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ज्यूडिशियरी की तैयारी कब से शुरू कर देनी चाहिये?

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   03-Nov-2023 | राहुल कुमार



संत कबीर कहते हैं -

“करता था सो क्यूँ रहा, अब करि क्यों पछिताय,

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय।”

उपरोक्त पंक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु भी तर्कसंगत प्रतीत होती हैं। जैसी हमारी तैयारी होती है वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है। कोई जीत की तैयारी करता है तो कोई हार की! जीत की तैयारी के लिए ज़रूरी है कि सही समय पर सही ढंग से तैयारी में जुटा जाए। तैयारी का सही समय क्या है, यह जानना आवश्यक है।

भारत में न्यायिक सेवा परीक्षा इच्छुक कानूनी पेशेवरों के लिये सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक है। यह परीक्षा न्यायपालिका में कॅरियर बनाने का लक्ष्य रखने वाले व्यक्तियों के लिये एक उल्लेखनीय संभावना प्रस्तुत करती है। “भारत के संविधान के अनुच्छेद-233 और 234 ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं तथा यह विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है।” चयन प्रक्रिया और नियुक्ति क्रमश: राज्य लोक सेवा आयोगों और संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा संचालित की जाती है, क्योंकि उच्च न्यायालय राज्य में अधीनस्थ न्यायपालिका पर अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हैं। उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों के पैनल, परीक्षा के बाद उम्मीदवारों का साक्षात्कार आयोजित करते हैं और नियुक्ति के लिये उनका चयन करते हैं। निचली न्यायपालिका के ज़िला न्यायाधीश स्तर तक के सभी न्यायाधीशों का चयन प्रांतीय सिविल सेवा (न्यायिक) परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।

गौरतलब है कि सभी सफल इंसान तैयारी के पीछे भागते हैं। तैयारी के बिना सफलता दूर भागती चली जाती है। यदि आपमें प्रतिभा है किंतु तैयारी से आप कतराते हों तो आपसे कम प्रतिभावान व्यक्ति सटीक रणनीति और सतत मेहनत करके आपसे आगे निकल जाएगा। यानी ज़बरदस्त प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रतियोगिता परीक्षा में सफल होने के लिये तैयारी की भूमिका महत्त्वपूर्ण बन जाती है। अब्राहम लिंकन कहते हैं - “यदि मुझे एक पेड़ काटने के लिये 6 घंटे दिये जाएँ तो मैं पहले 4 घंटे अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ करने में लगाऊंगा।” दरअसल अब्राहम लिंकन का मानना था कि किसी भी कार्य को करने से पहले हमें उस कार्य के प्रति मज़बूत इरादों वाला कुशल इंसान बनना चाहिये ताकि कठिन कार्य को भी सरलता से किया जा सके।

“तैयारी की भी अपनी एक तैयारी होती है। समय से पहले और समय के बाद की तैयारी विद्यार्थियों के जीवन में तनाव ला देती है।” ज्ञान और पढ़ाई का अंत नहीं है। पढ़ाई का उद्देश्य क्या है- इससे पढ़ाई की दिशा तय होती है। यदि पढ़ाई का उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षा को पास करना है तो पढ़ाई की प्रक्रिया सिलेबस के अनुसार होनी चाहिये। कम प्रयास में और सही समय पर न्यायाधीश बनने के लिये ज़रूरी है कि तय समय सीमा में सिलेबस पर पकड़ हासिल हो। “परीक्षा के प्रश्नपत्र चक्रव्यूह के समान होते हैं। इसे वही सही से भेद पाते हैं जो असफलताओं की वज़ह जानते हैं।” दरअसल अपनी गलतियों से सीखते रहने में ज़िंदगी कम पड़ सकती है किंतु औरों के तजुर्बों और गलतियों से सीख लेना, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मददगार साबित होता है। इसलिए समय रहते सचेत हो जाना प्रतियोगी परीक्षाओं की ज़रूरत है।

अपनी क्षमता, अभिवृत्ति, कमज़ोरी और मौलिकता से रूबरू होना सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ने जैसा है। ये वे अस्त्र हैं जिनसे आप भीड़ से अलग हो जाएंगे। न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी को मुकाम तक पहुँचाने में सजगता की आवश्यकता पड़ती है। अपनों अथवा मित्रमंडली के साथ भले आप सहज, बेपरवाह व खुशमिजाज दिखें किंतु तैयारी/सिलेबस के प्रति सजग और गंभीर रहें तो आधी जीत यूँ ही हो जाती है।

आजकल सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में प्रतिस्पर्द्धा एक सामान्य विशेषता बन गई है। जब सरकारी रोज़गार मिल जाने को ईश्वर मिल जाने के समतुल्य समझा जा रहा है तब परीक्षा के प्रति पूर्ण डेडिकेशन ज़रूरी हो जाता है। “समय को महत्त्व देना, रिवीज़न को दिनचर्या का हिस्सा बनाना, कठिन विषयवस्तु पर अपने नोट्स बनाना, गुणवत्तापूर्ण कंटेंट तक पहुँच हासिल करना, टेस्ट देते रहना और जीतने की ज़िद को बढ़ाते हुए खुदमें सुधार लाना- ये सब ऐसे गुण हैं जो सफल होने की संभावना को ठोस रूप से बढ़ाते हैं।” प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से स्व-प्रबंधन की प्रासंगिकता प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत बढ़ी है। स्व-प्रबंधन की राह समय-प्रबंधन, भावना-प्रबंधन और व्यवहार प्रबंधन से गुज़रती है। इनसे यह व्यक्तित्व प्रबंधन तक पहुँचती है। सिलेबस में इसका ज़िक्र नहीं होता है किंतु इनके द्वारा सिलेबस से अच्छी ट्यूनिंग स्थापित की जा सकती है। भीड़ से अलग होने के लिये भीड़ जैसी तैयारी सही नहीं है।

न्यायाधीश तथ्यों और तर्कों पर अपेक्षाकृत अधिक विश्वास करते हैं। संयोगवश विद्यार्थी जीवन में भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भावुकता का अंश कम जबकि तार्किकता का अंश ज़्यादा है। कहते हैें, “हज़ार विपत्ति हो किंतु पढ़ना तो पड़ेगा, हार मिली हो और टूट गए हों आप, फिर भी बढ़ना तो पड़ेगा!” दरअसल जैसे ही आप प्रतियोगी परीक्षा की दुनिया में प्रवेश करते हैं वैसे ही आपको अभिमन्यु, एकलव्य व अर्जुन के गुणों से लैस होते जाना चाहिये। कभी-कभी सही समय पर और सटीक तरह से की गई तैयारी भी बेरंग रह जाती है, इसकी कई बारीक वजहें होती हैं। उन सभी वजहों पर विजय हासिल करना विद्यार्थियों का धर्म है।

न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान पुस्तक और ऑनलाइन स्टडी के बीच संतुलन भी आवश्यक है। “ऑनलाइन स्टडी यदि तैयारी को रफ़्तार देती है तो पुस्तकें आपके ज्ञान को गहराई प्रदान करती हैं। ऑनलाइन स्टडी से आप अप-टू-डेट होते हैं जबकि पुस्तक से आपके पाँव ज़मीन पर टिके रहते हैं।” दोनों ज़रूरी हैं, न्यायाधीश बनने का रास्ता इन दोनों पड़ावों से होकर जाता है। प्रारंभिक व मुख्य परीक्षा की तैयारी साथ-साथ करना श्रेयस्कर है। आप क्या हैं, क्यों हैं, कैसे हैं, आपकी यात्रा और आपके लक्ष्य को बुनने वाले तमाम आयामों को साक्षात्कार में समझा व परखा जाता है। आपको कानून की कितनी समझ है, आपमें सच व झूठ का अनुपात कितना है- इससे साक्षात्कार का कनेक्शन होता है। सही मायनों में देखा जाए तो न्यायिक सेवा में जाने का आपका निर्णय आपकी अभिवृत्ति व तैयारी से सही अथवा गलत साबित होगा। दरअसल वही यात्री गंतव्य तक पहुँचते हैं जिसने खुदको सही से पहचाना हो और आगे बढ़ने को ठाना हो।

एलएलबी के बाद आप लोअर ज्यूडिशियल सर्विस की परीक्षा दे सकते हैं। इस परीक्षा के लिये कार्य अनुभव की आवश्यकता नहीं होती है। अतः इस परीक्षा की तैयारी एलएलबी के दौरान ही शुरू कर देनी चाहिये। हायर ज्यूडिशियल सर्विस के लिये एलएलबी की डिग्री के साथ सात वर्ष के कार्यानुभव की आवश्यकता होती है। इस परीक्षा की तैयारी में कानून का बेहतरीन ज्ञान होना चाहिये इसलिये एलएलबी और वकालत के दौरान तैयारी जारी रहे तो इसमें प्रथम प्रयास में सफलता हासिल की जा सकती है। न्यायपालिकीय प्रणाली की अच्छी समझ को आत्मसात करने के लिये आपको करेंट अफेयर्स पर भी फोकस करना पड़ेगा। संवैधानिक, नागरिक, आपराधिक और प्रक्रियात्मक कानून सहित विभिन्न कानूनी पहलुओं के बारे में तथ्यात्मक और अवधारणात्मक जानकारी होना आवश्यक है।

विभिन्न राज्यों की न्यायिक सेवा की परीक्षाओं के सिलेबस का विश्लेषण करने पर यही ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में कॅॅरियर बनाने के लिये आपके पास कानून का गहरा ज्ञान होना चाहिये। जिस क्षेत्र में आप जाना चाहते हैं उस क्षेत्र में रूचिपूर्ण ढंग से डटा जाए तो राह आसान हो जाती है। दरअसल राह/परीक्षा को मुश्किल अथवा आसान राही/विद्यार्थी ही बनाते हैं। “सिलेबस और पिछले साल के प्रश्नपत्र को ध्यान में रखकर आगे बढ़ा जाए तो न्यायिक सेवा में सफल होना कठिन नहीं है।” आप अपने गृह राज्य की न्यायिक सेवा परीक्षा को ज़्यादा महत्त्व दे सकते हैं किंतु साथ में दो-तीन राज्यों की न्यायिक सेवा परीक्षा को भी ठोस विकल्प के रूप में देख सकते हैं जिससे सफलता की संभावना उच्च हो जाए।

वैसे आने वाले वर्षों में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की स्थापना की जा सकती है। नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम्स द्वारा वर्ष 2012 में दी गई एक रिपोर्ट के अनुसार, आगामी 30 वर्षों में दायर होने वाले नये मुकदमों की संख्या 15 करोड़ के आसपास होगी। इतने सारे अनुमानित मामलों को तय समय सीमा में निपटाने के लिये 75,000 न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी। यानी न्यायिक सेवा में जाने की ख्वाहिश रखने वाले विद्यार्थी लगातार मेहनत करते रहे और हिम्मत न हारे तो मंज़िल तक पहुँचना तय है क्योंकि प्रत्येक साल अलग-अलग राज्यों में वैकेंसी आती रहती हैं।

किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के दौरान हमेशा याद रखें कि -

“कदम चूम लेती है खुद आके मंज़िल,

मुसाफिर अगर अपनी हिम्मत न हारे।”



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