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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480(3)

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 28-Apr-2026

नारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य 

"चूँकि पश्चात्वर्ती अपराध के लिये दण्ड पाँच वर्ष से कम हैइसलिये धारा 480(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में विहित शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेनारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026)के मामले में निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 480(3) के अधीन विहित शर्तें उन मामलों में लागू नहीं की जा सकतीं जिनमें सात वर्ष से कम कारावास के दण्ड वाले अजमानतीय अपराध शामिल हैं। 

  • न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसने अपीलकर्त्ता की जमानत को केवल उन शर्तों के कथित उल्लंघन के आधार पर अपास्त कर दिया थाजिन्हें कभी लागू नहीं किया जाना चाहिये था। 

नारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता के विरुद्ध मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम, 1915 (MP Excise Act) के अधीन अवैध शराब रखने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था - यह एक ऐसा अपराध है जिसमें अधिकतम तीन वर्ष के कारावास के दण्ड का प्रावधान है और यह अजमानतीय प्रकृति का है। 
  • मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर पीठ) ने अजमानतीय मामलों में जमानत देने से संबंधित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480 के अधीन अपीलकर्त्ता को जमानत दी। यद्यपिजमानत देते समयउच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480(3) के अधीन विहित शर्तें अधिरोपित की 
  • तत्पश्चात् , राज्य ने उच्च न्यायालय के समक्ष जमानत रद्द करने के लिये एक आवेदन दायर कियाजिसमें यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्त्ता ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है क्योंकि उसे फिर से 72 लीटर अवैध शराब के कब्जे में पाया गया है - यह एक ऐसा अपराध है जो उस अपराध के समान है जिसके लिये उसे जमानत दी गई थी। 
  • उच्च न्यायालय ने जमानत रद्द कर दीयह मानते हुए कि अपीलकर्त्ता ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया था और अपराध करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित की थी। 
  • इस आदेश से व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480(3) के अधीन शर्तें केवल तीन वर्ष के कारावास से दण्डनीय अपराध पर लागू नहीं होती हैंऔर इसलिये उनके उल्लंघन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

धारा 480(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की शर्तें सात वर्ष से कम की सजा वाले अपराधों पर लागू नहीं होती हैं: 

  • धारा 480(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन शर्तें केवल तभी अधिरोपित की जा सकती हैं जब अभियुक्त पर अजमानतीय अपराध का आरोप लगाया गया होजिसके लिये कम से कम सात वर्ष के कारावास का दण्ड होया भारतीय न्याय संहिता के अध्याय 6, 7, या 17 के अधीन अपराधों का आरोप लगाया गया होया ऐसे अपराधों के लिये दुष्प्रेरणषड्यंत्र या प्रयत्न करने का आरोप लगाया गया हो। 
  • चूँकि मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम के अधीन अपराध में अधिकतम तीन वर्ष के दण्ड का उपबंध हैइसलिये धारा 480(3) की शर्तें पूरी तरह से लागू नहीं होतीं और उच्च न्यायालय द्वारा इन्हें लागू नहीं किया जाना चाहिये था। 

अनुपयुक्त शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जमानत रद्द करना अनुचित है: 

  • चूँकि धारा 480(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अधिरोपित शर्तें पहली जगह में वैध रूप से लागू नहीं की जा सकती थींइसलिये उनके उल्लंघन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता जिससे जमानत रद्द करने को उचित ठहराया जा सके। 
  • इसलिये उच्च न्यायालय ने केवल इस आधार पर जमानत रद्द करने में त्रुटी की कि अपीलकर्त्ता एक ऐसे अपराध में शामिल था जिसके लिये पाँच वर्ष से कम के दण्ड का प्रावधान था। 

तदनुसारअपील मंजूर कर ली गई और उच्च न्यायालय के जमानत रद्द करने के आदेश को अपास्त कर दिया गया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480 – अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत ली जा सकेगी 

(पहले यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के अंतर्गत आता था)  

उपधारा (1) — जमानत देने की सामान्य शक्ति: 

  • जब कोई व्यक्तिजिस पर अजमानतीय अपराध का अभियोग है या जिस पर यह संदेह है कि उसने अजमानतीय अपराध किया हैपुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारण्ट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है तब वह जमानत पर छोड़ा जा सकेगा 
  • जमानत नहीं दी जाएगी यदि: 
    • यह विश्वास करने के लिये उचित आधार प्रतीत होता हैं कि वह व्यक्ति मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दोषी है (खंड i), या 
    • अपराध संज्ञेय है और व्यक्ति को पहले मृत्युदण्डआजीवन कारावास या 7+ वर्ष के दण्ड वाले अपराध के लिये दोषी ठहराया गया थाया दो या अधिक अवसरों पर 3-7 वर्ष के दण्ड वाले संज्ञेय अपराध के लिये दोषी ठहराया गया था (खंड ii)। 
  • अपवाद (परंतुक): 
    • खंड (i) या (ii) के अंतर्गत आने वाले शिशु महिला या रोगी/शिथिलांग व्यक्ति को जमानत दी जा सकती है। 
    • यदि न्यायालय उचित और न्यायसंगत समझे तो खंड (ii) के अंतर्गत किसी अन्य विशेष कारण से जमानत दी जा सकती है। 
    • साक्षियों द्वारा पहचान की आवश्यकता या 15 दिनों से अधिक की पुलिस अभिरक्षा अकेले जमानत देने से इंकार करने का पर्याप्त आधार नहीं हैबशर्ते कि अभियुक्त न्यायालय के निदेशों का पालन करने का वचन दे। 
    • जिन अपराधों के लिये मृत्युदण्डआजीवन कारावास या वर्ष से अधिक के दण्ड का प्रावधान हैउनके लिये लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर दिये बिना जमानत नहीं दी जा सकती। 

उपधारा (2) – अग्रिम जांच लंबित रहने तक जमानत: 

  • यदि अन्वेषणजांच या विचारण के किसी भी प्रक्रम मेंन्यायालय/अधिकारी को यह विश्वास करने के लिये कोई उचित आधार नहीं मिलता है कि अभियुक्त ने अजमानतीय अपराध किया हैकिंतु उसके दोषी होने के बारे में और जांच करने के लिये पर्याप्त आधार हैंतो अभियुक्त को धारा 492 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन जमानत या बंधपत्र पर छोड़ दिया जाएगा। 

उपधारा (3) — गंभीर अपराधों के लिये अनिवार्य शर्तें: 

  • जब उपधारा (1) के अधीन 7 वर्ष या उससे अधिक के दण्ड वाले अपराधोंया भारतीय न्याय संहिता के अध्याय 6, 7, या 17 के अधीन अपराधोंया ऐसे अपराधों के लिये दुष्प्रेरण/षड्यंत्र/प्रयत्न के लिये जमानत दी जाती हैतो न्यायालय निम्नलिखित शर्तें अधिरोपित करेगा: 
    • (क) बंधपत्र की शर्तों के अनुसार उपस्थिति। 
    • (ख) इसी प्रकार का कोई अपराध न करना। 
    • (ग) मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को उत्प्रेरणाधमकी या वचन न करनासाक्ष्य के साथ छेड़छाड़ न करना। 
    • इसके अतिरिक्तन्यायालय न्याय के हित में कोई अन्य शर्तें भी अधिरोपित कर सकता है। 
  • मुख्य नोट:ये शर्तें उन अपराधों परलागू नहीं होतींजिनके लिये 7 वर्ष से कम के दण्ड का प्रावधान है। 

उपधारा (4) — कारणों का अभिलेखन: 

  • उपधारा (1) या (2) के अधीन किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने वाले किसी अधिकारी या न्यायालय को लिखित में कारण या विशेष कारण अभिलिखित करने होंगे। 

उपधारा (5) — जमानत रद्द करने की शक्ति: 

  • जिस न्यायालय ने उपधारा (1) या (2) के अधीन किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ा हैवह यदि आवश्यक होतो ऐसे व्यक्ति की पुनः गिरफ्तारी और अभिरक्षा का निदेश दे सकता है। 

उपधारा (6) — विचारण में विलंब पर जमानत: 

  • मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय मामले मेंयदि अजमानतीय अपराध के अभियुक्त का विचारण साक्ष्य लेने के लिये निर्धारित पहली तारीख से 60 दिनों के भीतर समाप्त नहीं होता हैऔर अभियुक्त पूरे समय अभिरक्षा में रहा हैतो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगाजब तक कि मजिस्ट्रेट इसके विपरीत लिखित में कारण अभिलिखित न करे। 

उपधारा (7) — विचारण के पश्चात्निर्णय से पूर्व जमानत: 

  • यदि विचारण की सुनवाई समाप्त होने के पश्चात् और निर्णय दिये जाने से पूर्वन्यायालय को यह विश्वास हो जाता है कि अभियुक्त के दोषी न होने के पर्याप्त आधार हैंतो वह अभियुक्त को जमानत पर छोड़ देगा जिससे वह न्यायालय में उपस्थित होकर निर्णय सुन सके।