आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

आपराधिक कानून

सामान्यतः अग्रिम जमानत को आरोप-पत्र दायर किये जाने तक सीमित नहीं किया जा सकता

    «    »
 13-Feb-2026

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

विधि की स्थिति सर्वविदित है: एक बार अग्रिम जमानत दिये जाने के बादयह सामान्यत: बिना किसी निश्चित समय सीमा के जारी रहती है। आरोप पत्र दाखिल करनासंज्ञान लेना या समन जारी करनाविशेष कारणों को अभिलिखित किये बिनाजमानत के संरक्षण को समाप्त नहीं करता है।” 

न्यायमूर्ति जे.बीपारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ नेइलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया था जिसमें अग्रिम जमानत संरक्षण को केवल पुलिस आरोप पत्र दाखिल होने तक ही सीमित रखा गया था और बाद में चार्जशीट दाखिल होने के पश्चात् एक नई अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था। 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस प्रकार का यांत्रिक प्रतिबंध स्थापित विधि के प्रतिकूल है। 

सुमित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या थी ? 

  • उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2)/85 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा और के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • मृतक महिला के देवरअपीलकर्त्ता ने अग्रिम जमानत की मांग की। 
  • उच्च न्यायालय ने प्रारंभ में अग्रिम जमानत तो दे दीकिंतु इसे "पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल किये जाने तक" सीमित कर दिया। 
  • आरोपपत्र दाखिल होने के बादसुरक्षा का अधिकार समाप्त हो गया और दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने भारत के उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश को "अत्यंत असामान्य" करार दिया। 
  • इसमें पाया गया कि एक बार जब आरोपों और सौंपी गई भूमिका पर विचार करने के बाद अभियुक्त के पक्ष में विवेक का प्रयोग किया जाता हैतो केवल आरोपपत्र दाखिल होने तक ही सुरक्षा को सीमित करने का कोई औचित्य नहीं है। 
  • अग्रिम जमानत मंजूर या नामंजूर की जा सकती है। तथापिएक बार मंजूर हो जाने परयहसामान्यत: बिना किसी निश्चित समय सीमा के जारी रहती है। 
  • न्यायालय ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एन.सी.टी. ऑफ दिल्ली) के मामले में संविधान पीठ के निर्णय पर विश्वास कियाजिसमें यह माना गया था किअग्रिम जमानत को सदैव एक निश्चित अवधि तक सीमित नहीं किया जाना चाहिये 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि, "जोखिम प्रबंधन को समय सीमा निर्धारित करके नहींअपितु सहयोगउपस्थिति और छेड़छाड़ न करने की शर्तें अधिरोपित कर के सुनिश्चित किया जा सकता है।"       
  • यदि परिस्थितियों में परिवर्तन होता हैतो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अधीन संशोधन या रद्द करने की मांग की जा सकती है। अग्रिम जमानत प्रदान करते समय प्रारंभिक स्तर पर जोड़े गए समाप्ति उपबंध विधिसंगत नहीं हैं और अस्थिर माने जाएंगे।  

यदि बाद में और भी गंभीर अपराध जोड़ दिये जाएं तो क्या होगा? 

न्यायालय ने जमानत मिलने के बाद नए संज्ञेय और अजमानतीय अपराधों के जुड़ने की स्थिति में विधिक स्थिति स्पष्ट की: 

  • अभियुक्त नए संज्ञेय और अजमानतीय अपराधों के लिये आत्मसमर्पण कर सकता है और जमानत के लिये आवेदन कर सकता है। यदि आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता हैतो गिरफ्तारी हो सकती है। 
  • अन्वेषण अभिकरण अभियुक्त की गिरफ्तारी और अभिरक्षा के लिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(5) या 439(2) के अधीन आदेश मांग सकती है। 
  • जमानत रद्द होने के बाद न्यायालय गिरफ्तारी और अभिरक्षा का निदेश दे सकते हैं। 
  • पहले की जमानत को औपचारिक रूप से रद्द किये बिना भीयदि उचित हो तो अधिक गंभीर अपराधों के जुड़ने पर न्यायालय अभिरक्षा का आदेश दे सकते हैं। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 क्या है ? 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली मेंअग्रिम जमानत के लिये सांविधिक ढाँचा प्रदान करती है। 
  • यह उपबंध उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय को उन व्यक्तियों कोअग्रिम जमानत देनेका अधिकार देता है जिन्हें अजमानतीय अपराधों के कथित कृत्य के लिये गिरफ्तारी की आशंका है। 
  • धारा 482 उस विधिक तंत्र की स्थापना करती है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति संभावित गिरफ्तारी से न्यायिक सुरक्षा प्राप्त कर सकता हैअन्वेषण में सहयोग सुनिश्चित करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बनाए रख सकता है। 
  • इस उपबंध के अनुसारअजमानतीय अपराध के लिये संभावित गिरफ्तारी के संबंध में उचित विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय के समक्ष अग्रिम जमानत के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • आवेदन प्राप्त होने परन्यायालय कोआवेदक की गिरफ्तारी की स्थिति मेंजमानत पर छोड़े जाने का निदेश देने का विवेकाधीन अधिकार प्राप्त है। 
  • न्यायालय को अग्रिम जमानत देते समय विशिष्ट शर्तें अधिरोपित करने का अधिकार है जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अन्वेषण संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके। 
  • अनिवार्य शर्तों में आवेदक को आवश्यकता पड़ने पर पुलिस पूछताछ के लिये उपलब्ध रहना शामिल है। 
  • आवेदक कोमामले के तथ्यों से परिचित साक्षियों या व्यक्तियों को किसी भी प्रकार का प्रलोभनधमकी या वचन सेप्रतिबंधित किया गया है। 
  • अग्रिम जमानत पाने वाले व्यक्ति को न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना भारत छोड़ने की मनाही है। 
  • न्यायालय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 480(3) के अधीन आवश्यक समझे जाने पर अतिरिक्त शर्तें अधिरोपित कर सकता है। 
  • अग्रिम जमानत दिये जाने परयदि व्यक्ति को बाद में बिना वारण्ट के गिरफ्तार किया जाता हैतो जमानत प्रदान करने की तत्परता पर उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा। 
  • यदि अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट यह अवधारित करता है कि व्यक्ति के विरुद्ध वारण्ट जारी किया जाना चाहियेतो यह न्यायालय के निदेश के अनुरूप जमानतीय वारण्ट होना चाहिये 
  • यह उपबंध विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता की धारा 65 (कुछ मामलों में बलात्कार के लिये दण्ड) और धारा 70(2) (18 वर्ष से कम आयु की महिला पर सामूहिक बलात्संग) के अधीन आरोपों से जुड़े मामलों में इसकी प्रयोज्यता को बाहर करता है। 
  • धारा 482 , दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 438 में पूर्व में निहित उपबंध की विधायी निरंतरता का प्रतिनिधित्व करती है ।