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लीगल अबॉर्शन : जीवन और चयन के बीच जारी है बहस

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   15-Feb-2024 | वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा



स्वतंत्रता स्वयं जीने की सुगंध है। यह हवा की तरह है।

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अबॉर्शन या गर्भपात है क्या? जन्म से पहले एक बच्चा नौ महीने मां के पेट में रहता है। इससे पहले किसी भी कारण से उसका गर्भ में ही समाप्त हो जाना एबॉर्शन या गर्भपात कहलाता है। वैसे अंग्रेजी में कुदरती तरीके से गर्भ समाप्त हो जाने के लिए मिसकैरिज शब्द का इस्तेमाल होता है और चिकित्सकीय तरीके से गर्भ को खत्म करने के लिए एबॉर्शन का। आज जिस एबॉर्शन का कानूनी अधिकार स्त्रियों को मिला है इसके लिए महिलाओं ने लम्बी लड़ाई लड़ी है। इससे पहले गर्भ चाहे बलात्कार की वजह से ठहरे या अनजाने में, जन्म देना ही पड़ता था। यहां तक की स्वयं मां की जान को ही खतरा क्यों न हो, तब भी। अबॉर्शन को पाप मानने वाली दुनिया का अधिकांश हिस्सा औरत की इस तकलीफ से पूरी तरह बेखबर था कि अनचाहे गर्भ को साथ लेकर चलना क्या होता है? साथ ही वह इतना क्रूर भी था कि उसके अनचाहे गर्भ के लिए ज़िम्मेदार बलात्कारी से उसकी शादी तक कराने पर तुल जाता था या फिर, सारा दोष स्त्री पर ही मढ़ देता। आज भी छेड़छाड़ या बलात्कार की घटनाओं को कवच देने वाले महिला के कपड़ों पर टीका-टिप्पणी करती हैं। अच्छी बात यह है कि कानून बहुत ही सोच-समझ कर बनाए जाने की प्रक्रिया है जिससे भारतीय महिलाएं फिलहाल बेहतर स्थिति में पहुच रही हैं। अबॉर्शन को वैध करने के कई आधार रहे हैं। दुर्घटना, दुष्कर्म, सेहत, दो बच्चों में दूरी, खुद की मर्ज़ी जैसे तमाम कारणों से गर्भ समाप्त करने की ज़रुरत पड़ सकती है।

अब स्वेच्छा से गर्भ मिटाने को लेकर स्पष्ट कानून तो हैं लेकिन इस पर भी समय को लेकर पूरी दुनिया में बहस है कि चार महीने की गर्भ समाप्ति सही है या छह महीने की। कुछ भ्रूण में दिल की धड़कन (पांचवें सप्ताह) पड़ते ही इसे सही नहीं ठहराते। यूं तो गर्भ समाप्ति को लेकर पूरी दुनिया में समाज, धर्म और कानूनविद् हमेशा बहस करते रहे हैं। फिर भी एबॉर्शन की स्वीकृति को लेकर सभी एकमत ही हैं। बेशक तमाम धार्मिक आग्रह इसके विरोध में हैं और इसे जीवहत्या की संज्ञा भी देते हैं। एक महिला का मज़बूत आग्रह है कि यह मेरा शरीर है और यह हक़ मुझे ही मिलना चाहिए। 'माय बॉडी माय चॉइस' बेहद लोकप्रिय सोच है लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसमें कई किन्तु-परन्तु साथ आ जाते हैं। ‘जीवन बनाम चयन’ के बीच यह बहस जारी है। अमरिका जैसे आधुनिक देश के 14 राज्यों ने जून 2022 से एबॉर्शन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है जिससे कई तरह की नई समस्याएं आ गई हैं। एक रिपोर्ट के हिसाब से वहां 64 हज़ार से ज्यादा अविवाहित लड़कियां गर्भवती हो गई हैं। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन राज्यों में दुष्कर्म की शिकार गर्भवती लड़कियों को भी एबॉर्शन की अनुमति नहीं है। इसके पहले 1973 में ‘रो बनाम वेड’ मामले की सुनवाई में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने महिला के निजता के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी राज्यों में गर्भपात को सही ठहराया था।

वैसे अनचाहे गर्भ को ख़त्म करने के लिए नमक का घोल पी लेने या कोई विशेष फल खाने लेने, पेट पर दबाव बनाने, वजन उठा लेने की कवायद को सदियों से महिलाएं बरतती आई हैं। आठवीं सदी के एक संस्कृत लेख में भाप में दम किये प्याज़ पर बैठकर गर्भ समाप्ति का भी ब्यौरा मिलता है। यहां से चलकर आज की एमटीपी (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनैंसी) तक गर्भपात ने लम्बा रास्ता तय किया है। गर्भ हटाने के तरीके भारतीय लोकजीवन में हमेशा से रहे हैं। कई बार परिजन अपने बच्चों की गलतियों को समाज से छिपाने के लिए अप्रशिक्षित दाई या झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में भी चले जाते हैं। ऐसा वे परिवार भी करते हैं जिन्हें बेटे की चाहत होती है। गर्भ में बच्चे का लिंग पता लगते ही वे कन्या भ्रूण को समाप्त कर देते हैं। इसलिए भारत में लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। वैसे इसे बच्चों की गलती कहने की बजाय कुदरती कहना भी बेहतर विकल्प हो सकता है। बेशक आज के समय में गर्भ हटाने या इसके ना ठहरने के बहुत से साधन मौजूद हैं, पचास साल पहले तक ऐसा नहीं था। दुनिया में अबॉर्शन का इतिहास बहुत पुराना है। मिस्र में ईसा से 1150 साल पहले गर्भपात का इतिहास मिलता है। इसके बाद करीब 1150 ईसवी में जहां कम्बोडिया के अंकोरवाट मंदिर के एक शिल्प में एक स्त्री के शरीर पर राक्षस को इसे करते हुए दिखाया गया है।

एक बड़ी बहस जो पूरी दुनिया में आज भी जारी है वह गर्भ को समाप्त करने की उम्र। उसे पांच महीने के बाद समाप्त किया जाना चाहिए या नहीं, इस पर विवाद हैं। साल 2008 के दौरान भारत में ‘निकिता बनाम भारत सरकार’ केस पर खूब बहस हुई थी। निकिता और हरेश मेहता ने अदालत से गुजारिश की थी कि उन्हें छह माह के गर्भ को समाप्त करने की इजाजत दी जाए क्योंकि उसके दिल में छेद है। वह बच्चा जन्म के बाद सामान्य जिंदगी नहीं बसर कर सकता। एक सीधी सपाट राय हो सकती है कि मां को यह हक होना चाहिए लेकिन उस मां का क्या, जिसका बच्चा पैदा होते ही मेनेन्जाइटिस (दिमागी बुखार) का शिकार होकर मानसिक विकलांग हो जाता है? वह मां, जिसका बच्चा अस्पताल की लापरवाही से इनक्यूबेटर में ही बुरी तरह झुलस जाता है? वह मां, जिसका नवजात पोलियो का शिकार होकर हमेशा के लिए अपाहिज हो जाता है? इन माताओं ने अपने बच्चों के लिए अपनी ज़िन्दगी होम कर दी है। बेशक प्रेम तो अपने पालतुओं से भी इंसान को होता है, फिर यह तो उनका अपना अंश था। ऐसे में जब आज की स्त्री के पास विकल्प होता है, तब क्या वह कभी ऐसे बच्चे को जन्म देना चाहेगी? निकिता और हरेश ने भी अपने बच्चे की गंभीर बीमारी को देखते हुए उसे गर्भ में समाप्त करने की आज्ञा कानून से चाही थी। लेकिन भारतीय कानून ने उन्हें अनुमति नहीं दी।

एक बीमार बच्चे के मां-बाप बनने जा रहे मुंबई के दंपत्ति निकिता और हरेश मेहता को मुंबई उच्च न्यायालय ने छह माह के गर्भ को गिराने की अर्जी ख़ारिज कर दी थी। उनकी गलती बस इतनी थी कि उन्होंने अस्पतालों के अवैध पिछले दरवाजों का इस्तेमाल करने की बजाय कानून के रास्ते अपनी मांग पूरी करने का प्रयास किया लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। तब के कानून के मुताबिक, 20 हफ्ते बाद केवल मां के जीवन के खतरे में होने की स्थिति में ही गर्भपात करवाया जा सकता था, लेकिन 20 हफ्ते बाद गर्भस्थ शिशु कैसा भी हो, उसे जन्म देना पड़ेगा। यानी निकिता को एक ऐसे शिशु को जन्म देना था, जिसके हमेशा अपंग और बीमार रहने की आशंका है। अमूमन हम सब जानते हैं कि अपंग बच्चों को पालने में जो दर्द होता है और अपंग बच्चों के प्रति समाज का जो रवैया है, उसे देखते हुए अपंग बच्चे के साथ-साथ उसके पालकों की जिंदगी भी किसी नर्क से कम नहीं होती और ऐसे मामलों में सर्वाधिक भुगतती है, वो मां। बेशक, गर्भस्थ शिशु के अधिकार का तर्क मायने रखता है, लेकिन मां के अधिकार को कैसे ख़त्म किया जा सकता है! खासकर तब, जब वह खुद ऐसा चाह रही हो। वास्तव में जो शिशु अजन्मा है, उसे लेकर भावुक तो हुआ जा सकता है, लेकिन उस शिशु पर पूरी तरह से मां का हक है, क्योंकि वह मां के शरीर का ही विस्तार है। अंतिम सत्य यही हो सकता है कि मां क्या चाहती है? मां अगर उस शिशु को नहीं चाहती, तो मां के निर्णय में कोई भी हस्तक्षेप अमानवीय होगा। विज्ञान अगर उस मां की किसी भी तरह से मदद कर सकता है, तो विज्ञान को ऐसा करने देना चाहिए। बहरहाल निकिता मेहता के इस अजन्में का मिसकैरेज हो गया और जो बच्चा यह जोड़ा नहीं चाहता था उसका जन्म नहीं हुआ।

अच्छी बात यह है कि बीते साल ही सुप्रीम कोर्ट ने छह माह यानी 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की कानूनन वैध करार दे दिया है। यह वह समय है जब चिकित्सक बच्चे की गंभीर बीमारी को गर्भ में ही देख लेते हैं। मां उसे पैदा करने या ना करने का अधिकार रखती है। एक ओर जहां अमेरिका जैसा आधुनिक देश ने महिलाओं को दिए गर्भपात के अधिकार वापस ले लिए हैं, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भपात के फैसले पर स्त्री को हक देकर उसके सशक्तिकरण की दिशा में सहज ही बड़ा कदम बढ़ा दिया है। यह और बात है कि कुछ लोगों ने, जो ना स्त्री के शरीर से वाकिफ हैं और ना उसकी भावनाओं से, न्यायालय की व्याख्या को मनमौजी व्याख्या भी कहा था लेकिन भारतीय स्त्री को यह महत्वपूर्ण हक़ हासिल है। यहां यह समझना भी ज़रूरी है कि भारतीय संविधान बिना किसी लिंगभेद के मानव अधिकारों को सर्वोपरि मानता है। साथ ही यह उस संस्कृति का भी प्रतिनिधित्व करता है जहां संतान की पहचान उसकी जन्मदात्री से होती है। कौशल्या सुत, देवकीनंदन, कुंती पुत्र की परंपरा के देश में स्त्री की देह पर स्त्री के अधिकार को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण फैसला पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इसके तहत हर स्त्री को यह अधिकार होगा कि वह अपनी मर्जी से 24 हफ्ते के गर्भ पर फैसला ले सकती है, फिर चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित। उसका वैवाहिक दर्जा भी यहां कोई मायने नहीं रखता। आज के समय में, जब स्त्रियां अपने एग फ्रीज करवा रही हैं तब वह किसी भी समय मां बनने का फैसला भी ले सकती हैं।

सुरक्षित गर्भपात अधिनियम में किये गए संशोधन में अविवाहित भारतीय महिलाओं को अपने शरीर पर अपना अधिकार मिल गया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर किसी विवाह में रहते हुए स्त्री अपनी मर्ज़ी के खिलाफ गर्भवती हुई है तो यह कृत्य वैवाहिक दुष्कर्म की श्रेणी में भी आ सकता है। सामाजिक स्तर पर एक स्त्री, जो ना अपनी मर्ज़ी से विवाह कर सकती है और ना ही बच्चे पैदा करने पर उसे कोई अधिकार हासिल है, वहां न्यायालय ने दूरदृष्टि रखते हुए निर्णय दिया था। जिस मामले में यह सुनवाई हुई, वह एक 25 वर्षीय अविवाहित युवती की याचिका से जुड़ा था। युवती सहमती से एक रिश्ते में थी और उसे पांच महीने का गर्भ था। उसके साथी ने शादी से इंकार कर दिया इसलिए वह बच्चे को पैदा करने और उसकी ज़िम्मेदारी उठाने में असमर्थ थी। यूं भी एकल और वह भी अविवाहित मां के लिए समाज उदार नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायलय ने उसे गर्भपात की इजाज़त देने से इंकार कर दिया था क्योंकि वह सहमति से बनाए सम्बन्ध की देन था लेकिन सर्वोच्च अदालत ने न केवल युवती के हक़ में फैसला दिया बल्कि यह भी नोट किया कि 2021 में एमटीपी (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी) में महिला को भी शामिल करते हुए पति की बजाय पार्टनर शब्द का इस्तेमाल किया गया था। यह बेहतरीन था क्योंकि इससे विधवा और तलाकशुदा महिलाओं के लिए भी निर्णय लेना आसान हो गया था। इस फैसले से महिलाओं की राह इसलिए भी आसान मानी जा सकती है क्योंकि संतान का आगमन केवल विवाह का परिणाम नहीं है। ऐसे कई मामले हैं जहां रिश्ते के टूटने के बाद भी महिला को बच्चे को जन्म देना पड़ा और सामाजिक अस्वीकार्यता के चलते बच्चे पहचान के संकट से जूझते हुए मानसिक विकारों के शिकार भी हुए। मशहूर हॉलीवुड एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो की मां को उनके साथी ने छोड़ दिया था। मर्लिन ने अपनी मां को हमेशा दुखी और मानसिक तौर पर बीमार पाया। वे अक्सर बेबी मर्लिन की पिटाई कर देती थीं। मर्लिन अनाथालय में बड़ी हुईं और उनकी मां का जीवन मानसिक चिकित्सालय में कटा। साठ के दशक की इस कामयाब सितारा की जीवनियां बयान करती है कि वह हमेशा अपने पिता का इंतज़ार करती रही और अभिनय व हकीकत के बीच अपनी पहचान से जूझती रही। मर्लिन की कहानी चकाचौंध और शोहरत के बीच के स्याह अंधेरे की दास्तान है, जिस पर आमतौर पर नज़र नहीं जाती।

जिन फ़्रांसिसी लेखिका एनी एर्नोक्स को साल 2022 में साहित्य का नोबल दिया गया, वे इतनी साहसी रहीं कि जिन अनुभव से अपनी ज़िन्दगी में गुजरीं, उसे ही कलमबद्ध कर दिया। उसका नतीजा ये हुआ कि सरकार और समाज दोनों को गर्भपात के प्रति अपना नजरिया बदलना पड़ा। ऐनी एर्नोक्स ने लिखा कि युवावस्था में की गई भूल को समाज कभी माफ़ नहीं करता, और तो और सरकारें भी समाज के ही साथ खड़ी हो जाती हैं। 1963 में जब फ्रांस में गर्भपात गैरकानूनी था, एक 23 साल की एक लड़की बिना शादी के गर्भवती हो जाती है और जो त्रासदी वह भुगतती है, उसके ब्योरे अपनी डायरी में लिखती जाती है और फिर एक दिन बेबाकी से लोगों को पढ़ने के लिए दे भी देती है। यही डायरी का साहित्य ऐनी का नोबेल है। इतना प्रभावी कि किताब के छपने के दो साल के भीतर फ्रांस में गर्भपात को लेकर नया कानून बन गया। किताब जो 1974 में लिखी गई थी, उसकी नायिका गर्भपात को लेकर सामाजिक मान्यता और व्यक्तिगत अहसासों के बीच जूझ और झूल रही थी। समाज में हमेशा संस्कारों के कसीदे ही पढ़े जाते हैं, बगैर इस बात को समझे कि कई बार उसके ये कसीदे ज़िंदा इंसान के लिए कितने उलझे हुए और दर्द भरे होते हैं।

हमारे सुप्रीम कोर्ट ने इसके आगे भी देखा है। जस्टिस डी वाय चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने कहा था कि इस कानून में वैवाहिक दुष्कर्म यानी मैरिटल रेप को भी शामिल माना जाना चाहिए। पीठ का यह भी कहना था कि कानून के उद्देश्य को देखते हुए विवाहित और अविवाहित का यह फर्क बहुत ही कृत्रिम हो जाता है और इसे संवैधानिक रूप से कायम नहीं रखा जा सकता। यह उस रूढ़िवादिता को भी कायम रखना होगा कि केवल विवाहित महिलाएं ही यौन संबंधों में होती हैं। बहरहाल एक अच्छा लोकतंत्र वही है, जो अपने नागरिकों के प्रताड़ित होने और चीखने से पहले ही उसे वे अधिकार दे, जो गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए ज़रूरी होते हैं। मसला केवल प्रेमपूर्वक जारी वैवाहिक रिश्तों का नहीं बल्कि नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के बाद गर्भवती होने और फिर गर्भपात से भी जुड़ा है। इन दिनों राजस्थान में जयपुर हाईकोर्ट के सामने एक नाबालिग बच्ची का मामला आया है। जयपुर की एक 11 साल की बच्ची ने अपने 31 माह के गर्भ को समाप्त करने की याचिका दाखिल की है। यह गर्भ उसके साथ हुए दुष्कर्म का नतीजा है। अदालत ने साफ किया कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत पूर्ण विकसित भ्रूण को दुनिया में आने और स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार है। बच्ची की मां मानसिक तौर पर बीमार है और पिता किसी आपराधिक मामले में आरोपी है। ऐसे में अदालत ने बच्ची के सुरक्षित प्रसव कराने के निर्देश प्रशासन और अस्पताल को दिए हैं। इस मामले में गर्भपात बच्ची की जान के लिए खतरा हो सकता था। समाज की यह स्याह हकीकत है कि बच्चा केवल दाम्पत्य जीवन का नतीजा नहीं, कई बार दुर्घटनाओं और अपराध का परिणाम भी होता है। शायद इसीलिए सुरक्षित और लीगल एबॉर्शन की सोच ने भी जन्म लिया। ज़िन्दगी बहुत कीमती है। अजन्मे को लेकर यह हक एक वयस्क महिला को मिलना ही चाहिए कि वह अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या चाहती है? स्वतंत्रता खुद में जीवन की सुगंध है, जिसे भी समझने में दिक्कत हो वह खुद के शरीर पर नौ महीने तक एक पत्थर बांधकर जी के देख सकता है।



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