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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

किसी उपकरण द्वारा योनि में प्रवेश कराना भी बलात्संग की श्रेणी में आता है

 31-Jul-2026

जॉशी के.जे. बनाम केरल राज्य 

"योनि के छिद्रअर्थात् लेबिया मेजोरा या वल्वा पर कंपन करने वाली मशीन (वाइब्रेटिंग) रखना ही प्रवेश साबित करने के लिये पर्याप्त होगा... और यह मानने के लिये पर्याप्त है कि किसी व्यक्ति ने धारा 3(ख) के अधीन परिभाषित प्रवेशन लैंगिक हमले का अपराध किया हैजो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन दण्डनीय है।" 

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ नेजॉशी के.जे. बनाम केरल राज्य (2026) के मामलेमें 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार के लिये अपीलकर्ता के दण्ड को बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता के योनि द्वार पर कंपन करने वाले उपकरण को कंपन मोड में रखना लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमले के साथ-साथ भारतीय दण्ड संहिता के अधीन बलात्संग के समान है। 

जॉशी के.जे. बनाम केरल राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्ताजो दूसरे अभियुक्त द्वारा संचालित एक कॉस्मेटोलॉजी सेंटर का प्रबंधन करती थीपर आरोप है कि उसने 17 वर्षीय पीड़िता को जबरदस्ती एक उपचार बिस्तर पर लिटायाउसके अंतर्वस्त्र उतार दिये और कंपनकारी मोड में उसकी योनि पर वाइब्रेटर से सुसज्जित लिंग के आकार का उपकरण रख दिया। 
  • आरोप है कि उसने पीड़िता को धमकाया जिससे वह इस घटना के बारे में किसी को न बताए। 
  • यद्यपि पीड़िता ने उक्त घटना की जानकारी द्वितीय अभियुक्त को दी थीतथापि उसने इसे मात्र एक मज़ाक समझकर अनदेखा कर दिया। विधि द्वारा अधिरोपित वैधानिक दायित्व के अनुरूप घटना की सूचना देने में विफल रहने के कारण द्वितीय अभियुक्त को पृथक रूप से अभियुक्त बनाया गया थातथापि विचारण न्यायालय ने उसे उक्त आरोप से दोषमुक्त कर दिया 
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(1), 375(), 354ख और 506(i) के अधीन और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 4(1) के साथ धारा 3(ख) के अधीन दोषसिद्ध ठहराया। 
  • अपीलकर्ता ने केरल उच्च न्यायालय के समक्ष दोषसिद्धि को चुनौती दीजिसमें प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में दो वर्ष के विलंबचिकित्सा या वैज्ञानिक साक्ष्य का अभाव और घटना के समय पीड़िता के वयस्क होने की आशंका जैसे आधार उठाए गए। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रवेशन लैंगिक हमले की परिभाषा पर:न्यायालय ने माना कि लेबिया मेजोरा या वल्वा पर कंपन उपकरण रखना ही लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 3(ख) को आकर्षित करने के लिये पर्याप्त प्रवेश हैजो धारा के अधीन दण्डनीय हैऔर तदनुसार भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375(ख) के अधीन बलात्संग के समान है।
  • पीड़िता की आयु के संबंध में:न्यायालय ने पीड़िता के वयस्क होने के दावे को खारिज कर दियाक्योंकि SSLC पुस्तिका और जन्म प्रमाण पत्र के माध्यम से यह साबित हो गया था कि वह 18 वर्ष से कम आयु की थी - और इस प्रकार अधिनियम के अधीन 'बच्चीथी। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में देरी के संबंध में:न्यायालय ने विलंब को पर्याप्त रूप से स्पष्ट पायायह देखते हुए कि पीड़िता को धमकी दी जा रही थी और वह दूसरे अभियुक्त की एक असंबंधित मामले में गिरफ्तारी के बाद ही घटना का प्रकटन कर सकी। 
  • पीड़िता के परिसाक्ष्य की विश्वसनीयता पर:न्यायालय ने कहा कि पीड़िता की प्रारंभिक परीक्षा की गई और उसे परिसाक्ष्य के लिये सक्षम पाया गयाऔर मामूली विरोधाभासों के होते हुए भी उसका कथन सुसंगत रहाजिसमें हमले की अवधि या उसकी असुविधा का तुरंत प्रकटन न करने का उसका स्पष्टीकरण भी शामिल है। 
  • दण्ड देते समय:चूँकि विधि द्वारा निर्धारित न्यूनतम दण्ड पहले ही दिया जा चुका थाइसलिये न्यायालय ने माना कि विधि के अनुसार इसमें और कमी करना संभव नहीं है। 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:विचारण न्यायालय द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन में कोई खामी न पाते हुएउच्च न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और दोषसिद्धि को बरकरार रखा। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमला क्या है? 

धारा 3 – प्रवेशन लैंगिक हमला 

यदि कोई व्यक्ति निम्न कार्य करता है तो वह प्रवेशन लैंगिक हमले का अपराध करता है, यदि वह: 

  • अपना लिंगकिसी भी सीमा तक किसी बालक की योनिमुंहमूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश करता है या बालक से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाता है; या  
  • किसी वस्तु या शरीर के किसी ऐसे भाग कोजो लिंग नहीं हैकिसी सीमा तक बालक की योनिमूत्रमार्ग या गुदा में घुसेड़ता है या बालक से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाता है; या  
  • बालक के शरीर के किसी भाग के साथ ऐसा अभिचालन करता है जिससे वह बालक की योनिमूत्रमार्ग या गुदा या शरीर के किसी भाग में प्रवेश कर सके या बालक से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाता हैया 
  • बालक के लिंगयोनिगुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगाता है या ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति के साथ बालक से ऐसा करवाता है 

धारा 4 – प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दण्ड : 

  • उपधारा (1):किसी भांति के कारावास सेजिसकी अवधि (दस वर्ष) से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगीदंडित किया जाएगा और जुमनि से भी दण्डनीय होगा 
  • उपधारा (2):जहाँ पीड़ित 16 वर्ष से कम आयु का हैवहाँ दण्ड की अवधि बीस वर्ष से कम की नहीं होगीकिंतु जो आजीवन कारावासजिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेप प्राकृत जीवनकाल के लिये कारावास होगातक की हो सकेगीदण्डित किया जाएगा और वह जुमनि का भी दायी होगा 
  • उपधारा (3):उपधारा (1) के अधीन अधिरोपित जुर्माना न्यायोचित और युक्तियुक्त होना चाहियेऔर पीड़ित को चिकित्सा व्यय और पुनर्वास के लिये संदाय किया जाना चाहिये 

संदर्भ तालिका: 

उपबंध  

प्रयोज्यता 

न्यूनतम दण्ड 

अधिकतम दण्ड 

धारा 4(1) 

पीड़ित की आयु 16 वर्ष से 18 वर्ष के मध्य 

10 वर्ष का कठोर कारावास 

आजीवन कारावास 

धारा 4(2) 

पीड़ित की आयु 16 वर्ष से कम 

20 वर्ष का कठोर कारावास 

प्राकृत जीवनकाल की शेष अवधि तक आजीवन कारावास 

धारा 4(3) 

अर्थदण्ड (दोनों श्रेणियों में लागू) 

न्यायोचित एवं युक्तिसंगत अर्थदण्ड 

अर्थदण्ड की राशि पीड़ित के चिकित्सा उपचार एवं पुनर्वास संबंधी व्ययों के संदाय हेतु देय होगी। 


आपराधिक कानून

अपील अधिकारिता में दोषमुक्ति के उलटफेर के विरुद्ध अपील करने का अधिकार

 31-Jul-2026

विष्णु कुमार गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य 

"यह उपबंध... स्पष्ट रूप से केवल उसी न्यायालय के विरुद्ध अपील की परिकल्पना करता है जिसने स्वयं विचारण किया हो।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने निर्णय दिया कि सेशन न्यायालय द्वारा अपील अधिकारिता का प्रयोग करते हुए विचारण न्यायालय के दोषमुक्त करने के आदेश को पलटते हुए दी गई दोषसिद्धि के विरुद्ध उच्च न्यायालय मेंधारा 374 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 415 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुरूप)के अधीन कोई सांविधिक अपील विचारण योग्य नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति मेंदोषी व्यक्ति के पास एकमात्र उपचार धारा 397 को धारा 401 (धारा 438 को धारा 442 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुरूप) के साथ मिलाकर पुनरीक्षण याचिका दायर करना है।  

विष्णु कुमार गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अपीलकर्ता को प्रारंभ में दोषमुक्त कर दिया गया था। 
  • परिवादकर्त्ता ने धारा 378 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 419 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुरूप) के अधीन सेशन न्यायालय में अपील दायर करके दोषमुक्त किये  जाने को चुनौती दी। 
  • सेशन न्यायालय ने अपनी अपील अधिकारिता का प्रयोग करते हुए दोषमुक्त करने के निर्णय को पलट दिया और अपीलकर्ता को प्रथम बार दोषसिद्ध ठहराया। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्ता ने सेशन न्यायालय के दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए धारा 374 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 415 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुरूप) के अधीन उच्च न्यायालय में एक और अपील दायर की। 
  • उच्च न्यायालय ने अपील को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दियायह कहते हुए कि सेशन न्यायालय द्वारा अपील अधिकारिता में अभिलिखित दोषसिद्धि के विरुद्ध दूसरी सांविधिक अपील का कोई प्रावधान नहीं हैऔर उचित उपचार पुनरीक्षण याचिका है। 
  • इसके बाद अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या धारा 374 दण्ड प्रक्रिया संहिता/धारा 415 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन किसी सेशन न्यायालय द्वारा अपील अधिकारिता का प्रयोग करते हुए और विचारण न्यायालय के दोषमुक्त करने के निर्णय को पलटते हुए अभिलिखित की गई दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील विचारणीय है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 374 के दायरे के संबंध मेंन्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 374 के अंतर्गत केवल उसी न्यायालय से अपील की जा सकती है जिसने स्वयं विचारण की कार्यवाही की होअर्थात् वह न्यायालय जिसके समक्ष आरोप विरचित करने से कार्यवाही प्रारंभ होती है और दोषसिद्धि और दण्ड के निर्णय के साथ समाप्त होती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 378 के अंतर्गत अपील अधिकारिता का प्रयोग करने वाला सेशन न्यायालय इस परिभाषा के अंतर्गत नहीं आताक्योंकि उसने स्वयं विचारण की कार्यवाही नहीं की है। 
  • विचारण और अपील अधिकारिता के बीच अंतर पर:पीठ ने तर्क दिया कि चूँकि सेशन न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के निर्णय को पलटना अपील शक्तियों के प्रयोग में पारित किया गया थान कि "विचारण" के आधार परइसलिये धारा 374 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन सांविधिक अपील तंत्र को ऐसे आदेश के विरुद्ध लागू नहीं किया जा सकता है।
  • कार्यवाही की निरंतरता के सिद्धांत पर:न्यायालय ने अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि अपील मात्र विचारण की कार्यवाही की निरंतरता हैऔर यह सिद्धांत धारा 374(2) के प्रयोजनों के लिये अपील न्यायालय को विचारण की कार्यवाही में परिवर्तित कर देता है। पीठ ने टिप्पणी की कि यह सिद्धांत विचारण और अपील के बीच प्रक्रियात्मक निरंतरता की व्याख्या करता हैलेकिन यह स्वयं अपील न्यायालय को विचारण की कार्यवाही की अधिकारिता रखने वाले न्यायालय में परिवर्तित नहीं करता है। 
  • अरुण शर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2019) के मामले की वैधता पर:न्यायालय ने इस मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के तर्क को अस्वीकार कर दियायह देखते हुए कि उसने कार्यवाही जारी रखने के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि अपील दोषसिद्धि "विचारण पर दोषसिद्धि" हैजबकि यह पर्याप्त रूप से प्रदर्शित नहीं किया गया था कि बाद वाला पहले वाले से कैसे सिद्ध होता है। न्यायालय ने इस तर्क को विधिक रूप से गलत माना। 
  • सही उपचार पर:न्यायालय ने माना कि चूँकि दण्ड प्रक्रिया संहिता या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कोई उपबंध सेशन न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किये  जाने के अपील उलटफेर के विरुद्ध सांविधिक अपील की अनुमति नहीं देता हैइसलिये  एकमात्र उपलब्ध उपचार धारा 397 को धारा 401 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 438 को धारा 442 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के साथ पढ़ा जाए) के अधीन पुनरीक्षण है। 
  • परिणाम के संबंध में:न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और उच्च न्यायालय के निर्णय की पुष्टि कीलेकिन अपीलकर्ता को सेशन न्यायालय के दोषसिद्धि के विरुद्ध पुनरीक्षण उपचार अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की। 

ऐसे मामलों में अपील और पुनरीक्षण को नियंत्रित करने वाला सांविधिक ढाँचा क्या है? 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 374/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 415 (दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील): 

  • यह उस न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का सांविधिक अधिकार प्रदान करता है जिसने स्वयं विचारण का संचालन किया हो। 
  • इस उपबंध के अधीन अपील उस विचारण न्यायालय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में की जा सकती है जिसने आरोप विरचित कियेसाक्ष्य अभिलिखित किये और दोषसिद्धि और दण्ड का निर्णय दिया 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 378/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 419 (दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील): 

  • यह उपबंध राज्य को याअनुमति सेपरिवादकर्त्ता को विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्ति के आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय में अपील दायर करने की अनुमति देता है। 

धारा 397 को धारा 401 दण्ड प्रक्रिया संहिता के साथ पढ़ा जाए / धारा 438 को धारा 442 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के साथ पढ़ा जाए (पुनरीक्षण अधिकारिता):  

  • यह उच्च न्यायालय (या सेशन न्यायालय) को निचले आपराधिक न्यायालय द्वारा पारित आदेश की शुद्धतावैधता या औचित्य की परीक्षा करने का पर्यवेक्षी अधिकार प्रदान करता है। 
  • अपील के विपरीतपुनरीक्षण एक विवेकाधीन उपचार है और इसमें तथ्यों और विधि पर पूरी तरह से पुनर्विचार शामिल नहीं होता है। 
  • यह वह उपचार है जो सेशन न्यायालय द्वारा प्रथम बार दोषसिद्ध ठहराए गए व्यक्ति को दोषमुक्त किये जाने के विरुद्ध अपील करने की शक्तियों का प्रयोग करते समय उपलब्ध होता है।