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समान नागरिक संहिता

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   24-Nov-2023 | देवेश चौहान



हाल ही के कुछ दिनों से समान नागरिक संहिता को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी सभा में बहुत ही महत्त्वपूर्ण बयान देते हुए कहा कि “समान सीसी संहिता के नाम पर लोगों को भड़काया जा रहा है, भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकारों की बात की गई है।” प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद समान नागरिक संहिता की चर्चा फिर से एक बार ज़ोरों पर है। 

यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है?  

हिंदुओं के कानून में बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। जबकि मुसलमानों के अलग कानून हैं, दूसरी तरफ इसाई और यहूदियों के कानून भी अलग हैं। इन्हीं सब कानूनों को विभिन्न धर्मों के हिसाब से ना रखकर एक जैसा बनाने की जो कोशिश है, उसे समान नागरिक संहिता कहते हैं।

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब एक तरह के लोगों पर एक तरह का सिविल कानून। भारतीय संविधान के अनुच्छेद–14 में समानता का अधिकार दिया गया है। उसमें यह भी कहा गया है कि जो लोग असमान हैं उन लोगों पर एक समान कानून नहीं होगा।

‌यूनिफॉर्म सिविल कोड को दूसरी तरह इस तरीके से भी समझ सकते हैं कि स्कूल में जब बच्चे यूनिफॉर्म पहन कर जाते हैं उसमें सभी बच्चों की ड्रेस का रंग एक ही तरह होता है। जिससे गैरबराबरी या अमीरी- गरीबी का फर्क दिखाई ना पड़े, लेकिन हम इस बात पर भी गौर कर सकते हैं कि सभी बच्चों के शर्ट, पैंट और जूते की लंबाई को एक जैसा नहीं रखा जा सकता। माप बच्चे की लंबाई और चौड़ाई से तय होता है।

अब समान नागरिक संहिता के बारे में विस्तार से पढ़िए–

पुराने समय में भारत की कानून व्यवस्था वेदों, स्मृतियों और रीति-रिवाजों के अनुसार चलती थीं। वहीं पर मुस्लिम जब मध्यकाल में भारत आए तो धर्म के साथ अपना शरियत कानून भी लेकर आए।

शरियत - इस्लाम के लोग इसे दैवीय कानून मानते हैं।

मुगल शासक जब चरम पर आया तब मुगल शासक औरंगजेब ने जितने भी शरियत के कानून थे, जो बिखरे-बिखरे थे और जिनमें बहुत भिन्नता थी, उन सब भिन्नता को खत्म करके उसने सभी कानूनों को एक किताब में  लिखवा लिया, उस किताब का नाम ‘फतवा आलमगिरी’ पड़ा।

शरियत कानून में नवाब के अधीन जो कार्य करते हैं वह मुफ्ती और काज़ी हैं। काज़ी फैसले देता है और वह जनता के बीच रहता है। काज़ी का काम शरियत के कानून के हिसाब से फैसला देना होता है। जब नए तरह के मामले आते हैं, तब काज़ी मुफ्ती के पास जाता है और मुफ्ती एक फतवा जारी करता है। लेकिन शरियत का एकदम शुद्ध रूप भारत में कभी लागू नहीं हुआ।

समान नागरिक संहिता के लागू करने की प्रकिया– 

1765 ईसवीं में ईस्ट इंडिया कंपनी ने दीवानी अधिकार खरीद लिया। जिससे उनके पास बंगाल, बिहार और उड़ीसा आ गया। अब इन तीनों जगह का लैंड एवेन्यू खुद अंग्रेज़ वसूलेंगे। इसके बाद वॉरेन हेस्टिंग को 1775 ईसवीं में फोर्ट विलियम वाले इलाके का गवर्नर जनरल बनाया गया। 1773 ईसवीं में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना करने का फैसला लिया गया। यह शुरुआत वॉरेन हेस्टिंग ने शुरू की। यह अदालतें हिंदू मुस्लिम, सिख ईसाई सबके लिए हाेगी। इन अदालतों को यह कहा गया कि क्रिमिनल अपराधों के लिए सबको मुस्लिम क्रिमिनल लॉ से न्याय दिया जाए। सिविल लॉ में मुस्लिमों के लिए कानून मुस्लिम सिस्टम से हो और हिंदुओं के लिए कानून हिंदू विधि से हो।

वर्ष 1781 में वॉरेन हेस्टिंग ने फिर से एक रेगुलेशन जारी किया। अब सिविल कानून में तीन परंपरा बन गई। हिंदुओं के कानून हिंदू विधि से बनाए जाएँगे। मुस्लिमों के कानून मुस्लिम विधि से बनाए जाएँगे। बाकियों  का कानून अंग्रेज़ी विधि से चलेगा।

क्रिमिनल कानून में मुस्लिम क्रिमिनल कानून बहुत कठोर था। अंग्रेज़ों ने क्रिमिनल लॉ में धीरे-धीरे अंग्रेज़ी कानूनों को लाने की शुरुआत की।

वर्ष 1828 में लॉर्ड विलियम बैंटिक गवर्नर जनरल बने। उन्होंने राजा राममोहन राय की मदद से पहला ऐसा काम किया, जो हिंदू समाज के विधानों के विपरीत था। वह सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम था। वर्ष 1829 में कानूनन सती प्रथा को खत्म कर दिया गया।

वर्ष 1833 में चार्टर एक्ट आया तब अंग्रेज़ों के दिमाग में आया कि समान संहिता बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए वर्ष 1834 में पहला विधि आयोग बनाया गया। इस विधि आयोग में जिनको कानून की गहरी समझ है, उनको नियुक्त किया गया। इस विधि आयोग के अध्यक्ष लार्ड मैकाले थे। वर्ष 1853 में एक और चार्टर एक्ट आया और दूसरा विधि आयोग बना। विधि आयोग के अध्यक्ष सर जॉन रोमली बने। इसके बाद वर्ष 1861 में भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) और वर्ष 1882 में अपराध प्रक्रिया (सीआरपीसी) संहिता बनाकर आपराधिक कानूनों के मामले में सभी को बराबर बना दिया गया। वर्ष 1891 में एज ऑफ कंसेंट एक्ट लाया गया जिसमें लड़कियों की सहमति से सेक्स की न्यूनतम उम्र 10 साल से बढ़ाकर 12 साल कर दी गई।

शारदा एक्ट:

शारदा एक्ट वर्ष 1929 में पास हुआ और वर्ष 1930 में लागू हुआ। इसे चाइल्ड मैरिज़ रिस्ट्रेंड एक्ट भी कहते हैं। शारदा एक्ट की मदद से लड़के की शादी की उम्र 18 साल और लड़की की शादी की उम्र 14 साल कर दी गई।

एक मामला महिलाओं के अधिकारों पर भी था। हिंदू समाज में प्रॉपर्टी के जो अधिकार थे। वह दो सिस्टम पर काम करते थे– (1) मिताछरा, (2) दाएँ भाग।

दोनों ही भागों में महिलाओं को संपत्ति नहीं मिलती थी। जिसको देखते हुए अंग्रेज़ों ने तीन एक्ट पारित किए।

‌विमेंस प्रॉपर्टी एक्ट, 1874
‌हिंदू इन्हेरिटेंस एक्ट, 1928
‌हिंदू विमेंस राईट टू प्रॉपर्टी एक्ट, 1937

अंग्रेज़ों ने वर्ष 1937 में मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट पारित किया। इसमें कहा गया कि मुस्लिमों से जुड़े सारे मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ से ही पारित होंगे।

हिन्दू कोड बिल क्या है? 

वर्ष 1941 में बी.एन. राव के नेतृत्व में कमेटी बनाई। बी.एन. राव के भारतीय संविधान सभा के सलाहकार थे। बी.एन. राव ने एक कमेटी बनाई। जिसका नाम हिंदू लॉ कमेटी था। उस समय हिंदू पुरुषो में एक से अधिक विवाह करने का प्रचलन था। बी.एन. राव से कहा गया कि आप ये अध्ययन करके देखिए, यदि किसी हिंदू महिला के पति ने दूसरी शादी कर ली, तो क्या हम कोई ऐसा प्रावधान कर सकते हैं कि अलग रहने की स्थिति में वह अपनी पत्नी को गुज़ारा भत्ता दे?

वर्ष 1944 में बी.एन. राव ने अपनी रिपोर्ट अंग्रेज़ों को दी तब अंग्रेज़ों को लगा इस पर और गहराई से काम करने की ज़रूरत है। 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ। वर्ष 1952 तक जनता की चुनी हुई सरकार नहीं थी। नेहरू के मंत्रिमंडल में तीन लोग उनकी पार्टी के नहीं थे।

(1) डॉक्टर भीम राव अंबेडकर (कानून मंत्री)  (2)  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ( तब हिंदू महासभा) 

(3) बलदेव सिंह

हिंदू कोड बिल में आठ खंड थे। विवाह में पहली बार तलाक की बात की गई थी। एक से ज़्यादा विवाहों पर प्रतिबंध था। तीसरे मामले में एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान ‘महिलओं को संपत्ति मिलने का अधिकार’ था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी इसके विरुद्ध थे। राजेंद्र प्रसाद ने कह दिया कि राष्ट्रपति किसी बिल पर दस्तखत करने के लिए बाध्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री नेहरू का अपना मंत्रिमंडल बगावत पर उतर आया।

अंबेडकर हिंदू कोड बिल पास कराने के लिए अमादा थे। वह चाह रहे थे कि हिंदू कोड़ बिल आ जाए। लेकिन जब नहीं आ पाया तो अंत में अनुच्छेद–44 पर सहमति बनी कि राज्य प्रयास करेगा कि समान नागरिक संहिता बने। इन सारे प्रकिया से अंबेडकर नाराज़ हुए और उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि पहला चुनाव हो जाने दो अगर मैं जीत गया तो ऐसा मानूँगा कि जनता चाहती है कि हिंदू कोड़ बिल लाया जाए। वर्ष 1951-52 में चुनाव होते हैं, नेहरू जी 489 सीट में से 364 सीट जीते।

हिंदू कोड बिल के चार हिस्से बने– 
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
‌हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
‌हिंदू अप्राप्तव्यता और संरक्षकता अधिनियम, 1956
‌हिंदू दत्तक और भरण - पोषण अधिनियम, 1956

हिंदू कोड़ बिल ने हिंदू महिलाओं को ये अधिकार दिया कि अब वो अपने पतियों को बाध्य कर सकती हैं कि वो दूसरा विवाह ना करें, यदि वह ऐसा करता है तो धारा–494 के तहत उसे जेल हो सकती है।

सन् 2005  में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आया। इसमें विवाहित वा अवविवाहित महिला को पूर्णतया संपत्ति देने का अधिकार दिया गया। इन सभी कानूनों की मदद से हिंदुओं में महिलाओं के प्रति जो भेदभाव था वह अब काफ़ी हद तक समाप्त हो चुका था। लेकिन अभी कई मामलों में ईसाई, पारसी, यहूदियों और मुस्लिमों में महिलाओं के प्रति असमानताएँ थी।

भारत में क्रिश्चियन नागरिक संहिता मुख्यता 4 कानूनों के आधार पर कार्य करती है– 

‌क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872
‌भारतीय तलाक अधिनियम, 1869
‌भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925
‌संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890

इन चारों अधिनियमों में कई महत्त्वपूर्ण केस आए। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार हस्तक्षेप किया और जो धाराएँ न्याय संगत नहीं थी उतना हिस्सा अवैध हो गया। कई सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत सरकार अब समान नागरिक संहिता के बारे में सोचे। नेहरू सरकार ने  हिंदुओं के लिए कानूनों को तो पारित किया किंतु वैसी मनोदशा मुस्लिमों के मामले में नहीं दिखाई पड़ी। शरियत एप्लीकेशन एक्ट ज्यों का त्यों रहा, जो मुस्लिमों को चार निकाह, तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को सही बताता था। शाह बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ने एक आशा की किरण दिखाई पड़ी। लेकिन राजीव सरकार ने मुस्लिम विमेन एक्ट पारित करके उसे अवैध घोषित कर दिया।

सिविल मामलों में अब तक कई ऐसे कानून बने जो सभी धर्मों के लिए एक समान है, जैसे 1934 का विशेष विवाह अधीनियम,1961 का दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम और 2005 का घरेलू हिंसा अधिनियम।

समान नागरिक संहिता तीन प्रकार से लाई जा सकती है– 

(1)‌ सभी का अलग-अलग कानून बने। 

(2)‌ हम सबके अलग-अलग कानून चलने दें लेकिन अलग कानून में से जो कानून भेदभाव करते हैं, उनको खारिज कर दें। उन्हें प्रोग्रेसिव बना दें उन्हीं के समाज के लिए।

(‌3) हम एक समान नागरिक संहिता बना दें। समान नागरिक संहिता में रीति रिवाजों का ध्यान रखा जाए।



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