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आपराधिक कानून
विचारण-पूर्व निरोध, विचारण के बिना दण्ड का रूप नहीं ले सकता है
23-Oct-2026
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महेश चंद्र जोशी बनाम राजस्थान राज्य "...दीर्घकालिक विचारण-पूर्व निरोध को विचारण के बिना दण्ड में परिवर्तित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती..." न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने महेश चंद्र जोशी बनाम राजस्थान राज्य और मुकेश पाठक बनाम राजस्थान राज्य (2026) के मामलों का निर्णय किया। न्यायालय ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत निविदाओं में कथित अनियमितताओं से संबंधित भ्रष्टाचार के एक मामले में राजस्थान के पूर्व मंत्री महेश चंद्र जोशी और सह-अभियुक्त मुकेश पाठक को नियमित जमानत प्रदान की। न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि गंभीर आरोपों से संबंधित मामलों में भी अनुच्छेद 21 के अधीन वैयक्तिक स्वतंत्रता और शीघ्र विचारण के अधिकारों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है।
महेश चंद्र जोशी बनाम राजस्थान राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला राजस्थान में जल जीवन मिशन के अधीन सैकड़ों करोड़ रुपए के टेंडरों में कथित अनियमितताओं से संबंधित है।
- इन आरोपों में कल्याणकारी परियोजना के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता और संस्थागत मिलीभगत शामिल थी।
- इस मामले में अपीलकर्त्ता महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक अभियुक्त थे और उन्होंने उच्चतम न्यायालय से नियमित जमानत की अर्जी दी थी।
अभिरक्षा की अवधि:
- लगभग 72 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक जोशी 7 मई 2026 से पाँच महीने से अधिक समय से अभिरक्षा में थे।
- पाठक 18 फरवरी 2026 से लगभग आठ महीने से लगातार अभिरक्षा में थे ।
मामले की स्थिति:
- दोनों अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध अन्वेषण पूर्ण हो चुका था और आरोपपत्र दाखिल किये जा चुके थे।
- इस मामले में 22 अभियुक्त, 3 आरोपपत्र, 124 अभियोजन साक्षी और लगभग 20,000 पृष्ठों के 192 दस्तावेज शामिल थे ।
- अभी तक आरोप तय नहीं किए गए थे और मुकदमा शुरू नहीं हुआ था।
- कुछ सह-अभियुक्तों के विरुद्ध अन्वेषण अभी भी लंबित था, और कई अभियुक्त जिनके विरुद्ध गिरफ्तारी वारण्ट जारी किये गए थे, वे अभी भी फरार थे।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
आरोपों की गंभीरता के संबंध में:
- एक जन कल्याण परियोजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता और संस्थागत मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं और इनकी गहन जांच होनी चाहिये।
- राज्य द्वारा इतने व्यापक आपराधिक क्रियाकलाप में संलिप्तता के अभियुक्त व्यक्तियों को जमानत देने का विरोध करना उचित था।
- तथापि, आरोपों की गंभीरता, चाहे वे कितने ही गंभीर क्यों न हों, अपने आप में जमानत को नियंत्रित करने वाले अन्य सभी विचारों को अप्रभावी नहीं कर सकती और न ही अनिश्चितकालीन विचारण-पूर्व निरोध को न्यायोचित ठहरा सकती है।
अनुच्छेद 21 के संबंध में:
- विचारण-पूर्व दीर्घकालिक निरोध को विचारण के बिना दण्ड में परिवर्तित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसा करना अनुच्छेद 21 के अधीन विचारणाधीन बंदी के वैयक्तिक स्वतंत्रता और शीघ्र विचारण के मूल अधिकार का उल्लंघन होगा।
साक्ष्य की प्रकृति के संबंध में:
- अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित था, जिसमें निविदा फाइलें, आधिकारिक पत्राचार, बैंक विवरण, जब्त किये गए मोबाइल फोन की फोरेंसिक रिपोर्ट और रिकॉर्ड की गई बातचीत सम्मिलित थी।
- यह समस्त सामग्री पहले से ही अन्वेषण अभिकरण की अभिरक्षा में थी।
- अभिरक्षा में रखकर आगे पूछताछ करने अथवा किसी वस्तु की बरामदगी की आवश्यकता नहीं थी तथा साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ किये जाने का जोखिम काफी हद तक समाप्त हो चुका था।
विचारण की संभावित अवधि के संबंध में:
- अभियुक्तों, साक्षियों और दस्तावेजों की संख्या तथा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आरोप अभी तक विरचित नहीं किये गए थे, विचारण में पर्याप्त समय लगने की संभावना थी।
समानता के आधार पर:
- दोनों अपीलकर्त्ताओं को समान तथ्यों से संबंधित संबंधित कार्यवाही में जमानत मिल गई थी।
- वर्तमान मामले में कई सह-अभियुक्तों को भी जमानत अथवा अंतरिम संरक्षण प्रदान किया जा चुका था।
निष्कर्ष:
- समग्र परिस्थितियों पर विचार करने पर, विचारण-पूर्व निरोध को आगे जारी रखना न तो न्यायोचित था और न ही आवश्यक।
- अभियोजन पक्ष की किसी भी युक्तियुक्त आशंका का समाधान उपयुक्त शर्तें अधिरोपित करके किया जा सकता था।
- अपीलकर्त्ताओं को नियमित जमानत दी गई।
अनुच्छेद 21 के अधीन शीघ्र विचारण और जमानत का अधिकार क्या है?
बारे में:
- अनुच्छेद 21 उपबंधित करता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही उसके जीवन या वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत शीघ्र विचारण के अधिकार को मान्यता प्रदान की है तथा अभिनिर्धारित किया है कि ऐसी प्रक्रिया, जो युक्तियुक्त रूप से शीघ्र विचारण सुनिश्चित नहीं करती, न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त नहीं है।
प्रमुख सिद्धांत:
- जमानत नियम है, कारावास अपवाद: राजस्थान राज्य बनाम बालचंद (1977) में प्रतिपादित किया गया था।
- मौलिक अधिकार के रूप में शीघ्र विचारण: हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) के मामले में इसे मान्यता प्रदान की गई, जिसमें कारागारों में लंबे समय से निरुद्ध विचारणाधीन बंदियों की दयनीय स्थिति को उजागर किया गया था।
- निरोध दण्ड नहीं है: संजय चंद्र बनाम सीबीआई (2012) के मामले में, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जमानत का उद्देश्य विचारण के दौरान अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है तथा विचारण-पूर्व निरोध का उपयोग दण्ड के रूप में नहीं किया जाना चाहिये, यहाँ तक कि आर्थिक अपराधों के मामलों में भी।
- जमानत संबंधी सुधार: सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) के मामले में, न्यायालय ने अनावश्यक गिरफ्तारी और निरोध को रोकने के लिये दिशा-निर्देश निर्धारित किये तथा जमानत आवेदनों पर शीघ्र निर्णय करने की आवश्यकता पर बल दिया।
जमानत प्रदान करते समय विचारणीय कारक:
- आरोप की प्रकृति एवं गंभीरता तथा दण्ड की कठोरता।
- आरोपों के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्य की प्रकृति।
- साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ किये जाने अथवा साक्षियों को प्रभावित किये जाने की युक्तियुक्त आशंका।
- अभियुक्त के न्याय से फरार होने की संभावना।
- पहले से भुगती गई अभिरक्षा की अवधि तथा विचारण की संभावित अवधि।
- जमानत प्राप्त कर चुके सह-अभियुक्तों के साथ समरूपता का सिद्धांत।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत सुसंगत उपबंध:
|
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा |
दण्ड प्रक्रिया संहिता की समतुल्य धारा |
विषय |
|
धारा 479 |
धारा 436क |
विचारणाधीन बंदी को निरुद्ध रखने की अधिकतम अवधि। |
|
धारा 480 |
धारा 437 |
अजमानतीय अपराधों के मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा जमानत प्रदान किया जाना। |
|
धारा 483 |
धारा 439 |
जमानत के संबंध में उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय की विशेष शक्तियां। | |
सांविधानिक विधि
बाध्यकारी संविदा के गठन से पूर्व लोक प्राधिकारी नीलामी के निर्णय पर पुनर्विचार कर सकता है
23-Oct-2026
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सतिंदर पाल सिंह और अन्य बनाम बेदी अस्पताल और अन्य "चंडीगढ़ प्रशासन की कार्रवाई में न तो कोई अवैधता है और न ही मनमानापन..." न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने सतिंदर पाल सिंह एवं अन्य बनाम बेदी अस्पताल एवं अन्य (2026) मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसके द्वारा नर्सिंग होम हेतु निर्धारित स्थल के लिए बेदी अस्पताल की ₹12.58 करोड़ की बोली निरस्त करने संबंधी चंडीगढ़ प्रशासन के निर्णय को रद्द कर दिया गया था। साथ ही, न्यायालय ने उक्त स्थल की तीन माह के भीतर नए सिरे से ई-नीलामी कराने का निर्देश दिया।
सतिंदर पाल सिंह बनाम बेदी अस्पताल (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अगस्त 2022 में, चंडीगढ़ प्रशासन ने आवासीय, वाणिज्यिक और नर्सिंग होम स्थलों के लिये ई-नीलामी का नोटिस जारी किया।
- यह विवाद चंडीगढ़ के सेक्टर 33C में स्थित दो सटे हुए नर्सिंग होम स्थलों से संबंधित था, जिनमें से प्रत्येक का क्षेत्रफल 744.44 वर्ग गज था और आरक्षित मूल्य ₹6.91 करोड़ था।
नीलामी:
- 20 अक्टूबर 2022 को आयोजित नीलामी में:
- अपीलकर्त्ताओं की साइट नंबर 3 के लिये बोली ₹18.25 करोड़ में स्वीकार कर ली गई ।
- बेदी अस्पताल ने साइट नंबर 4 के लिये ₹12.58 करोड़ की उच्चतम बोली लगाई।
- बेदी अस्पताल ने 21 अक्टूबर 2022 को बोली राशि का 25% जमा किया, 28 अक्टूबर को विक्रय करार निष्पादित किया गया और शेष 75% का संदाय 16 नवंबर 2022 को किया गया।
प्रशासन द्वारा रद्द करना:
- आवंटन पत्र जारी होने और हस्तांतरण विलेख निष्पादित होने से पहले, प्रशासन ने इस संव्यवहार पर पुनर्विचार किया, क्योंकि समान आकार की बगल वाली जमीन लगभग 6 करोड़ रुपए अधिक में बिकी थी।
- 27 जनवरी 2023 को, इसने बेदी अस्पताल की बोली को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मूल्य अंतर बाजार के रुझानों को प्रतिबिंबित नहीं करता है।
- इसने साइट नंबर 4 की दोबारा नीलामी करने का फैसला किया, जिसमें आरक्षित मूल्य को साइट नंबर 3 के लिये प्राप्त उच्चतम बोली पर निर्धारित किया गया और बेदी अस्पताल द्वारा जमा की गई पूरी राशि वापस कर दी गई।
- बाद में विक्रय करार भी रद्द कर दिया गया।
उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही:
- बेदी अस्पताल ने इस रद्द करने को चुनौती दी, और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रशासन के निर्णय को रद्द कर दिया।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
नीलामी से प्रत्याहृत होने की शक्ति के संबंध में:
- न्यायालय ने चंडीगढ़ संपदा नियम, 2007 पर विश्वास किया, जिनके अनुरूप ई-नीलामी सूचना के निबंधन एवं शर्तें निर्धारित की गई थीं।
- ये नियम विशेष रूप से निविदा प्राधिकारी को राजस्व अधिकतमकरण के उद्देश्य से आवंटन पत्र जारी होने से पहले नीलामी से प्रत्याहृत की अनुमति देते हैं।
- चूँकि कोई आवंटन पत्र जारी नहीं किया गया था और कोई हस्तांतरण विलेख निष्पादित नहीं किया गया था, इसलिये प्रशासन को रद्द करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार था।
लोक संपत्ति की नीलामी पर पुनर्विचार करते हुए:
- लोक संपत्ति के विक्रय या पट्टे के मामलों में, यदि निर्णय का उद्देश्य कीमत को अधिकतम करना है, तो लोक प्राधिकरण नीलामी को वापस बुलाने या उस पर पुनर्विचार करने के लिये उचित है।
- यह तब तक अनुमेय है जब तक कोई प्रवर्तनीय संविदा नहीं की गई हो।
- उस प्रक्रम में, नीलामी में प्राप्त काफी कम कीमत, तथाकथित उच्चतम बोली लगाने वाले के पक्ष में संविदा को अंतिम रूप न देने का एक प्रासंगिक कारण है।
- न्यायालय को प्रशासन के निर्णय में कोई अवैधता या मनमानी नहीं मिली।
उचित अनुतोष के संबंध में:
- इसके बाद हुई नीलामी में, साइट नंबर 4 को ₹18.30 करोड़ मिले, जो बेदी अस्पताल की मूल बोली से लगभग ₹6 करोड़ अधिक थे, और अपीलकर्त्ता उच्चतम बोलीदाता के रूप में उभरे।
- बेदी अस्पताल ने न्यायालय को सूचित किया कि वह अपीलकर्त्ताओं द्वारा निर्धारित कीमत के समान कीमत देने को तैयार है।
- किसी भी पक्षकार को अनुतोष देने के बजाय, न्यायालय ने यह माना कि न्याय और लोक हित एक नई नीलामी से पूरे होंगे।
निर्देश:
- उच्च न्यायालय का फैसला अपास्त कर दिया गया।
- चंडीगढ़ प्रशासन को चंडीगढ़ संपदा नियम, 2007 के अधीन सेक्टर 33C में स्थित साइट नंबर 4 की नई ई-नीलामी आयोजित करने का निदेश दिया गया था।
- पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर शुरू और समाप्त होनी चाहिये।
लोक संपत्ति की नीलामी को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत क्या हैं?
सांविधानिक आधार:
- संविधान का अनुच्छेद 298 संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति को व्यापार या कारबार चलाने, संपत्ति का अर्जन, धारण और उसका व्ययन करने तथा किसी भी प्रयोजन के लिये संविदा करने तक विस्तारित करता है।
- अनुच्छेद 14 में यह आवश्यक है कि राज्य लोक संपत्ति से संबंधित मामलों में निष्पक्ष, पारदर्शी और मनमानी रहित तरीके से कार्य करे।
प्रमुख सिद्धांत:
- लोक विश्वास: लोक संपत्ति राज्य द्वारा जनता के लिये एक न्यास के रूप में रखी जाती है, और इसके निपटान का उद्देश्य सर्वोत्तम संभव मूल्य प्राप्त करना होना चाहिये।
- उच्चतम बोलीदाता का कोई निहित अधिकार नहीं: उच्चतम बोलीदाता को नीलामी को अपने पक्ष में संपन्न कराने का कोई निहित अधिकार तब तक प्राप्त नहीं होता जब तक कि बोली स्वीकार नहीं हो जाती और एक बाध्यकारी संविदा अस्तित्व में नहीं आ जाती (उड़ीसा राज्य बनाम हरिनारायण जायसवाल, 1972; राजस्थान हाउसिंग बोर्ड बनाम जी.एस. इन्वेस्टमेंट्स, 2007)।
- अपर्याप्त बोलियों को अस्वीकार करने का अधिकार: प्राधिकरण उच्चतम बोली को भी अस्वीकार कर सकता है यदि वह अपर्याप्त हो, बशर्ते कि निर्णय सद्भावनापूर्ण हो और मनमाना न हो।
- सीमित न्यायिक पुनर्विचार: न्यायालय केवल तभी हस्तक्षेप करते हैं जब निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या लागू नियमों के विपरीत हो, और वे अपना स्वयं का वाणिज्यिक निर्णय लागू नहीं करते हैं।
- संविदा संपन्न होने पर ही अंतिम सीमा: एक बार लागू करने योग्य संविदा संपन्न हो जाने के बाद, प्राधिकरण केवल अधिक कीमत प्राप्त करने के लिये उससे पीछे नहीं हट सकता।