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पारिवारिक कानून
पति की जानकारी एवं सहमति के बिना पत्नी द्वारा गुप्त रूप से पुत्री के विवाह की योजना बनाना वैवाहिक क्रूरता के अंतर्गत आता है
«20-May-2026
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जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी "एक पिता के रूप में अपीलकर्त्ता (पति) के दर्द को हम समझ सकते हैं। उन्हें कभी पता ही नहीं चला कि प्रत्यर्थी (पत्नी) और पुत्री उनसे दूर चली गई हैं। पुत्री के विवाह के समय, एक संरक्षक के रूप में उन्हें अत्यधिक मानसिक पीड़ा, दर्द और कष्ट सहना पड़ा होगा, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।" न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति के. राजशेखर |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति के. राजशेखर शामिल थे, ने जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि पति की जानकारी के बिना पत्नी द्वारा अपनी पुत्री का गुप्त विवाह करना वैवाहिक क्रूरता है, जिसके आधार पर विवाह-विच्छेद किया जा सकता है। न्यायालय ने आगे कहा कि निरंतर मानसिक क्रूरता के कृत्य—जिनमें सार्वजनिक रूप से अपमान करना, अपशब्द बोलना और पुलिस तथा पति के वरिष्ठ अधिकारियों के पास परिवाद दर्ज कराना शामिल है—व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पर्याप्त मानसिक पीड़ा का कारण बनते हैं, जिससे विवाह को जारी रखना असंभव हो जाता है।
- कुटुंब न्यायालय द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज करने के आदेश को अपास्त करते हुए, न्यायालय ने पति को तलाक दे दिया और माना कि पत्नी द्वारा किये गए क्रूरतापूर्ण कृत्यों का मूल्यांकन और विश्लेषण करने में विचारण न्यायालय का दृष्टिकोण अपर्याप्त था।
जी. श्रीधर बनाम एस. कोमला कुमारी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पति-पत्नी का विवाह 1997 में हुआ था और उनकी एक पुत्री और एक पुत्र था।
- पत्नी ने गुपचुप तरीके से अपनी 18 वर्षीय पुत्री का विवाह अपने ही भाई – जो लड़की का मामा था - से तय कर दिया था, जो 32 वर्षीय तलाकशुदा व्यक्ति था।
- पत्नी के भाई की पहले पति की भतीजी से विवाह हुआ था; वह विवाह टूट गया था, और भतीजी ने उसके विरुद्ध पुलिस में परिवाद दर्ज कराया था।
- पत्नी ने बिना पति या पुत्र को बताए, पुत्री को विवाह कराने के लिये एक सप्ताह के लिये बैंगलोर ले गई।
- वापस लौटने पर पत्नी ने पति को सूचित किया कि विवाह एक यथार्थ प्रक्रिया के रूप में संपन्न हो चूका है।
- पति ने क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय में याचिका दायर की।
- पत्नी ने तथ्यों पर विवाद नहीं किया, लेकिन यह तर्क दिया कि उसने पुत्री के हित में विवाह का इंतजाम किया था, क्योंकि पुत्री और उसके चाचा पहले ही रिश्ते में आ चुके थे।
- पत्नी ने आगे आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे वैवाहिक घर में दोबारा प्रवेश करने से रोका गया और पति ने उसकी कीमती चीजें और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ छिपा दिये थे, जिसके कारण उसने पति के विरुद्ध पुलिस में परिवाद दर्ज कराया।
- कुटुंब न्यायालय ने पति के विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज कर दी और पत्नी के दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के आवेदन को मंजूर कर लिया।
- पति ने इस आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पुत्री के गुप्त विवाह को क्रूरता मानते हुए: न्यायालय ने माना कि पत्नी द्वारा पति की जानकारी के बिना पुत्री का गुप्त विवाह करना एक क्रूरतापूर्ण कृत्य था, जिससे पति को एक पिता के रूप में अत्यधिक मानसिक पीड़ा हुई। न्यायालय ने कहा कि एक बार विवाह हो जाने के बाद, पति के पास कोई विकल्प नहीं बचा था, और उसे हुई पीड़ा और कष्ट की भरपाई कभी नहीं हो सकती।
- क्रूरता जांच में पुत्री के कल्याण की सुसंगतता न होने पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवाह पुत्री के लिये लाभकारी था या नहीं, यह विवाद्यक नहीं है। मामले को विशुद्ध रूप से पति के पिता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिये, जिसकी 18 वर्षीय पुत्री का विवाह 32 वर्षीय तलाकशुदा व्यक्ति से हुआ था, जिसके विरुद्ध उसकी पूर्व पत्नी ने पुलिस में परिवाद दर्ज कराया था।
- मानसिक क्रूरता के निरंतर कृत्यों पर: न्यायालय ने पाया कि पत्नी ने सार्वजनिक रूप से पति के विरुद्ध निरंतर क्रूरतापूर्ण कृत्य किये, उसके बारे में अपमानजनक बातें कहीं और पुलिस तथा वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उसका परिवाद दर्ज कराया। इन कृत्यों, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से, ने पति को मानसिक पीड़ा पहुँचाई जिससे उसके लिये वैवाहिक जीवन जारी रखना असंभव हो गया।
- विचारण न्यायालय की त्रुटि पर: न्यायालय ने माना कि क्रूरता के कृत्यों का मूल्यांकन और विश्लेषण करने के लिये विचारण न्यायालय का दृष्टिकोण अपर्याप्त था और विवाह-विच्छेद की याचिका को खारिज करने और पत्नी के दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के आवेदन को मंजूर करने में उसने त्रुटी की थी।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 क्या है?
हिंदू विवाह आधिनियम की धारा 13— तलाक:
धारा 13(1) — दोनों पक्षकारों के लिये उपलब्ध आधार:
विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भी निम्नलिखित आधारों पर तलाक की डिक्री द्वारा विवाह विच्छेद के लिये याचिका प्रस्तुत कर सकता है:
- विवाह अनुष्ठित होने के पश्चात् दूसरे पक्षकार ने अपने पति या पत्नी के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छया से मैथुन किया है हैं (व्यभिचार)।
- विवाह संपन्न होने के पश्चात् दूसरे पक्षकार ने याचिकाकर्त्ता के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया है।
- दूसरे पक्ष ने याचिका प्रस्तुत करने से ठीक पहले लगातार कम से कम दो वर्षों की अवधि के लिए याचिकाकर्ता को छोड़ दिया है।
- दूसरे पक्षकार ने धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वह हिंदू नहीं रहा।
- दूसरा पक्षकार असाध्य रूप से विकृत-चित्त रहा है, या लगातार या आंतरायिक रूप से इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित है कि याचिकाकर्त्ता से यह आशा करना उचित नहीं है कि वह दूसरे पक्षकार के साथ रहे।
- दूसरे पक्षकार को कुष्ठ रोग का एक घातक और लाइलाज रूप हो गया है।
- दूसरे पक्षकार को संक्रामक रूप में यौन रोग है।
- दूसरे पक्षकार ने किसी धार्मिक संप्रदाय में प्रवेश करके संसार का त्याग कर दिया है।
- दूसरे पक्षकार के बारे में उन लोगों को सात वर्ष या उससे अधिक समय से कोई जानकारी नहीं मिली है, जिन्हें स्वाभाविक रूप से उस पक्षकार के बारे में पता होना चाहिये था।
धारा 13(1क) — अतिरिक्त आधार (किसी भी पक्षकार द्वारा):
- न्यायिक पृथक्करण का आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक दोनों पक्षकारों के बीच सहवास की पुनः शुरुआत नहीं हुई है।
- दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन के लिये डिक्री पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक दोनों पक्षकारों के बीच दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन नहीं हुआ है।
धारा 13(2) — केवल पत्नी के लिये उपलब्ध आधार:
- विवाह संपन्न होने के समय पति की एक पत्नी जीवित थी (द्विविवाह), बशर्ते कि याचिका दायर करने के समय दूसरी पत्नी जीवित हो।
- विवाह अनुष्ठित होने के पश्चात् से ही पति बलात्संग, अप्राकृतिक यौन संबंध या पशुगमन का दोषी रहा है।
- पति के विरुद्ध प्रासंगिक विधिक उपबंधों के अधीन भरण-पोषण संबंधी डिक्री अथवा आदेश पारित किया गया हो तथा ऐसी डिक्री/आदेश पारित होने के पश्चात् एक वर्ष या उससे अधिक अवधि तक दाम्पत्य सहवास पुनः स्थापित न हुआ हो।
- विवाह पत्नी के पंद्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व संपन्न किया गया हो (चाहे उसका सहवास संपन्न हुआ हो अथवा नहीं), तथा पत्नी ने पंद्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् किंतु अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने से पूर्व उस विवाह का परित्याग कर दिया हो।