलकर्त्ता के विरुद्ध एक दोषसिद्धि कारक के रूप में मानने में त्रुटि की।
- उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता द्वारा अभिगृहीत किये गए दस्तावेजों के बारे में स्पष्टीकरण देने में असफल रहने से प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने में भी त्रुटि की।
प्रक्रियागत उल्लंघन के प्रभाव पर:
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 का अनुपालन न करना, स्वयं में, किसी अभिग्रहण को अमान्य नहीं करता; यह केवल अन्वेषण में एक अनियमितता है।
- यद्यपि, जब इस कारक को अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह उत्पन्न करने वाले अन्य कारकों के साथ समग्र रूप से माना जाता है, तो यह अभियुक्त के पक्ष में जाता है, विशेषत: दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील में।
- वर्तमान मामले में:
- अभिग्रहण के दोनों साक्षियों ने अभियोजन पक्ष के कथन का समर्थन नहीं किया।
- अन्वेषण अधिकारी (IO) ने स्वयं अन्वेषण में हुई अनेक कमियों को स्वीकार किया।
- अभियोजन पक्ष का दस्तावेजी साक्ष्य संबंधी मामला अन्य गंभीर त्रुटियों से भी ग्रस्त था।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के तत्वों पर:
- अभियोजन पक्ष संपत्ति सौंपने और बेईमानी के आशय, दोनों को साबित करने में असफल रहा, जो कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के अधीन अपराध के आवश्यक तत्त्व हैं।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली, उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति के आदेश को पुनः बहाल कर दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 103 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 103 किसी बंद स्थान के भारसाधक व्यक्ति के तलाशी लेने देंगे के कर्त्तव्य से संबंधित है और तलाशी आयोजित करने की प्रक्रिया निर्धारित करती है।
- यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के अनुरूप है।
उपबंध :
- धारा 103(1): जब भी तलाशी के योग्य कोई स्थान बंद हो, तो उसमें रहने वाला या उसका भारसाधक व्यक्ति, मांग पर और वारण्ट प्रस्तुत करने पर, स्वतंत्र प्रवेश की अनुमति देगा और तलाशी के लिये सभी उचित सुविधाएं प्रदान करेगा।
- धारा 103(2): यदि प्रवेश प्राप्त नहीं किया जा सकता है, तो अधिकारी धारा 44(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (दरवाजा या खिड़की तोड़कर) के अधीन उपबंधित रीति कार्यवाही कर सकता है।
- धारा 103(3): ऐसे स्थान पर या उसके आसपास मौजूद किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली जा सकती है, यदि उस पर किसी ऐसी वस्तु को छुपाने का उचित संदेह हो जिसकी तलाशी ली जानी चाहिये। यदि वह व्यक्ति महिला है, तो तलाशी किसी अन्य महिला द्वारा शिष्टता का पूरा ध्यान रखते हुए की जाएगी।
- धारा 103(4): तलाशी लेने से पहले, अधिकारी मुहल्ले के (या किसी अन्य मुहल्ले के, यदि कोई उपलब्ध या इच्छुक न हो) दो या दो से अधिक स्वतंत्र और प्रतिष्ठित निवासियों को तलाशी में उपस्थित होने और साक्षी बनने के लिये बुलाएगा।
- धारा 103(5): तलाशी उनकी उपस्थिति में की जाएगी, और अभिगृहीत की गई सभी वस्तुओं और उनके मिलने के स्थानों की एक सूची तैयार की जाएगी और साक्षियों द्वारा हस्ताक्षरित की जाएगी। तलाशी के साक्षी को न्यायालय में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी जब तक कि उसे विशेष रूप से समन न किया जाए।
- धारा 103(6): तलाशी लिये गए स्थान के निवासी, या उसकी ओर से किसी व्यक्ति को, तलाशी के दौरान उपस्थित रहने की अनुमति दी जाएगी, और साक्षियों द्वारा हस्ताक्षरित सूची की एक प्रति उसे दी जाएगी।
- धारा 103(7): जब उपधारा (3) के अधीन किसी व्यक्ति की तलाशी ली जाती है, तो कब्जे में ली गई सभी चीजों की एक सूची तैयार की जाएगी और उसकी एक प्रति उस व्यक्ति को दी जाएगी।
- धारा 103(8): कोई भी व्यक्ति जो उचित कारण के बिना, लिखित आदेश द्वारा बुलाए जाने पर तलाशी में उपस्थित होने और साक्षी बनने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है, तो यह समझ जाएगा की उसने भारतीय न्याय संहिता की धारा 222 के अधीन अपराध किया है।
आपराधिक कानून
नशीले पदार्थ का सेवन करने पर शिक्षक द्वारा छात्र को डाँटना आत्महत्या का दुष्प्रेरण नहीं है
15-Oct-2026
|
सुरेंद्रनाथ मिश्र एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य "एक सामान्य चेतावनी में आपराधिक आशय का अभाव होता है।" न्यायमूर्ति राधा कृष्ण पटनायक |
स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राधा कृष्ण पटनायक ने सुरेंद्रनाथ मिश्रा एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि किसी आपराधिक आशय के अभाव में, अनुशासन बनाए रखने और नशे की हालत में किसी छात्र को फटकार लगाने मात्र से शिक्षकों पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 107 के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अभियोजन नहीं चलाया जा सकता। न्यायालय ने शिक्षकों और विद्यालय के वार्डन के विरुद्ध संज्ञान लेने के आदेश को अपास्त कर दिया।
सुरेंद्रनाथ मिश्रा और अन्य बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता उस विद्यालय के शिक्षक और वार्डन थे, जहाँ मृतक, एक 16 वर्षीय छात्र, पढ़ रहा था।
- याचिकाकर्त्ताओं ने मृतक सहित कुछ छात्रों को 'डेंड्राइट' नामक पदार्थ का सेवन करने के बाद नशे की हालत में पकड़ा था।
- उन्होंने छात्रों को फटकार लगाई और चेतावनी दी कि इस घटना की जानकारी उनके संरक्षकों को दी जाएगी।
- आरोप है कि इस चेतावनी से उत्पन्न भय और शर्मिंदगी के कारण मृतक ने छात्रावास भवन की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली।
- अन्वेषण के बाद पुलिस ने याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया।
- उपखंड न्यायिक मजिस्ट्रेट (SDJM), चंपुआ ने याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 (बालक की आत्महत्या का दुष्प्रेरण) और धारा 3(5) (सामान्य आशय) के अधीन अपराधों के लिये संज्ञान लिया।
- इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ताओं ने उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कर दोषमुक्त होने की मांग की, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि आरोप पत्र में मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि उनका कृत्य पूरी तरह से अनुशासन लागू करने के लिये था, और उनका आशय कभी भी मृतक को परेशान करने या जानबूझकर उसे आत्महत्या करने के लिये उकसाने का नहीं था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
आत्महत्या के दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्त्वों पर:
- आत्महत्या को उकसाने या उसमें सहायता करने का कोई कृत्य या लोप, दुष्प्रेरण का आरोप लगाने के लिये आवश्यक है।
- कथित उत्पीड़न और मृत्यु के बीच एक सीधा संबंध स्थापित किया जाना चाहिये।
- आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) का महत्त्व बहुत अधिक है: इस बात का प्रथम दृष्टया सबूत होना चाहिये कि अभियुक्त ने अपेक्षित आशय से कार्य किया।
- विधिक मानदंड के लिये सक्रिय उकसावे, भड़कावे या जानबूझकर सहायता करने का सबूत आवश्यक है।
शिक्षकों द्वारा की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में:
- एक सामान्य चेतावनी में आपराधिक आशय का अभाव होता है।
- यदि कोई विद्यार्थी अत्यधिक संवेदनशील है, तो ऐसी दुखद परिणति के लिये शिक्षक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिसकी पूर्वकल्पना कोई साधारण व्यक्ति सामान्य एवं नियमित अनुशासनात्मक कार्रवाई से नहीं कर सकता था।
- किसी विद्यालय में मानक प्रशासनिक या शैक्षणिक अनुशासन का पालन करते हुए यदि कोई छात्र आत्महत्या कर लेता है, तो उसमें अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आपराधिक आशय नहीं होता है।
- एक शिक्षक का नैतिक दायित्व है कि वह अनुशासन बनाए रखे, और एक साधारण फटकार उकसाने या जानबूझकर सहायता करने के समान नहीं है।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई को उकसावे के समान तभी माना जाएगा जब उत्पीड़न और अपमान के बार-बार, विशिष्ट आरोप हों, जो जानबूझकर और बिना किसी उचित कारण के किये गए हों।
जिन पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया गया है:
- न्यायालय ने वी.पी. सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2022) और थंगावेल बनाम राज्य (2025) पर विश्वास किया।
- इन निर्णयों में यह कहा गया है कि दुर्व्यवहार के लिये किसी छात्र को निलंबित करना या संस्थागत अनुशासन लागू करना, यदि छात्र बाद में आत्महत्या कर लेता है, तो उसे दुष्प्रेरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।
- महज डांट-फटकार आत्महत्या का कारण नहीं बनती, और एक समझदार व्यक्ति यह उम्मीद नहीं कर सकता कि एक सामान्य चेतावनी किसी छात्र को आत्महत्या करने के लिये प्रेरित करेगी।
मामले के तथ्यों के आधार पर:
- इस बात का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं था कि याचिकाकर्त्ताओं ने मृतक को नियमित रूप से परेशान किया या सक्रिय रूप से और जानबूझकर उसे उकसाया।
- याचिकाकर्त्ताओं का इस मौत में कोई प्रत्यक्ष संलिप्तता नहीं थी और उन्हें इसके लिये दुष्प्रेरण का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका मंजूर कर ली और याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध संज्ञान के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 107 बालक या विकृत चित्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण से संबंधित है ।
- यह भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 305 के अनुरूप है।
- यह भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के समकक्ष है) से अलग है, जो सामान्यतः आत्महत्या के दुष्प्रेरण से संबंधित है।
परीक्षा नोट : भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 में “दुष्प्रेरण” को परिभाषित किया गया है। भारतीय न्याय संहिता के अधीन, दुष्प्रेरण को धारा 45 में परिभाषित किया गया है, जबकि भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 में बालक की आत्महत्या के दुष्प्रेरण को शामिल किया गया है।
उपबंध:
- धारा 107: यह उस स्थिति में लागू होती है जब कोई बालक, विकृत चित्त व्यक्ति, मत्तता की अवस्था में व्यक्ति आत्महत्या करता है।
- जो कोई भी इस प्रकार की आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरित करता है, उसे मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डित किया जाएगा।
- दोषी पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
- धारा 108 (तुलना): जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण करेगा, उसे किसी एक भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा तथा वह जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 45 के अधीन उकसाना क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 45 (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 के समकक्ष है) यह उपबंधित करती है कि कोई व्यक्ति किसी कार्य के किये जाने का दुष्प्रेरण तब करता है, जब वह:
- किसी व्यक्ति को वह कार्य करने के लिये उकसाता है।
- एक या अधिक व्यक्तियों के साथ उस कार्य को करने के लिये षड्यंत्र में सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप घटित होता है।
- किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा, उस कार्य के किये जाने में जानबूझकर सहायता करता है।