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उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक परीक्षाओं के लिये तीन वर्षीय अभ्यास नियम को घटाकर एक वर्ष कर दिया है
«24-Aug-2026 | दृष्टि लेखक
विषयसूची |
उच्चतम न्यायालय ने सिविल न्यायाधीश (कनिष्ठ खंड) के पद पर नियुक्ति के लिये पूर्व में निर्धारित तीन वर्षीय विधिक व्यवसाय के अभ्यास की अनिवार्यता में संशोधन करते हुए न्यायिक सेवा के अभ्यर्थियों को महत्त्वपूर्ण राहत प्रदान की है।
भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ और संबंधित मामलों (2026) में, न्यायालय ने विधिक व्यवसाय के व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता को बरकरार रखा, किंतु न्यायिक सेवा में प्रवेश से पूर्व आवश्यक विधि-व्यवसाय अभ्यास की अवधि को तीन वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दिया। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि न्यायालय ने 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिये एक संक्रमणकालीन छूट प्रदान की है।
न्यायिक परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विधि के नए स्नातकों के लिये, इससे न्यायिक सेवा में प्रवेश करने के अवसर में काफी विस्तार होता है।
तीन वर्षीय विधि-व्यवसाय नियम क्या था?
- मई 2025 में, उच्चतम न्यायालय ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में नियुक्ति के लिये आवेदन करने से पहले अभ्यर्थी के लिये तीन वर्ष के विधिक व्यवसाय के अभ्यास की अनिवार्यता को बहाल कर दिया।
- न्यायालय ने तर्क दिया कि न्यायिक अधिकारियों को न्यायिक उत्तरदायित्व संभालने से पहले न्यायालय कार्यवाही, प्रक्रियात्मक विधि, अधिवक्ताओं और वादियों के साथ व्यावहारिक अनुभव होना चाहिये।
- यद्यपि, बाद में यह चिंता जताई गई कि अनिवार्य तीन वर्ष की प्रतीक्षा अवधि युवा स्नातकों के लिये कठिनाई उत्पन्न कर सकती है और प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों को न्यायिक सेवा में प्रवेश करने से हतोत्साहित कर सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने क्या परिवर्तन किये हैं?
उच्चतम न्यायालय ने अब ढाँचे में संशोधन कर दिया है।
|
विशेषताएँ |
नवीन व्यवस्था |
|
पूर्व विधि-व्यवसाय अभ्यास की अनिवार्यता |
3 वर्ष |
|
संशोधित अभ्यास की अनिवार्यता |
1 वर्ष |
|
संक्रमणकालीन अवधि |
1 मार्च 2027 तक |
|
चयन के पश्चात प्रशिक्षण |
1 वर्ष |
|
संरचित विधि लिपिकीय प्रशिक्षण |
1 वर्ष |
|
नियमित नियुक्ति |
तोषजनक रूप से प्रशिक्षण पूर्ण करने के पश्चात |
इसलिये न्यायालय ने भर्ती से पहले बार में पूरी अवधि पूरी करने की आवश्यकता के बजाय अभ्यास + संस्थागत प्रशिक्षण + व्यावहारिक क्लर्कशिप के संयोजन की ओर रुख किया है।
31 मार्च 2027 तक कौन आवेदन कर सकता है?
- वर्तमान न्यायिक पद के अभ्यर्थियों के लिये निर्णय का यह सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है।
- 31 मार्च 2027 को समाप्त होने वाली संक्रमणकालीन अवधि के अंतर्गत आने वाले भर्ती विज्ञापनों के लिये, विधि-स्नातक पहले की तीन वर्ष की अभ्यास आवश्यकता को पूरा न करने के बावजूद छूट का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
- संक्रमणकालीन योजना के प्रयोजन के लिये ऐसे अभ्यर्थियों को एक वर्ष का सक्रिय अभ्यास पूरा कर लिया हुआ माना जाएगा ।
- इससे नए स्नातकों को इस अवधि के दौरान अधिसूचित सिविल जज परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा करने का एक और अवसर मिलता है।
चयन के पश्चात क्या होगा?
- नई प्रणाली के अधीन चयनित अभ्यर्थी सिविल न्यायाधीश के रूप में तुरंत नियमित सेवा शुरू नहीं करेंगे।
- उन्हें सर्वप्रथम प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाएगा और वे निम्नलिखित प्रशिक्षण से गुजरेंगे:
- चयन → एक वर्षीय राज्य न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण → एक वर्षीय संरचित क्लर्कशिप → मूल्यांकन → नियमित नियुक्ति
- इस क्लर्कशिप में जिला न्यायपालिका और उच्च न्यायालय दोनों स्तरों पर व्यावहारिक अनुभव शामिल होगा ।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि अभ्यर्थी स्वतंत्र न्यायिक कार्यों का निर्वहन करने से पहले व्यावहारिक न्यायिक अनुभव प्राप्त कर लें।
1 अप्रैल 2027 से क्या परिवर्तन होंगे?
- 1 अप्रैल 2027 से जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिये, अभ्यर्थियों को सामान्यतः कम से कम एक वर्ष के वास्तविक विधिक अभ्यास की आवश्यकता होगी ।
- इस प्रकार की प्रथा को निर्धारित प्रैक्टिस सर्टिफिकेट प्रक्रिया के माध्यम से स्थापित करना होगा।
- इसलिये, अभ्यर्थियों को इस अंतर को याद रखना चाहिये:
31 मार्च 2027 तक → विधि स्नातकों के लिये संक्रमणकालीन छूट
1 अप्रैल 2027 से → न्यूनतम एक वर्ष का वास्तविक अभ्यास अनिवार्य
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से सिविल जज बनने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है। न्यायिक सेवा में प्रवेश करने से पहले तीन वर्ष तक वकालत करने की अनिवार्यता के बजाय, नए ढाँचे में एक वर्ष का अभ्यास, न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण और संरचित क्लर्कशिप को शामिल किया गया है।
विधि के नवस्नातकों के लिये 31 मार्च 2027 तक की अवधि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। अभ्यर्थियों को आगामी राज्य न्यायिक सेवा अधिसूचनाओं पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिये और यह मानकर नहीं चलना चाहिये कि तीन वर्ष के अभ्यास की कमी उन्हें अपात्र बना देती है, अपितु अपनी तैयारी जारी रखनी चाहिये।
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