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आपराधिक कानून
जमानत और अपीलीय न्यायालय में उपस्थिति संबंधी आवश्यकताएँ
« »19-Jan-2026
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मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य "अपीलकर्त्ता-अभियुक्त को प्रत्येक सुनवाई की तारीख पर अपीलीय या पुनरीक्षण न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने का निदेश देना उचित नहीं है, विशेषत: दण्डादेश के निलंबन और जमानत दिये जाने के पश्चात्।" न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने यह निर्णय दिया कि अपीलकर्त्ता-अभियुक्त को हर सुनवाई की तारीख पर अपीलीय या पुनरीक्षण न्यायालयों के समक्ष उपस्थित होने का निदेश देना उचित नहीं है, विशेषत: दण्डादेश के निलंबन का आदेश पारित होने और जमानत दिये जाने के पश्चात्।
मीनाक्षी बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के अंतर्गत अभियोजन कार्यवाही से उत्पन्न हुआ, जिसमें अपीलकर्त्ता की माता द्वारा क्रमशः 7,00,000 रुपए और 5,00,240 रुपए की राशि के दो चेकों के अनादरण के लिये उक्त कार्यवाही आरंभ हुई थी।
- चेक अनादरण हो गए, जिसके परिणामस्वरूप अभियुक्त को दोषी ठहराया गया और दण्डादेश पारित किया गया।
- उक्त दोषसिद्धि एवं दण्डादेश के विरुद्ध आपराधिक अपील (CRA No. 956/2017) दायर की गई, जो अपीलीय न्यायालय के समक्ष लंबित रही।
- 10 अक्टूबर 2017 को अपीलकर्त्ता को दण्डादेश के निलंबन का लाभ प्रदान करते हुए जमानत पर छोड़ दिया गया। ।
- जमानत का आदेश समय-समय पर बढ़ाया गया किंतु अंततः अपीलीय न्यायालय द्वारा इसे नामंजूर कर दिया गया और निरस्त कर दिया गया।
- अपीलकर्त्ता ने छह से अधिक बार अपने अधिवक्ता बदले, जिसके कारण अपीलीय न्यायालय ने प्रतिकूल कार्यवाही की।
- अपीलकर्त्ता की माता, सुश्री मैरी पाराशर, का कथित तौर पर निधन हो गया था, और एक मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया था, परंतु अपीलीय न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया और संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को इसकी सत्यता सत्यापित करने का निदेश दिया।
- अपीलकर्त्ता ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं (हर्पीस ज़ोस्टर से पीड़ित होने) के कारण 22 अगस्त, 2025 को छूट के लिये आवेदन दायर किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया और मामले को 4 सितंबर, 2025 तक के लिये स्थगित कर दिया गया।
- अपीलकर्त्ता के स्थगित तिथि पर न्यायालय पहुँचने से पहले ही मामले की सुनवाई शुरू हो गई, दण्डादेश का निलंबन और जमानत का आदेश वापस ले लिया गया और एक अजमानतीय वारण्ट (NBW) जारी कर दिया गया।
- 20 सितंबर, 2025 को अपीलकर्त्ता ने आत्मसमर्पण किया और जमानत मांगी, परंतु जमानत याचिका पर कोई आदेश पारित किये बिना ही उसे अभिरक्षा में ले लिया गया।
- इसके बाद 23 सितंबर, 2025 को जमानत याचिका नामंजूर कर दी गई।
- अपीलकर्त्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528/दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में CRM-M-56737/2025 याचिका दायर की, जिसे समयाभाव के कारण बार-बार स्थगित किया जाता रहा।
- उच्चतम न्यायालय ने 27 नवंबर, 2025 को नोटिस जारी किया और तत्पश्चात् अपीलकर्त्ता को रिहा कर दिया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि यह "भयानक और चौंकाने वाला" था कि अपीलीय न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर उपस्थिति पर बल दिया, विशेषत: तब जब सजादण्डादेश को निलंबित करने का आदेश पहले ही पारित हो चुका था।
- न्यायालय ने कहा कि अपीलीय न्यायालय के लिये उचित तरीका यह होता कि वह या तो एक एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त करे और अपील के गुण-दोष के आधार के आधार पर सुनवाई करे या यदि अधिवक्ता सहायता नहीं कर रहा हो तो अपीलकर्त्ता को वैकल्पिक व्यवस्था करने का अवसर प्रदान करे।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि अपीलीय कार्यवाही आठ वर्षों से अधिक समय से लंबित थी, जो "किसी भी आधार पर उचित नहीं थी," लेकिन यह माना कि केवल यही बात अपीलीय न्यायालय द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण को उचित नहीं ठहराएगी।
- न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि हरियाणा में, दण्डादेश के निलंबन और जमानत दिये जाने के बाद भी, सभी सुनवाई तिथियों पर अपीलीय न्यायालयों के समक्ष अभियुक्त व्यक्तियों की उपस्थिति अनिवार्य करने की प्रथा प्रचलित थी।
- यह प्रथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की अनुसूची 2 में पाए जाने वाले प्रपत्र संख्या 45 (पुलिस स्टेशन या न्यायालय के प्रभारी अधिकारी के समक्ष उपस्थिति के लिये बंधपत्र और जमानत बंधपत्र) पर आधारित थी।
- न्यायालय ने माना कि पुनरीक्षण या अपीलीय न्यायालयों के समक्ष सुनवाई की प्रत्येक तिथि पर अभियुक्त को उपस्थित होने के लिये कहना अभियुक्त के लिये बोझिल होगा और यह बिल्कुल भी उचित नहीं है, और इसका कोई उद्देश्य नहीं है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अपील या पुनरीक्षण याचिका खारिज होने की स्थिति में, इसके परिणाम स्वतः ही लागू होंगे और संबंधित मजिस्ट्रेट अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ऐसे अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिएयेपूरी तरह से सशक्त होगा।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि आदेश की एक प्रति पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए जिससे उचित परिपत्र जारी करके इसे जिला न्यायपालिका में प्रसारित किया जा सके।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्त्ता को 27 नवंबर, 2025 को दी गई जमानत अपील के निपटारे तक प्रभावी रहेगी, और अपीलकर्त्ता अपील न्यायालय के साथ शीघ्र निपटारे में सहयोग करेगा, अधिमानतः तीन महीने के भीतर।
जमानत से संबंधित सांविधिक उपबंध क्या हैं?
- भारतीय जमानत प्रणाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अध्याय 35 के अधीन संचालित होती है, जिसने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है । सांविधिक ढाँचा जमानतीय और अजमानतीय अपराधों के बीच एक द्विभाजित वर्गीकरण बनाता है, और रिहाई पर विचार के लिये विभिन्न प्रक्रियात्मक मार्ग स्थापित करता है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 के अधीन जमानतीय अपराधों के अभियुक्तों को उचित जमानत राशि जमा करने पर जमानत का पूर्ण अधिकार है। थानों और न्यायालयों के प्रभारी पुलिस अधिकारियों के पास निर्धारित जमानतीय अपराधों के लिये जमानत नामंजूर करने का विवेकाधिकार नहीं है, जिससे सांविधिक शर्तों का पालन करने पर तत्काल रिहाई सुनिश्चित होती है।
- धारा 480 के अंतर्गत अजमानतीय अपराधों के लिये न्यायिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है, जो अपराध की गंभीरता, साक्ष्य की मजबूती और अभियुक्त के पूर्ववृत्त सहित सांविधिक मानदंडों पर आधारित होता है। न्यायालयों को विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग करते समय धारा 480(3) में निर्धारित कारकों पर विचार करना चाहिये, जिनमें साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना, साक्षियों को धमकाना और भागने का जोखिम सम्मिलित है।
- धारा 482 अग्रिम जमानत का उपबंध करती है, जिससे अजमानतीय अपराधों के लिये गिरफ्तारी की आशंका रखने वाले व्यक्ति सेशन न्यायालयों या उच्च न्यायालयों से गिरफ्तारी से पहले सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं। यह उपबंध अन्वेषण प्राधिकरण को बनाए रखते हुए मनमानी निरोध के विरुद्ध सांविधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- सांविधिक ढाँचा धारा 187 के अधीन स्वतः जमानत का उपबंध करता है जब अन्वेषण विहित समय सीमा से अधिक हो जाता है, जिससे बिना विचारण के अनिश्चितकालीन निरोध को रोकने के लिये "व्यतिकारी जमानत" सिद्धांत लागू होता है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 क्या है?
बारे में:
- धारा 138 अपर्याप्त धनराशि या निर्धारित राशि से अधिक होने के कारण चेक के अनादरण को सांविधिक अपराध बनाती है।
- इस धारा के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिये जिन आवश्यक तत्त्वों का पूरा होना आवश्यक है, वे निम्नलिखित हैं:
- प्राथमिक आवश्यकता : किसी व्यक्ति द्वारा अपने बैंक खाते से किसी अन्य व्यक्ति को धन के संदाय के लिये जारी किया गया चेक अपर्याप्त धनराशि या निर्धारित ओवरड्राफ्ट सीमा से अधिक होने के कारण बैंक द्वारा अवैतनिक लौटाया जाना चाहिये।
परंतुक के अंतर्गत तीन अनिवार्य शर्तें:
- चेक जारी होने की तारीख से छह मास के भीतर या उसकी वैधता अवधि के भीतर, जो भी पहले हो, बैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिये।
- चेक पाने वाला या धारक को चेक के अनादरण होने की सूचना बैंक से प्राप्त होने की तिथि से तीस दिनों के भीतर, चेक के लेखिवाल को लिखित मांग नोटिस जारी करना होगा।
- चेक लेखिवाल द्वारा उक्त नोटिस प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर चेक की राशि का संदाय करने में असफल रहना चाहिये।
- दण्डात्मक उपबंध : इन शर्तों के पूरा होने पर, चेक लेखिवाल एक अपराध करता है जिसके लिये दो वर्ष तक का कारावास, या चेक की राशि के दोगुने तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
- दायरे की परिसीमा : इस धारा के अंतर्गत केवल वही ऋण अथवा दायित्त्व सम्मिलित होगा जो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो, जैसा कि इस धारा के स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है।