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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

पूर्ववर्ती करार के बिना भी विवाहोपरांत दहेज की मांग दण्डनीय है

 22-Oct-2026

डी.बी. बनाम मध्य प्रदेश राज्य 

“...दहेज संबंधी पूर्व संविदा का होना अपराध के गठन हेतु पूर्ववर्ती शर्त नहीं है...” 

न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी  

स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने डी.बी. बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अपीलीय न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसके द्वारा पति और उसके पिता को दोषमुक्त किया गया था, तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 4 के अधीन पति की दोषसिद्धि को पुनः बहाल कर दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विवाह के पश्चात् की गई दहेज की मांग, दहेज संबंधी किसी पूर्व करार के अभाव में भी, दण्डनीय है। 

डी.बी. बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियोजन पक्ष के अनुसार, पत्नी के माता-पिता ने विवाह के समय लगभग 17 लाख रुपए नकद, गहने और घरेलू सामान दिये थे और विवाह के सभी खर्चों का वहन भी किया था। 
  • वैवाहिक घर पहुँचने पर पत्नी को पता चला कि पति ने अपनी शिक्षा के बारे में गलत जानकारी दी थी। उसने दावा किया था कि उसने अमेरिका में BBA की पढ़ाई की है, जबकि वास्तव में उसने केवल 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की थी और कभी विदेश में पढ़ाई नहीं की थी। 

पत्नी ने आरोप लगाया कि: 

  • विवाह के बाद पति और उसके परिवार ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया, यह कहते हुए कि उन्हें 25 लाख रुपए दहेज की उम्मीद थी लेकिन उन्हें केवल 17 लाख रुपए ही मिले। 
  • बकाया राशि का संदाय न होने पर उसे घर से निकाल दिया गया। 
  • उसने 6 अगस्त 2007 को परिवाद दर्ज कराया। 

विचारण न्यायालय के समक्ष कार्यवाही: 

  • अभियोजन पक्ष ने पत्नी, उसके माता-पिता, उसके भाई, अन्वेषण अधिकारी और पुणे स्थित उसके आवास के चौकीदार सहित नौ साक्षियों की परीक्षा की। बचाव पक्ष ने किसी की भी परीक्षा नहीं की। 
  • विचारण न्यायालय ने पति और उसके पिता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के अधीन दोषी ठहराया और उन्हें 1,000 रुपए के जुर्माने के साथ एक वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड सुनाया, जिसमें जुर्माना अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त दण्ड का प्रावधान भी किया गया। 

अपील न्यायालय के समक्ष कार्यवाही: 

  • अपील न्यायालय ने दोषसिद्धि को पलट दिया और दोनों अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया। 
  • पत्नी ने उच्च न्यायालय में दोषमुक्त किये जाने के निर्णय को चुनौती दी। 

विवाद: 

  • पत्नी: अपील न्यायालय ने विवाह-पूर्व दहेज की निश्चित राशि के संबंध में करार के अभाव को विवाह के पश्चात् की गई मांग के लिये घातक मानकर त्रुटि की। लोभ की कोई सीमा नहीं होती और धन-संपन्न व्यक्ति भी अधिक धन की मांग कर सकता है। 
  • पति और पिता: अभियोजन पक्ष पक्षकारों के मध्य दहेज संबंधी किसी पूर्व करार को साबित करने में विफल रहा।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

दहेज की परिभाषा पर: 

  • अधिनियम की धारा 2 के अधीन, दहेज में विवाह के संबंध में, विवाह से पूर्व या विवाह के पश्चात किसी भी समय दी गई या देने के लिये सहमत संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति सम्मिलित है। 
  • इसलिये, विवाह के बाद की गई कोई भी मांग दहेज की परिभाषा के अंतर्गत आती है। 
  • धारा 4 के अधीन किसी अपराध के लिये पूर्व में kई गई दहेज संविदा एक पूर्ववर्ती शर्त नहीं है। 

मांग के सबूत पर: 

  • दहेज की मांग को मौखिक परिसाक्ष्य के माध्यम से साबित किया जा सकता है । 
  • किसी भी मौद्रिक मांग को साबित करने के लिये दस्तावेजी साक्ष्य की आवश्यकता वाला कोई नियम नहीं है। 

साक्ष्य के मूल्यांकन पर: 

  • पत्नी के कथन का समर्थन अभियोजन पक्ष के सभी साक्षियों ने किया, यद्यपि कुछ साक्षियों के कथनों के विवरण और उनके ज्ञान के स्रोत में अंतर था। 
  • किसी आपराधिक अभियोजन में साक्षियों से घटना को शब्दशः दोहराने की अपेक्षा नहीं की जाती है। 
  • तारीखों, शब्दों या याददाश्त में मामूली अंतर, विशेषत: जब परिसाक्ष्य घटनाओं के कई वर्ष बाद दिया जाता है, तो इससे सबूत स्वतः अविश्वसनीय नहीं हो जाते। 

अपील न्यायालय के निष्कर्षों पर: 

  • विवाह के समय कथित तौर पर दिये गए 17 लाख रुपए के संबंध में अपील न्यायालय का आदेश असंगत था। 
  • न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि पत्नी ने सामान के साथ पुणे छोड़ दिया, इसलिये उसने स्वेच्छा से ही छोड़ा होगा। झगड़े के बाद घर छोड़ने का यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति को पहले से ही उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ रहा था। 
  • अपील न्यायालय साक्ष्य में ऐसी कोई कमी नहीं बता सका जिससे विचारण न्यायालय के निष्कर्ष अस्थिर साबित हो सकें। 
  • साक्ष्यों से विवाह के बाद की एक सुसंगत मांग स्थापित हुई, जिसका समर्थन पत्नी के परिसाक्ष्य से हुआ और महत्त्वपूर्ण विवरणों में इसकी पुष्टि हुई। 

निर्देश: 

  • दोषमुक्ति का आदेश अपास्त कर दिया गया और पति को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के अधीन दोषी ठहराए जाने के निर्णय को बहाल कर दिया गया। 
  • ससुर की सजा बहाल नहीं की गई, क्योंकि अभियुक्त की मृत्यु के बाद आपराधिक दायित्व समाप्त हो जाता है। 

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 क्या है? 

परिचय: 

  • दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 भारत में दहेज देने, लेने और मांगने पर रोक लगाने के लिये अधिनियमित एक केंद्रीय विधि है। 
  • यह अधिनियम 1 जुलाई 1961 को लागू हुआ और पूरे भारत पर लागू होता है। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद, यह जम्मू और कश्मीर पर भी लागू होता है, जिसके लिये पहले एक पृथक् राज्य विधि थी। 
  • यह अधिनियम दहेज मृत्यु और महिलाओं के उत्पीड़न के संबंध में बढ़ती सामाजिक चिंता के प्रत्युत्तर में अधिनियमित किया गया था। इसके प्रभावी प्रवर्तन में कमियों को लेकर ऐतिहासिक रूप से इसकी आलोचना होती रही है, जिस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने बार-बार चिंता व्यक्त की है। 

मुख्य उपबंध : 

धारा 

उपबंध 

मुख्य बिंदु 

2 

दहेज की परिभाषा 

विवाह के संबंध में विवाह से पूर्व, विवाह के समय या विवाह के पश्चात् दिया गया या दिया जाना सहमत कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति। मुस्लिम मेहर इसके अंतर्गत सम्मिलित नहीं है।  

3 

दहेज देना या लेना 

न्यूनतम 5 वर्ष का कारावास तथा कम-से-कम ₹15,000 या दहेज के मूल्य के बराबर, इनमें से जो भी अधिक हो, जुर्माना। सद्भावपूर्वक दिये गए दान, जो सूचीबद्ध हों और अत्यधिक मूल्य के न हों, इस उपबंध से छूट प्राप्त हैं।  

4 

दहेज की मांग करना 

6 माह से 2 वर्ष तक का कारावास तथा ₹10,000 तक का जुर्माना।  

4-क 

विज्ञापन पर प्रतिबंध 

विवाह के प्रतिफल के रूप में धन या संपत्ति की पेशकश करने वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध। 6 माह से 5 वर्ष तक का कारावास तथा ₹15,000 तक का जुर्माना।  

5 

करार का शून्य होना 

दहेज देने या लेने संबंधी कोई भी करार शून्य है।  

6 

पत्नी के लाभ के लिये दहेज 

दहेज को 3 माह के भीतर पत्नी को हस्तांतरित किया जाना आवश्यक है। यदि उसे प्राप्त करने से पूर्व पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो दहेज उसके वारिसों, संतानों या माता-पिता को प्राप्त होगा।  

7 

संज्ञान 

संज्ञान केवल पुलिस रिपोर्ट अथवा पीड़ित व्यक्ति, उसके किसी संबंधी या मान्यताप्राप्त कल्याणकारी संस्था द्वारा किये गए परिवाद पर लिया जा सकता है। विचारण महानगर मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या उससे उच्चतर न्यायिक अधिकारी द्वारा किया जाएगा।  

8 

अपराध की प्रकृति 

अपराध अजमानतीय और अशमनीय है। 

8-क 

सबूत का भार  

सबूत का प्रतिलोमित भार: अभियुक्त को यह साबित करना होगा कि कोई अपराध कारित नहीं किया गया है। 

8-ख 

दहेज प्रतिषेध अधिकारी 

राज्य द्वारा दहेज की रोकथाम करने और साक्ष्य एकत्र करने के लिये नियुक्त किये जाते हैं। उन्हें सलाहकार बोर्डों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।  

संबंधित आपराधिक विधिक उपबंध: 

पुरानी विधि 

नई विधि 

विषय 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80 

दहेज मृत्यु  

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क  

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 

पति या उसके संबंधियों द्वारा क्रूरता 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-ख 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 

दहेज मृत्यु के संबंध में उपधारणा 


आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) लोक सेवकों के लिये सुरक्षा उपायों का विस्तार करती है

 22-Oct-2026

पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान  

"...भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 की उपधारा (4) के अधीन ऐसी अपेक्षा को समाविष्ट किया गया है।" 

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तथा अन्य याचिकाकर्ताओं को CMRL-Exalogic के मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के केरल उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा दिये गए निदेश को चुनौती देने की अनुमति प्रदान की। इस दौरान, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4), पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) से किस प्रकार भिन्न है। 

पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला केरल में CMRL-Exalogic मामले से जुड़ा है। 
  • केरल उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने याचिकाकर्त्ताओं, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी शामिल हैं, के विरुद्ध FIR दर्ज करने और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अन्वेषण शुरू करने का निदेश दिया। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष इस आदेश के विरुद्ध अपील करने की अनुमति मांगी। 
  • खंडपीठ ने अपील की अनुमति देने से इंकार कर दिया। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता द्वारा लाए गए परिवर्तन पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की तुलना में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से FIR दर्ज करने की योजना में परिवर्तन आया है। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन, मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज करने का निदेश देने से पहले लोक सेवक या उनके वरिष्ठ अधिकारी को शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के अधीन, यदि किसी लोक सेवक के विरुद्ध आधिकारिक कर्त्तव्यों के दौरान किये गए कृत्यों के लिये परिवाद किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को निम्नलिखित करना होगा: 
    • लोक सेवक के वरिष्ठ अधिकारी से तथ्यों और परिस्थितियों पर एक रिपोर्ट प्राप्त करनी होगी; और 
    • उस घटना के घटित होने के कारण के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिये गए कथनों पर विचार करना होगा । 

लोक सेवक के सुने जाने के अधिकार पर: 

  • सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि धारा 175(4) के अधीन, मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज करने का निदेश देने से पहले लोक सेवक की राय ली जाती है। 
  • ऐसे लोक सेवक को अपने तर्कों के गुण-दोष के आधार पर सुनने का अधिकार है, न कि अधिकारिता के अभाव के कारण प्रारंभ में ही उन्हें खारिज कर दिया जाए। 

संदर्भ का सीमित उद्देश्य: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने धारा 175(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का उल्लेख केवल नई विधि के अधीन FIR दर्ज करने से पहले संभावित अभियुक्त को उपलब्ध विस्तारित सुरक्षा उपायों को समझाने के लिये किया था। 
  • इसने यह निर्णय नहीं किया कि क्या यह उपबंध याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर लागू होता है। 

याचिकाकर्त्ताओं की चुनौती के संबंध में: 

  • न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ताओं ने एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने के लिये प्रथम दृष्टया मामला बनाया है, विशेष रूप से इसलिये क्योंकि इसमें न केवल FIR दर्ज करने का निदेश दिया गया था अपितु भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अन्वेषण प्रारंभ करने का भी निदेश दिया गया था। 

निर्देश: 

  • खंडपीठ द्वारा अपील की अनुमति देने से इंकार करने के निर्णय को अपास्त कर दिया गया और याचिकाकर्त्ताओं को अपनी अपीलें आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई। 
  • याचिकाकर्त्ताओं को उच्च न्यायालय से अंतरिम अनुतोष प्राप्त करने का अवसर देने के लिये अन्वेषण को सात दिनों के लिये स्थगित कर दिया गया था। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 संज्ञेय मामलों का अन्वेषण करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति से संबंधित है । 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 के अनुरूप है । 

उपधारा: 

  • धारा 175(1): कोई पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी ऐसे संज्ञेय मामले का अन्वेषण कर सकता है, जिसकी जांच या विचारण करने की शक्ति उस थाने की सीमाओं के अंदर के स्थानीय क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को अध्याय 14 के उपबंधों के अधीन है। 
    • परंतुक: संज्ञेय अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करते हुए, पुलिस अधीक्षक, उप पुलिस अधीक्षक से मामले का अन्वेषण करने के लिये अपेक्षा कर सकेगा। 
  • धारा 175(2): किसी पुलिस अधिकारी की कार्यवाही पर इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता कि अधिकारी को इस धारा के अधीन अन्वेषण करने का अधिकार नहीं था। 
  • धारा 175(3): धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट निम्नलिखित के बाद अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • धारा 173(4) के अधीन दिये गए शपथपत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर विचार करना; 
    • ऐसी जांच करना जो आवश्यक समझी जाए; और 
    • पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जानकारी पर विचार करते हुए। 
  • धारा 175(4): धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट, लोक सेवक के विरुद्ध आधिकारिक कर्त्तव्यों के दौरान उत्पन्न हुए परिवाद पर, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • (क) लोक सेवक से वरिष्ठ अधिकारी से घटना के तथ्यों और परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करना; और 
    • (ख) घटना के कारण उत्पन्न हुई परिस्थिति के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिये गए कथनों पर विचार करना। 

क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4), दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) से भिन्न है? 

पहलू 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) एवं (4)  

सशक्त मजिस्ट्रेट 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट 

शपथपत्र की आवश्यकता 

इस उपबंध में इसका उल्लेख नहीं है। 

आवेदन के साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के अधीन शपथपत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है।  

मजिस्ट्रेट द्वारा जांच 

इस उपबंध में इसका उल्लेख नहीं है।  

मजिस्ट्रेट आवश्यक जांच कर सकता है तथा पुलिस अधिकारी के निवेदन पर विचार कर सकता है।  

लोक सेवकों के विरुद्ध परिवाद 

कोई विशेष प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। 

वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना तथा लोक सेवक के अभिकथनों पर विचार करना आवश्यक है।  

वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अन्वेषण 

ऐसा कोई उपबंध नहीं है। 

पुलिस अधीक्षक, अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता पर विचार करते हुए, पुलिस उपाधीक्षक को अन्वेषण करने का निर्देश दे सकता है।