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आपराधिक कानून
न्यायालय वयस्कों के व्यक्तिगत विकल्पों पर नैतिक निर्णय नहीं दे सकते हैं
03-Nov-2026
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संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य- थाने का भारसाधक अधिकारी “इस न्यायालय को स्वतंत्र विकल्प के विविध प्रयोगों पर नैतिक निर्णय देने का दायित्व नहीं सौंपा गया है।” न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य-थाने का भारसाधक अधिकारी (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अपीलें स्वीकार कर लीं, विचारण न्यायालय तथा केरल उच्च न्यायालय के आदेशों को अपास्त कर दिया तथा अपीलार्थी को विवाह के मिथ्या वचन पर बलात्संग, छल एवं द्विविवाह के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य- थाने का भारसाधक अधिकारी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता का अपीलार्थी के साथ संबंध था और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया।
- उसने आरोप लगाया कि विवाह से पूर्व अपीलार्थी ने अपने पूर्ववर्ती विवाह को छिपाया था और स्वयं को अविवाहित बताया था।
- उसके परिवाद के आधार पर अपीलार्थी के विरुद्ध निम्नलिखित अपराधों के लिये आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ की गई:
- भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376(2)(ढ) के अधीन विवाह के मिथ्या वचन पर बलात्संग,
- छल, और
- द्विविवाह
- अभिलेख पर उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ कि:
- परिवादकर्त्ता को छह माह के भीतर ही पता चल गया था कि अपीलार्थी पहले से विवाहित है और उसके बच्चे भी हैं, और
- इसके बावजूद वह सात वर्षों तक उसके साथ रहती रही।
- विचारण न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय ने अपीलार्थी को दोषमुक्त नहीं किया।
- तत्पश्चात् अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- जब कोई महिला किसी पुरुष के पहले से विवाहित होने की जानकारी होने के पश्चात् भी उसके साथ संबंध जारी रखती है, तो क्या उसकी सहमति को दूषित माना जा सकता है, जिससे संबंध समाप्त होने के बाद उस पुरुष के विरुद्ध बलात्संग, छल और द्विविवाह के अपराधों के लिये अभियोजन चलाया जा सके?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
स्वतंत्र विकल्प और नैतिक निर्णय के संबंध में:
- न्यायालय ने कहा कि उसे वयस्क व्यक्तियों द्वारा अपने स्वतंत्र विकल्प, स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का प्रयोग करने के तरीकों पर नैतिक निर्णय देने की भूमिका नहीं सौंपी गई है।
- वयस्क व्यक्ति ऐसे विकल्प चुन सकते हैं जो विवेकपूर्ण अथवा अविवेकपूर्ण, सतर्कतापूर्ण अथवा जोखिमपूर्ण हों। ऐसे विकल्पों के परिणाम पीड़ादायक या अवांछित हो सकते हैं।
- केवल इस आधार पर ऐसे विकल्प आपराधिक अपराधों में परिवर्तित नहीं हो जाते, जिनके लिये राज्य द्वारा कार्रवाई किया जाना आवश्यक हो।
- आपराधिक विधि का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने, बदला चुकाने अथवा किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से कार्य करने के लिये बाध्य करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
परिवादकर्त्ता के आचरण के संबंध में:
- परिवादकर्त्ता को छह माह के भीतर ही यह ज्ञात हो गया था कि अपीलार्थी विवाहित है और उसके बच्चे भी हैं, तथापि वह सात वर्षों तक उसके साथ रहती रही।
- इस आचरण से उसका यह दावा कमजोर हुआ कि वह स्वयं को अपीलार्थी की विधिपूर्वक विवाहित पत्नी मानती थी।
- अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से यह प्रदर्शित नहीं हुआ कि वह लगातार यह विश्वास करती रही कि वह अपीलार्थी की विधिक रूप से विवाहित पत्नी है अथवा कथित अपराधों के आवश्यक अवयव साबित होते हैं।
सहमति से स्थापित संबंधों और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) के संबंध में:
- न्यायालय ने पाया कि पक्षकारों के बीच संबंध तथा उनके मध्य हुए यौन कृत्य सहमति से किये गए थे। अपीलार्थी ने केवल उस संबंध से अलग होने का निर्णय लिया था।
- इससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) के अधीन बलात्संग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
- किसी संबंध के कटु एवं अप्रिय हो जाने से, पूर्व में सहमति से किये गए यौन कृत्य को पूर्वव्यापी प्रभाव से बलात्संग में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
असफल संबंधों को अपराध बनाने के संबंध में:
- न्यायालय ने सहमति से स्थापित, किंतु विफल हो चुके संबंधों को आपराधिक मामलों में परिवर्तित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की।
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि न्यायालयों द्वारा इस प्रवृत्ति की निंदा किये जाने के बावजूद यह जारी है तथा ऐसे मामलों में समझौते के अंतर्गत प्रायः पुरुष अभियुक्तों द्वारा बड़ी धनराशि का भुगतान किया जाता है।
वास्तविक मामलों और दूषित सहमति के संबंध में:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों से बलात्संग और लैंगिक हमले के वास्तविक आरोपों की गंभीरता कम नहीं होती। बलात्संग का अपराध आज भी व्यापक रूप से अप्रतिवेदित है और वास्तविक मामलों में दृढ़तापूर्वक अभियोजन चलाया जाना आवश्यक है।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि भारत में, जहाँ विवाह को अत्यधिक सामाजिक महत्त्व प्राप्त है, कोई महिला इस विश्वास के आधार पर शारीरिक अंतरंगता के लिये सहमति दे सकती है कि संबंध का परिणाम विधिपूर्वक विवाह होगा अथवा संबंध विधिपूर्वक विवाह पर आधारित है। ऐसी स्थिति में उसकी सहमति इस विश्वास की सत्यता पर निर्भर करती है।
- यदि किसी महिला को वास्तव में इस तथ्य से पूर्णतः अनभिज्ञ रखा गया हो कि उसका साथी पहले से विवाहित है, तो उसकी सहमति दूषित हो सकती है। अन्यथा, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 तथा धाराओं 493, 494 और 495 के अधीन प्रदान की गई सुरक्षा उन महिलाओं के लिये निरर्थक हो जाएगी, जिनके साथ वास्तव में अन्याय हुआ है।
- तथापि, इस सिद्धांत का अनुप्रयोग प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिये, न कि केवल आरोपों अथवा नैतिक धारणाओं के आधार पर।
निर्णय:
- अपील स्वीकार कर ली गईं।
- विचारण न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय के आदेश अपास्त कर दिये गए।
- अपीलार्थी को उसके विरुद्ध आरोपित सभी अपराधों से दोषमुक्त कर दिया गया।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64 बलात्संग के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 64(1): जो कोई बलात्कार करता है, उसे कम-से-कम दस वर्ष के कठोर कारावास से, जिसकी अवधि आजीवन कारावास तक हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा तथा वह जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
- धारा 64 (2): इस उपधारा में बलात्संग के गंभीरतर स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, जिनके लिये कम-से-कम दस वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड निर्धारित है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है (अर्थात् व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल तक), साथ ही जुर्माना का भी दायी होगा।
- धारा 64(2)(ड): इस खंड के अंतर्गत एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्संग करने वाले व्यक्ति को दण्डित करने का उपबंध है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सहमति मुख्य तत्त्व है: भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में बलात्संग को परिभाषित किया गया है। किसी महिला की स्वतंत्र एवं स्वैच्छिक सहमति से किये गए लैंगिक कृत्य बलात्संग की श्रेणी में नहीं आते।
- तथ्य संबंधी भ्रांति: भारतीय न्याय संहिता की धारा 28 के अधीन, यदि सहमति तथ्य संबंधी भ्रांति के अधीन दी गई हो और अभियुक्त यह जानता हो अथवा उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि सहमति ऐसी भ्रांति के कारण दी गई थी, तो ऐसी सहमति विधिमान्य नहीं होती।
- छलपूर्ण साधनों द्वारा नया अपराध: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 ऐसे प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा अथवा विवाह करने के ऐसे वचन के आधार पर, जिसे पूरा करने का कोई आशय न हो, प्राप्त किये गए मैथुन को पृथक् रूप से दण्डित करती है, जहाँ ऐसा कृत्य बलात्संग की श्रेणी में नहीं आता। इसके लिये जुर्माने के साथ दस वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है। “प्रवंचनापूर्ण साधनों” में अपनी पहचान छिपाकर विवाह करना भी सम्मिलित है।
- वचन का भंग सदैव बलात्संग नहीं होता: सहमति से स्थापित कोई संबंध बाद में समाप्त हो जाने मात्र से, पूर्व में सहमति से किये गए लैंगिक कृत्य बलात्संग में परिवर्तित नहीं हो जाते।
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अनुरूप है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (2) (ड) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (2) (ढ) के अनुरूप है, जिसमें एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्संग किये जाने से संबंधित उपबंध था।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 28, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 90 के अनुरूप है।
- वर्तमान मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) लागू की और अभिनिर्धारित किया कि इस धारा के आवश्यक अवयव साबित नहीं हुए, क्योंकि पक्षकारों के बीच संबंध सहमति से स्थापित था।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएँ 81 और 82 क्या हैं?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ 81 और 82 विवाह से संबंधित अपराधों के अध्याय में सम्मिलित हैं।
- धारा 81: यह धारा ऐसे पुरुष को दण्डित करती है, जो किसी महिला को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस महिला का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भि दायी होगा।
- धारा 82 (1): यह धारा ऐसे व्यक्ति को दण्डित करती है, जो अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए ऐसी परिस्थितियों में पुनः विवाह करता है, जिनमें पूर्ववर्ती पति या पत्नी के जीवित होने के कारण ऐसा विवाह शून्य होता है। इसके लिये जुर्माने के साथ सात वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।
- धारा 82(2): यह उपधारा उसी अपराध को अधिक कठोरता से दण्डित करती है, जहाँ व्यक्ति अपने आगामी विवाह के समय उस व्यक्ति से अपने पूर्ववर्ती विवाह की बात छिपाता है, जिससे वह विवाह कर रहा है। इसके लिये जुर्माने के साथ दस वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- धारा 81 का मूल तत्त्व प्रवंचना है: इस अपराध के लिये यह आवश्यक है कि महिला को वास्तव में इस विश्वास में छलपूर्वक रखा गया हो कि उसका विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ है।
- द्विविवाह के अपवाद: धारा 82 निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू नहीं होती:
- सक्षम न्यायालय द्वारा पूर्ववर्ती विवाह को शून्य घोषित कर दिया गया हो, या
- पूर्ववर्ती पति या पत्नी लगातार सात वर्षों से अनुपस्थित हो और उसके जीवित होने के संबंध में कोई जानकारी प्राप्त न हुई हो, बशर्ते कि इस तथ्य का प्रकटीकरण उस व्यक्ति के समक्ष कर दिया गया हो जिससे विवाह किया जा रहा है।
- तथ्य छिपाने से अपराध की गंभीरता बढ़ती है: नए पति/पत्नी से पूर्ववर्ती विवाह को छिपाने पर धारा 82(2) के अधीन अधिक कठोर दण्ड का उपबंध लागू होता है।
आपराधिक कानून
वैवाहिक गृह में रहने वाले व्यक्तियों को महिला की अस्वाभाविक मृत्यु के संबंध में स्पष्टीकरण देना होगा
03-Nov-2026
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रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य “साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अधीन, सांविधिक भार अपीलार्थी पर अत्यधिक रूप से अध्यारोपित था।” न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति संदीप मेहता एवं न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय की खंडपीठ ने 2 नवंबर 2026 को रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अपील खारिज कर दी तथा भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के अंतर्गत पत्नी की हत्या के अपराध में पति की दोषसिद्धि और उसे दिये गए आजीवन कारावास के दंडादेश को बरकरार रखा।
रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मृतका विमलबाई का विवाह अपीलार्थी रामकिशन के साथ हुआ था।
- अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अभियुक्तगण ने अवैध दहेज की माँगों को लेकर उसके साथ उत्पीड़न एवं क्रूरता का व्यवहार किया था।
- परिवादी नारायण (PW-2) के अनुसार, विमलबाई अपने मायके आने पर अपने परिवार के सदस्यों को बताती थी कि:
- अभियुक्त उसके साथ मारपीट करता था,
- वे उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे तथा भूखा रखते थे, और
- एक घटना में उसे रस्सी से बाँधकर कुएँ में नीचे लटकाया गया था तथा धमकी दी गई थी कि यदि दहेज की माँगें पूरी नहीं की गईं, तो उसकी हत्या कर दी जाएगी।
- विमलबाई की उसके वैवाहिक गृह में अस्वाभाविक मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वह अपीलार्थी के साथ अकेली थी।
- अपीलार्थी की प्रतिरक्षा यह थी कि उसकी मृत्यु एक दुर्घटना थी। उसने दावा किया कि जब वे यौन संबंध स्थापित कर रहे थे, तब विमलबाई को अचानक मिर्गी का दौरा पड़ा और उसे चक्कर आ गए थे।
- अधीनस्थ न्यायालयों ने अभियुक्तों को दोषसिद्ध ठहराते हुए आजीवन कारावास का दंडादेश दिया।
- इसके पश्चात् अभियुक्तों ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील दायर की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- जब किसी पत्नी की उसके वैवाहिक गृह में, पति के साथ अकेले रहते हुए, अस्वाभाविक मृत्यु हो जाती है, तो क्या साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पति पर यह स्पष्टीकरण देने का भार अध्यारोपित करती है कि उसकी मृत्यु कैसे हुई? तथा यदि वह कोई स्पष्टीकरण नहीं देता अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, तो मामले पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के संबंध में:
- न्यायालय ने इस तथ्य पर बल दिया कि विमलबाई की अस्वाभाविक मृत्यु के समय वह वैवाहिक गृह में अपीलार्थी के साथ अकेली थी।
- चूँकि अपीलार्थी को गृह की एकांत परिस्थितियों में अपनी पत्नी की अभिरक्षा प्राप्त थी, इसलिये धारा 106 के अंतर्गत उस पर भारी सांविधिक भार अध्यारोपित था। उसके लिये यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि उसकी पत्नी की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई। इसके लिये उसे सुसंगत, विश्वसनीय एवं संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना था।
- अपीलार्थी इस भार का निर्वहन करने में विफल रहा। इसके विपरीत, उसने मिर्गी का दौरा पड़ने की मिथ्या एवं मनगढ़ंत प्रतिरक्षा प्रस्तुत की, जबकि चिकित्सकीय साक्ष्य एवं शव-परीक्षण के निष्कर्षों ने इस प्रतिरक्षा को अस्वीकार कर दिया।
अवलंबित पूर्व निर्णय के संबंध में:
- न्यायालय ने त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006) के मामले पर विश्वास किया जिसमें कहा गया था कि धारा 106 किसी घर में रहने वालों पर यह स्पष्ट करने का भार डालती है कि उसके अंदर अपराध कैसे हुआ।
- घर में रहने वालों यह तर्क देकर मौन नहीं रह सकते और कोई स्पष्टीकरण देने से बच नहीं सकते कि समस्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का भार केवल अभियोजन पक्ष पर है।
अतिरिक्त कड़ी के रूप में मिथ्या प्रतिरक्षा के संबंध में:
- अपीलार्थी युक्तियुक्त स्पष्टीकरण देने में विफल रहा तथा उसने मिथ्या प्रतिरक्षा भी प्रस्तुत की।
- इन दोनों परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर, उन्होंने दोषसिद्धि को पुष्ट करने वाली एक अतिरिक्त अभियोगात्मक कड़ी प्रदान की, जिससे परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला पूर्ण हो गई। इससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत हत्या के अपराध में उसकी दोषिता स्थापित हुई।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113ख के अंतर्गत उपधारणा के संबंध में:
- PW-2 ने दहेज की माँगों को लेकर निरंतर उत्पीड़न एवं क्रूरता किए जाने के संबंध में स्पष्ट साक्ष्य दिया।
- उसकी साक्ष्य की निम्नलिखित साक्षियों द्वारा सुदृढ़ पुष्टि की गई:
- संभाजी तुरतवाड़ (PW-3), जिन्होंने विवाह तय कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी,
- रामराव (PW-4), मृतका के पिता, जिन्होंने बार-बार दहेज की माँग किये जाने तथा शारीरिक उत्पीड़न की पुष्टि की, और
- वैजनाथ संभाजी मारपटवार (PW-5) एवं महाजन मुंजाजी येम्बलवाड़ (PW-6), जो मृतका के मायके के दो स्वतंत्र पड़ोसी थे।
- अतः न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तगण साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के अंतर्गत सांविधिक उपधारणा का खंडन करने में विफल रहे तथा अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा उन्हें दोषसिद्ध ठहराना उचित था।
निर्णय:
- अपील खारिज कर दी गई।
- दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के दंडादेश को बरकरार रखा गया ।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 109 क्या है?
बारे में:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 109 विशेषत: ज्ञात तथ्य को साबित करने के भार से संबंधित है, जो किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो।
- इसमें यह उपबंधित है कि जब कोई तथ्य किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होगा।
- यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अध्याय 7 के अंतर्गत आती है, जो सबूत के भार से संबंधित है।
दृष्टांत:
- (क) जबकि कोई व्यक्ति किसी कार्य को उस आशय से भिन्न किसी आशय से करता है, जिसे उस कार्य का स्वरूप और परिस्थितियां इंगित करती हैं, तब उस आशय को साबित करने का भार उस पर है।
- (ख) ख पर रेल से बिना टिकट यात्रा करने का आरोप है। यह साबित करने का भार कि उसके पास टिकट था उस पर है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सामान्य नियम का अपवाद: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 104 के अंतर्गत, जो व्यक्ति किसी तथ्य का अभिकथन करता है, उस तथ्य को साबित करने का भार उसी पर होता है। धारा 109 इस सामान्य नियम का अपवाद है।
- अभियोजन का प्राथमिक भार यथावत् रहता है: धारा 109 अभियोजन पक्ष को युक्तियुक्त संदेह से परे अपराध साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करती। यह तभी लागू होती है, जब अभियोजन पक्ष आधारभूत तथ्यों को साबित कर चुका हो।
- घर में रहने वाले लोग: जब कोई अपराध किसी गृह के भीतर, लोकदृष्टि से परे घटित होता है, तो वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपराध घटित होने की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण दें।
- मौन अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण अभियुक्त के विरुद्ध विचारणीय होगा: यदि अभियुक्त अपने विशेष ज्ञान में आने वाले तथ्यों के संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं देता अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, तो यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला में एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में कार्य कर सकता है। तथापि, यह दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 109, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 106 के समतुल्य है। दोनों के शब्दांकन एवं दोनों दृष्टांतों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 106 में यह उपबंधित है कि जब कोई तथ्य किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होगा।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 106 लागू की, क्योंकि घटना भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के प्रवृत्त होने से पूर्व घटित हुई थी ।
- त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 106 के अंतर्गत गृह के अंतःवासियों पर यह दायित्व अध्यारोपित होता है कि वे गृह के भीतर घटित अपराध की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण दें। गृह के अंतःवासी मौन रहकर यह तर्क नहीं दे सकते कि संपूर्ण भार अभियोजन पक्ष पर है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 क्या है?
बारे में:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 दहेज मृत्यु के संबंध में उपधारणा से संबंधित है।
- यह तब लागू होती है, जब यह प्रश्न विचाराधीन हो कि किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज मृत्यु कारित की है या नहीं तथा यह दर्शाया गया हो कि उसकी मृत्यु से ठीक पूर्व उस व्यक्ति ने दहेज की माँग के संबंध में अथवा उसके संबंध में उस महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया था।
- ऐसी स्थिति में न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि उक्त व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अनिवार्य उपधारणा: “उपधारणा करेगा” (Shall Presume) शब्दों के प्रयोग से यह उपधारणा अनिवार्य हो जाती है, बशर्ते इसके आधारभूत तथ्य साबित कर दिये गए हों। तथापि, अभियुक्त को इस उपधारणा का खंडन करने का अवसर प्राप्त रहता है।
- दहेज मृत्यु का अर्थ: “दहेज मृत्यु” का वही अर्थ है, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 80 में दिया गया है। इससे पूर्व यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304ख के अंतर्गत उपबंधित थी।
- “मृत्यु से ठीक पूर्व”: क्रूरता अथवा उत्पीड़न और मृत्यु के बीच निकट एवं जीवंत संबंध होना आवश्यक है।
- अभियुक्त पर भार का स्थानांतरण: अभियोजन पक्ष द्वारा आधारभूत तथ्यों को साबित कर दिये जाने के पश्चात् अभियुक्त पर इस वैधानिक उपधारणा का खंडन करने का भार आ जाता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113ख:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 118, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 113ख के समतुल्य है।
- वर्तमान मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तगण भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 113ख के अंतर्गत उत्पन्न उपधारणा का खंडन करने में विफल रहे।