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क्या आप भी ले सकते हैं बच्चे को गोद?

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   27-Dec-2023 | शालिनी वाजपेयी



रीना और टीना बचपन की सहेलियाँ थीं। दिन-भर वे साथ रहतीं, अपनी हर बात एक-दूसरे के साथ शेयर करतीं और एक-दूसरे के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़तीं। गाँव वाले भी दोनों की दोस्ती की मिशाल देते थे। समय बीतता गया, युवा होने पर रीना के घरवालों ने उसकी शादी कर दी और शादी के कुछ समय बाद ही उसके दो बच्चे हो गए। वहीं, टीना एक बड़े शहर में छोटी सी नौकरी करने लगी। वह शादी जैसे बंधन में नहीं फँसना चाहती थी लेकिन उसे बच्चे बहुत पसंद थे। वह जब भी रीना को उसके दोनों बच्चों के साथ देखती तो उसके मन में यह लालसा जाग उठती कि काश…! उसे भी कोई माँ कहकर पुकारे…! वह अविवाहित रहकर भी मातृत्व का सुख लेना चाहती थी लेकिन समाज के डर से उसने अभी तक किसी के भी सामने अपनी यह इच्छा ज़ाहिर नहीं की थी। समय के साथ-साथ जब उसका अकेलापन बढ़ने लगा तो उसने हिम्मत करके पहली बार रीना से अपनी इस इच्छा को ज़ाहिर किया। रीना बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी लेकिन उसने बच्चा गोद लेने के बारे में कहीं से सुन रखा था। उसने टीना को भी बच्चा गोद लेने की सलाह दी। रीना की इस सलाह को सुनकर टीना एक क्षण के लिये खुशी से उछल पड़ी, लेकिन दूसरे ही क्षण वह यह सोचकर उदास हो गई कि वह कहाँ भटकती फिरेगी; उसे तो पता भी नहीं है कि बच्चा गोद कैसे लिया जाता है; उसे सबसे पहले कहाँ जाना होगा; बच्चे को गोद लेने में कितने पैसे लगते हैं? लेकिन उसने अब ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह बच्चा गोद लेगी, और समाज के अन्य लोगों को भी, जिनकी संतान नहीं है, इसके प्रति जागरूक करेगी।

जब टीना ने इससे संबंधित जानकारी को इकट्ठा करना शुरू किया तो उसे पता चला कि कोई भी व्यक्ति यूँ ही अनाथालय, शिशु देखभाल केंद्र या एनजीओ से किसी बच्चे को नहीं ला सकता है। इसके लिये महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से कारा (सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी) नामक एक संस्था बनाई गई है। यह एक सांविधिक निकाय है जो अनाथ व बेसहारा छोड़ दिये गए बच्चों को उनकी संबद्ध/मान्यता प्राप्त एजेंसियों के माध्यम से गोद देने का कार्य करती है। बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए यदि कोई बच्चा लेता या देता पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है। इसलिये बच्चा गोद लेने के इच्छुक अविवाहित महिलाओं एवं पुरुषों या विवाहित दंपतियों को सबसे पहले ‘कारा’ की वेबसाइट पर जाकर पंजीकरण करना होता है। इसके बाद कारा बच्चों की उपलब्धता के आधार पर एक लिस्ट तैयार करती है और फिर ज़रूरतमंद व्यक्तियों को गोद देने की प्रक्रिया पूरी करती है।

इसी दौरान टीना को यह भी पता चला कि पहले बच्चे को गोद लेने के लिये ‘हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956’ के माध्यम से सारी प्रक्रिया संचालित होती थी लेकिन यह कानून विशेषकर हिंदू धर्म के लिये था, न कि सभी के लिये। फिर किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण अधिनियम 1915 आया)।

और तब से इस अधिनियम के तहत बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया निर्धारित हुई। किंतु इसके तहत भी बच्चा मिलने में दो से पाँच साल तक का समय लग जाया करता था। इस समस्या से निपटने के लिये कुछ समय पहले किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2021 पारित किया गया, जिसे 1 सितंबर, 2022 से भारत सरकार ने लागू भी कर दिया है।

इस संशोधन के तहत गोद लेने की प्रक्रिया को न्यायालय से ज़िलाधिकारी को स्थानांतरित कर दिया जाएगा। वही गोद लेने के आदेश जारी करेगा। अगर जिलाधिकारी कहीं व्यस्त है तो वह एडीएम (अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट) को भी मनोनीत कर सकता है।

इसके अलावा उसने यह भी जाना कि भारत के हर ज़िले में एक बाल कल्याण समिति (CWC) होती है जो बच्चे को कानूनी रूप से स्वतंत्र (लीगली फ्री) करती है। एक बच्चे को तभी गोद लिया जा सकता है जब वह कानूनी रूप से स्वतंत्र हो। इसलिये इस समिति की भी बहुत अहम भूमिका होती है।

इन कानूनों को समझने के बाद टीना की जिज्ञासा और बढ़ी और उसने गोद लेने वाले दंपति या सिंगल पैरेंट की योग्यताओं के बारे में जानना चाहा। इस दौरान उसे पता चला कि-

  • भारतीय नागरिक, एनआरई और विदेशी नागरिक द्वारा भारत में किसी बच्चे को गोद लिया जा सकता है लेकिन इन तीनों ही नागरिकों के लिये प्रक्रियाओं में अंतर है।
  • बच्चा गोद लेने वाला व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिये। उसे कोई जानलेवा बीमारी नहीं होनी चाहिये।
  • वह आर्थिक दृष्टि से बच्चे का पालन-पोषण करने में सक्षम हो।
  • अगर संभावित अभिभावक शादीशुदा हैं तो उन दोनों की आपसी सहमति होना ज़रूरी है।
  • एक सिंगल महिला किसी भी लिंग के बच्चे को गोद ले सकती है, जबकि एक सिंगल पुरुष सिर्फ लड़के को ही गोद ले सकता है। यानी एक अविवाहित या तलाकशुदा पुरुष किसी लड़की को गोद नहीं ले सकता है।
  • संभावित माँ-बाप अगर दो साल से ज़्यादा समय से शादीशुदा हों, तभी वे बच्चा गोद ले सकते हैं।
  • कोई भी संभावित माता-पिता जिनकी अपनी कोई जैविक संतान हो, वे भी बच्चा गोद ले सकते हैं।
  • ऐसे दंपति जिनके तीन या तीन से अधिक बच्चे हैं तो वे कुछ विशेष मामलों को छोड़कर बच्चा गोद नहीं ले सकते।
  • लिव-इन रिलेशनशिप वाले दंपतियों को बच्चा गोद नहीं दिया जाता है।
  • बच्चे को गोद लेने में उम्र भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बच्चे और गोद लेने वाले व्यक्ति के बीच में कम से कम 25 साल का अंतर होना ज़रूरी है। इसके अलावा सिंगल पैरेंट की उम्र 55 साल से ज़्यादा नहीं होनी चाहिये और गोद लेने वाले दंपति की संयुक्त उम्र 110 साल से ज़्यादा नहीं होनी चाहिये। नीचे दी गई सारिणी से उम्र के अंतर को और अच्छे तरीके से समझा जा सकता है।

बच्चे की उम्र गोद लेने वाले दंपति की संयुक्त अधिकतम आयु व गोद लेने वाले सिंगल पैरेंट की अधिकतम आयु-

4 वर्ष तक के बच्चों को गोद लेने लिये- 90 वर्ष (दंपति की संयुक्त आयु) या 45 वर्ष (सिंगल पैरेंट)

4 वर्ष से 8 साल तक के बच्चों को गोद लेने के लिये- 100 वर्ष (दंपति की संयुक्त आयु) या 50 वर्ष (सिंगल पैरेंट)

8 वर्ष से 18 साल तक के बच्चों को गोद लेने के लिये- 110 वर्ष (दंपति की संयुक्त आयु) या 55 वर्ष (सिंगल पैरेंट)

अब टीना बच्चे को गोद लेने से संबंधित कई ज़रूरी बातों को समझ चुकी थी, लेकिन जैसे ही वह पंजीकरण करने के लिये आगे बढ़ी, उसे याद आया कि उसने अभी तक यह तो पता ही नहीं किया कि इस प्रक्रिया में किन-किन दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ेगी। इसी कड़ी में उसने जाना कि सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के मुताबिक, किसी बच्चे को गोद लेने के लिये इन दस्तावेज़ों का होना ज़रूरी है। इनके बिना कानूनी प्रक्रिया शुरू भी नहीं हो सकती है-

  • बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवार की मौजूदा तस्वीर या फिर उस दंपति और शख्स की मौजूदा तस्वीर।
  • जो व्यक्ति बच्चे को गोद लेना चाह रहा है, उसका पैन कार्ड।
  • आय प्रमाण पत्र।
  • जन्म-प्रमाण पत्र या कोई भी ऐसा डॉक्यूमेंट जिससे उस व्यक्ति की जन्मतिथि प्रमाणित हो।
  • शादी का प्रमाण पत्र (अगर शादीशुदा हैं तो)।
  • निवास प्रमाण पत्र (आधार कार्ड/ वोटर आईडी/ पासपोर्ट/ नवीनतम बिजली का बिल/ टेलीफोन बिल)।
  • किसी सरकारी चिकित्सा अधिकारी का हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र जिससे इस बात की पुष्टि होती हो कि जो व्यक्ति बच्चे को गोद लेने जा रहा है, उसे किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं है। गोद लेने के इच्छुक दंपति को अपने-अपने मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कराने होंगे।
  • एकल माता-पिता यानी पत्नी या पति में से किसी एक की मृत्यु हो गई है तो उसका मृत्यु प्रमाण पत्र।
  • अगर गोद लेने का इच्छुक व्यक्ति तलाकशुदा है तो उसका प्रमाणपत्र।
  • अगर इच्छुक व्यक्ति का कोई बच्चा पहले से ही है और उसकी उम्र पाँच साल से ज़्यादा है तो उसकी सहमति।

बच्चा गोद लेने में कितना धन लगता है?

चूँकि बच्चा गोद लेना केवल एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं है, यह एक भावनात्मक प्रक्रिया भी है, इसलिये गोद लेने के इच्छुक दंपति चाहते हैं कि उन्हें बिना किसी इंतज़ार के जल्दी-से-जल्दी बच्चा मिल जाए। जिसके चलते कई बार वे ऐसे गिरोह के चंगुल में फँस जाते हैं जो उनसे पैसे लेकर तुरंत बच्चा देने की बात कहते हैं। जबकि असल में जब आप पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चा गोद लेने जाएंगे तो रजिस्ट्रेशन के समय कुछ पैसे लगते हैं, इसके अलावा कहीं भी पैसा नहीं लगता है।

साथ ही, जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो जाता है तब तक गोद देने वाली संस्थाओं की ओर से बराबर मॉनीटरिंग की जाती है। समय-समय पर इस बात की जाँच-पड़ताल की जाती है कि बच्चा अपने नए परिवार के साथ खुश है या नहीं। उसका ख्याल रखा जा रहा है कि नहीं, उसकी ज़रूरतें पूरी हो रही हैं या नहीं। कहीं गोद लेने वाला परिवार बच्चे के साथ किसी प्रकार की हिंसा या खराब बर्ताव तो नहीं कर रहा है।

गोद लिये गए बच्चे के क्या कानूनी अधिकार हैं?

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या गोद लिये गए बच्चे के पास वे सभी अधिकार होते हैं जो एक जैविक (बायोलॉजिकल) बच्चे के पास होते हैं। तो इसका जवाब है- ‘हाँ’। गोद लिये गए बच्चे के पास भी उतने ही अधिकार होते हैं जितना कि एक जैविक बच्चे के पास होते हैं। उसका भी अपने माता-पिता पर, उनकी संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना एक जैविक बच्चे का होता है।

क्या कहते हैं आँकड़े?

केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के अनुसार, साल 2010 में देश के भीतर 5693 बच्चे, साल 2011 में 5964 बच्चे गोद लिये गए, जबकि अप्रैल 2022 से मार्च 2023 के बीच मात्र 3010 बच्चे गोद लिये गए। हैरानी की बात यह है कि आज भी भारत में लगभग 3 करोड़ बच्चे अनाथ हैं। जिनकी तुलना में हर साल गोद लिये जाने वाले बच्चों की संख्या बेहद कम है। इसका एक प्रमुख कारण बच्चा गोद लेने की धीमी व जटिल कानूनी प्रक्रिया थी। हालाँकि नए संशोधन अधिनियम के आने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि इन आँकड़ों में बढोतरी होगी, और ज़्यादा-से-ज़्यादा बच्चों को अपना परिवार मिल सकेगा।

तो अगर आप किसी असहाय बच्चे का पालन-पोषण कर, उसे माँ-बाप के प्यार से सींचकर उसके जीवन को सुंदर बना सकने में सक्षम हैं तो बिना किसी की परवाह किये इन नियमों-कानूनों के तहत बच्चा गोद ले सकते हैं। इससे न सिर्फ आपकी जिंदगी को एक उद्देश्य मिलेगा, बल्कि एक बच्चे को उसका सही सामाजिक अधिकार और सम्मान मिलेगा। साथ ही यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि बच्चा गोद लेना कोई मजाक नहीं है। यह एक बेहद अहम ज़िम्मेदारी है जिसे उठाने से पहले आप मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार हों।



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