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आपराधिक कानून
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन मामलों में दोषमुक्ति की याचिका
«19-Jan-2026
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रेशमी ससींद्रन बनाम केरल राज्य और अन्य “पीड़ित व्यक्ति का कथन प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 2018 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराधों के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करेगा और एकमात्र पूर्णतः विश्वसनीय साक्षी का साक्ष्य भी इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये पर्याप्त होगा।" न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने रेशमी ससीन्द्रन बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि दोषमुक्ति याचिका पर विचार करते समय, पीड़ित व्यक्ति का कथन ही प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन अपराधों के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करेगा, और दोषमुक्ति याचिका की अस्वीकृति को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।
रेशमी ससीन्द्रन बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला 31 मार्च, 2023 को शाम 4:00 बजे भारत सर्विसेज फैसिलिटी मैनेजमेंट ऑफिस के सामने एक खुले स्थान पर आयोजित बैठक के दौरान घटी एक घटना से संबंधित है।
- यह कार्यालय इन्फोपार्क फेज-2, पदाथिक्कारा, पुथेंक्रूज गाँव के पास ट्रांस एशिया साइबर पार्क भवन के भूतल पर स्थित था।
- आरोप यह था कि अभियुक्त ने सार्वजनिक रूप से परिवादकर्त्ता को उसकी जाति के नाम से पुकार कर उसे अपमानित किया।
- यह घटना कथित तौर पर भरत सर्विसेज फैसिलिटी मैनेजमेंट ऑफिस के सफाई कर्मचारियों की मौजूदगी में घटी ।
- एर्नाकुलम शहर के इन्फोपार्क पुलिस स्टेशन में 9 मई, 2023 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी।
- थ्रिक्कारा के सहायक पुलिस आयुक्त ने 12 अक्टूबर, 2023 को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- अभियुक्त पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन दण्डनीय अपराधों का आरोप लगाया गया था।
- यह मामला अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (PoA) अधिनियम, 1989 के अधीन अपराधों के विचारण के लिये विशेष न्यायालय के समक्ष SC No. 1912/2023 के रूप में पंजीकृत किया गया था।
- अपीलकर्त्ता/अभियुक ने दिनांक 14 मई, 2025 को Crl. M.P. 901/2025 क्रमांकित एक दोषमुक्ति याचिका दायर की।
- विशेष न्यायालय ने 10 नवंबर, 2025 को अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने के बाद उसकी रिहाई याचिका खारिज कर दी।
- इसके बाद अभियुक्त ने आदेश को चुनौती देते हुए केरल उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील संख्या 2319/2025 दायर की।
- इस अपील पर सुनवाई के लिये 13 जनवरी, 2026 का दिन निर्धारित किया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्त्ता के अधिवक्ता ने मुख्य रूप से वास्तविक परिवादकर्त्ता और साक्षी संख्या 2 के कथनों पर विश्वास किया, यह तर्क देते हुए कि साक्षी संख्या 2 के कथन में अपीलकर्त्ता पर आपराधिक दोष सिद्ध करने वाले स्पष्ट कृत्य शामिल नहीं थे।
- न्यायालय ने वास्तविक परिवादकर्त्ता के कथन की परीक्षा की और पाया कि विशिष्ट आरोप हैं कि 31 मार्च, 2023 को लगभग शाम 4:00 बजे, अभियुक्त ने सफाई कर्मचारियों की उपस्थिति में उसे जातिगत नाम से पुकार कर गाली दी।
- न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (PoA) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराधों के गठन के लिये आवश्यक तत्त्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
- धारा 3(1)(थ) के अधीन अपराध के लिये अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी गैर-सदस्य द्वारा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी सदस्य के विरुद्ध जानबूझकर अपमान या धमकी देना आवश्यक है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक रूप से ऐसे सदस्य को अपमानित करना हो।
- न्यायालय ने माना कि किसी गैर-सदस्य द्वारा सार्वजनिक रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसी सदस्य को जाति के नाम से गाली देना धारा 3(1)(थ) के तहत अपराध होगा।
- न्यायालय ने पाया कि वास्तविक परिवादकर्त्ता के कथन में धारा 3(1)(थ) और 3(1)(द) के अधीन अपराध आकर्षित करने वाले तत्त्व प्रकट हुए।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि एक अकेले, पूरी तरह से विश्वसनीय साक्षी का साक्ष्य ही इस उद्देश्य के लिये पर्याप्त होगा।
- न्यायालय ने माना कि पीड़ित व्यक्ति के मात्र कथन से ही प्रथम दृष्टया आरोपित अपराधों के तत्त्व प्रकट हो जाते हैं।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मात्र संदेह के आधार पर आरोप विरचित करना पर्याप्त नहीं होगा।
- इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने पाया कि विवादित आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी और आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।
अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 क्या है?
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में:
- अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति अधिनियम 1989 संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के विरुद्ध विभेद को प्रतिषिद्ध करना और उनके विरुद्ध अत्याचारों का निवारण करना है।
- यह अधिनियम भारत की संसद में 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 को अधिसूचित किया गया।
- यह अधिनियम इस दुखद वास्तविकता की भी स्वीकृति है कि कई उपाय होते हुए भी, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोग उच्च जातियों के हाथों विभिन्न अत्याचारों के शिकार होते रहते हैं।
- यह अधिनियम भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 15, 17 और 21 में उल्लिखित स्पष्ट सांविधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है, जिसका दोहरा उद्देश्य इन कमजोर समुदायों के सदस्यों की रक्षा करना और साथ ही जाति-आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को अनुतोष और पुनर्वास प्रदान करना है।
अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति (संशोधन) अधिनियम, 2015:
- इस अधिनियम को वर्ष 2015 में निम्नलिखित प्रावधानों के साथ और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से संशोधित किया गया था:
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अपराधों के रूप में अत्याचार के अधिक मामलों को मान्यता दी गई।
- धारा 3 में अनेक नए अपराध जोड़े गए तथा मान्यता प्राप्त अपराधों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाने के कारण संपूर्ण धारा का पुनः क्रमांकन किया गया।
- इस अधिनियम ने अध्याय 4क की धारा 15क (पीड़ितों और साक्षियों के अधिकार) को जोड़ा और अधिकारियों द्वारा कर्त्तव्यों की उपेक्षा और जवाबदेही तंत्र को अधिक सटीक रूप से परिभाषित किया।
- इसमें अनन्य विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों की स्थापना का उपबंध किया गया था।
- सभी स्तरों पर लोक सेवकों के संदर्भ में, इस अधिनियम ने जानबूझकर की गई उपेक्षा शब्द को परिभाषित किया है।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2018:
- पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अत्याचार निवारण अधिनियम में संसद द्वारा किये गए वर्ष 2018 के संशोधन की सांविधानिक वैधता को बनाए रखा। इस संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- मूल अधिनियम में धारा 18क को जोड़ा।
- अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध किये जाने वाले विशिष्ट अपराधों को “अत्याचार” के रूप में परिभाषित किया गया तथा उनके प्रतिकार हेतु रणनीतियाँ एवं दण्ड निर्धारित किये गए।
- “अत्याचार” की परिभाषा को स्पष्ट किया गया तथा अधिनियम के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी अपराधों को संज्ञेय घोषित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस को बिना वारण्ट अभियुक्त की गिरफ्तारी करने तथा बिना न्यायालयीय आदेश के अन्वेषण प्रारंभ करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
- इस अधिनियम में सभी राज्यों से प्रत्येक जिले में विद्यमान सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय में परिवर्तित करने का आह्वान किया गया है जिससे उसके अंतर्गत पंजीकृत मामलों का विचारण किया जा सके और विशेष न्यायालयों में मामलों के संचालन के लिये लोक अभियोजकों/विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का उपबंध किया गया है।
- राज्यों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वे अधिक जातिगत हिंसा वाले क्षेत्रों को “अत्याचार-प्रवण क्षेत्र” घोषित कर सकें तथा विधि एवं व्यवस्था बनाए रखने हेतु योग्य अधिकारियों की नियुक्ति कर सकें।
- इसमें गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोक सेवकों द्वारा जानबूझकर कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने पर दण्ड का उपबंध है।
- इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों द्वारा किया जाता है, जिन्हें उचित केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(थ):
- इस अधिनियम की धारा 3 अत्याचारों से संबंधित अपराधों के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 3(1)(थ) के अनुसार, जो कोई भी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुए, सार्वजनिक रूप से किसी भी स्थान पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य का अपमान करता है या उसे अपमानित करने के आशय से भयभीत करता है, वह न्यूनतम छह माह के कारावास से, जो पाँच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, तथा जुर्माने से दण्डनीय होगा।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द):
- इस उपबंध के अधीन, यदि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, सार्वजनिक स्थान पर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जातिगत नाम से गाली देता है, तो यह एक अपराध है।