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सिविल कानून

कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत लेखा परीक्षक की शक्तियां, कर्त्तव्य और दायित्त्व

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 19-May-2026

परिचय 

कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत कॉर्पोरेट गवर्नेंस ढाँचे में सांविधिक लेखा परीक्षक का कार्यालय केंद्रीय भूमिका निभाता है। धारा 143 से 147 तक अधिनियम के अधीन नियुक्त लेखा परीक्षकों के अधिकारोंदायित्त्वों और जिम्मेदारियों को परिभाषित किया गया हैजिससे यह सुनिश्चित होता है कि वे कॉर्पोरेट वित्तीय अखंडता के स्वतंत्र प्रहरी के रूप में कार्य करें। ये प्रावधान लेखा परीक्षकों को कंपनी के अभिलेखों तक व्यापक पहुँच प्रदान करते हैंउन्हें सांविधिक रिपोर्टिंग कर्त्तव्यों से बाध्य करते हैंऔर अनुपालन न करने या कपट के लिये उन्हें दण्डनीय बनाते हैं। 

धारा 143 — लेखा परीक्षकों की शक्तियां और कर्त्तव्य 

  • प्रत्येक लेखा परीक्षक को कंपनी के खातों की पुस्तकों और वाउचरों तक किसी भी समय बिना शर्त पहुँच का अधिकार हैचाहे वे रजिस्ट्रीकृत कार्यालय में रखे गए हों या कहीं औरऔर वह अधिकारियों से ऐसी जानकारी और स्पष्टीकरण मांग सकता है जिसे वह आवश्यक समझता है। 
  • लेखा परीक्षक को जिन विशिष्ट मामलों की जांच करनी होती हैउनमें शामिल हैं: क्या ऋण और अग्रिम उचित रूप से सुरक्षित हैं और कंपनी के लिये हानिकारक नहीं हैंक्या बहीखाते में दर्ज संव्यवहार कंपनी के हितों के लिये हानिकारक हैंक्या प्रतिभूतियों को खरीद मूल्य से कम पर बेचा गया हैक्या ऋणों को जमा के रूप में छिपाया गया हैक्या व्यक्तिगत खर्चों को राजस्व में शामिल किया गया हैऔर क्या नकद के बदले आवंटित शेयरों के बदले वास्तव में नकद प्राप्त हुआ है। समेकन प्रयोजनों के लिये होल्डिंग कंपनी के लेखा परीक्षक को उसकी सहायक और सहयोगी कंपनियों के रिकॉर्ड तक भी पहुँच प्राप्त होती है। 
  • लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में सदस्यों को यह बताना आवश्यक है कि क्या खाते कंपनी के वित्तीय मामलों का सही और निष्पक्ष विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर भी विचार करना होगा: क्या सभी आवश्यक जानकारी प्राप्त की गई थीक्या उचित लेखा-पुस्तकों का रखरखाव किया गया थाक्या वित्तीय विवरण लेखा मानकों के अनुरूप थेवित्तीय संव्यवहार पर कोई प्रतिकूल टिप्पणीक्या कोई निदेशक धारा 164(2) के अंतर्गत अयोग्य घोषित किया गया हैऔर क्या कंपनी के पास पर्याप्त आंतरिक वित्तीय नियंत्रण हैं और उनकी परिचालन प्रभावशीलता क्या है। 
  • सरकारी कंपनियों के संबंध में, CAG लेखा परीक्षक की नियुक्ति करता हैलेखापरीक्षा रिपोर्ट प्राप्त होने के साठ दिनों के भीतर पूरक लेखापरीक्षा कर सकता हैऔर उस पर टिप्पणी या उसे पूरक कर सकता है - ऐसी टिप्पणियां मूल रिपोर्ट के साथ वार्षिक आम बैठक के समक्ष रखी जाती हैं। 
  • यदि कोई शाखा कार्यालय विद्यमान हैतो उसके खातों का लेखापरीक्षा कंपनी के लेखापरीक्षक या किसी अन्य योग्य व्यक्ति द्वारा की जाती हैविदेशी शाखाओं के मामले मेंलेखापरीक्षा उस देश के विधियों के अधीन योग्य व्यक्ति द्वारा की जाती है। शाखा लेखापरीक्षक अपनी रिपोर्ट कंपनी के लेखापरीक्षक को मुख्य लेखापरीक्षा रिपोर्ट में शामिल करने के लिये प्रस्तुत करता है। 
  • प्रत्येक लेखा परीक्षक को ICAI की अनुशंसा और NFRA के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित लेखापरीक्षा मानकों का पालन करना होगा। औपचारिक अधिसूचना जारी होने तक ICAI के मानक लागू रहेंगे।  
  • यदि किसी लेखा परीक्षक को यह विश्वास करने का कारण हो कि अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा निर्धारित राशि का कोई कपट किया जा रहा है या किया जा चुका हैतो उसे इसकी सूचना केंद्र सरकार को देनी होगी। छोटे कपट के मामलों मेंरिपोर्ट लेखापरीक्षा समिति या बोर्ड को भेजी जाती हैऔर बोर्ड की रिपोर्ट में इसका प्रकटन करना अनिवार्य होता है। सद्भावनापूर्वक की गई रिपोर्टिंग पर कोई दायित्त्व नहीं बनता। रिपोर्ट न करने पर सूचीबद्ध कंपनियों के लिये ₹5 लाख और अन्य कंपनियों के लिये ₹1 लाख का जुर्माना है। ये उपबंध धारा 148 के अधीन लागत लेखाकारों और धारा 204 के अधीन कार्यरत कंपनी सचिवों पर भी यथावश्यक रूप से लागू होते हैं। 

धारा 144 — प्रतिषिद्ध सेवाएँ 

एक लेखा परीक्षक बोर्ड या लेखापरीक्षा समिति की मंजूरी के बिना गैर-लेखापरीक्षा सेवाएँ प्रदान नहीं कर सकता हैलेकिन निम्नलिखित सेवाएँ पूरी तरह से प्रतिषिद्ध हैं - चाहे वे कंपनीउसकी होल्डिंग कंपनी या सहायक कंपनी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदान की जाएं: 

  • लेखांकन और बहीखाता सेवाएँ 
  • आंतरिक लेखा परीक्षा 
  • किसी भी वित्तीय सूचना प्रणाली का डिजाइन और कार्यान्वयन 
  • बीमा सेवाएँ  
  • निवेश संबंधी सलाह या बैंकिंग सेवाएँ  
  • आउटसोर्स की गई वित्तीय सेवाएँ  
  • प्रबंधन सेवाएँ  
  • अन्य कोई भी सेवाएँ जो विहित की जा सकती हैं 

धारा 145 — लेखापरीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर 

  • लेखा परीक्षक को लेखापरीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने होंगे और धारा 141(2) के अनुसार अन्य कंपनी दस्तावेज़ों को प्रमाणित करना होगा। रिपोर्ट में निहित कोई भी आपत्तियां या प्रतिकूल टिप्पणियां कंपनी की आम बैठक में पढ़ी जानी चाहिये और किसी भी सदस्य द्वारा निरीक्षण के लिये उपलब्ध हैं। 

धारा 146 — आम बैठकों में उपस्थिति 

  • आम बैठकों से संबंधित सभी सूचनाएँ और संचार लेखा परीक्षक को भेजे जाने चाहिये। यदि छूट प्राप्त न होतो लेखा परीक्षक को स्वयं या किसी योग्य अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से बैठक में उपस्थित होना अनिवार्य है और लेखा परीक्षक के रूप में उनसे संबंधित किसी भी मामले पर अपनी बात रखने का अधिकार है। 

धारा 147 — उल्लंघन के लिये दण्ड 

  • धारा 139 से 146 के उल्लंघन के लियेकंपनी पर 25,000 रुपए से लेकर लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता हैऔर प्रत्येक दोषी अधिकारी पर 10,000 रुपए से लेकर लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। 
  • धारा 139, 143, 144 या 145 का उल्लंघन करने वाले लेखा परीक्षक पर ₹25,000 से ₹5 लाख तक का जुर्माना या उसके पारिश्रमिक का चार गुनाजो भी कम होलगाया जा सकता है। यदि उल्लंघन जानबूझकर या प्रवंचना के आशय से किया गया होतो लेखा परीक्षक को एक वर्ष तक का कारावास और ₹50,000 से ₹25 लाख तक का जुर्माना या उसके पारिश्रमिक का आठ गुनाजो भी कम होलगाया जा सकता है। दोषी पाए जाने परलेखा परीक्षक को अपना पारिश्रमिक वापस करना होगा और गलत या भ्रामक लेखापरीक्षा विवरणों से हुए नुकसान के लिये कंपनीसांविधिक निकायों या सदस्यों और लेनदारों को हर्जाना देना होगा। 
  • यदि किसी ऑडिट फर्म के भागीदारों ने कपट किया है या कपट में मिलीभगत की हैतो फर्म और संबंधित भागीदार दोनों संयुक्त रूप से और अलग-अलग रूप से उत्तरदायी होंगे। 

निष्कर्ष 

धारा 143 से 147 कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन लेखा परीक्षक विनियमन की सांविधिक आधारशिला का निर्माण करती हैं। लेखा परीक्षकों को व्यापक पहुँच और जांच शक्तियां प्रदान करकेव्यापक रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाकरपरस्पर विरोधी गैर-लेखा परीक्षा सेवाओं पर रोक लगाकर और क्रमिक दण्ड निर्धारित करकेये प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि सांविधिक लेखा परीक्षा कॉर्पोरेट जवाबदेही का एक सार्थक साधन बनी रहे - एक ऐसा साधन जो शेयरधारकोंलेनदारों और आम जनता के हितों की समान रूप से रक्षा करता है।