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सांविधानिक विधि
भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट जीवन के अधिकार का उल्लंघन करते हैं
« »09-Mar-2026
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आराध्या वर्मा बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "सोशल मीडिया कंपनियां किसी की भी गरिमा को ठेस पहुँचा सकती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवेदनशील/असुरक्षित वर्गों की गरिमा और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिये सोशल मीडिया का विनियमन आवश्यक है।" न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद |
स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद ने आराध्या वर्मा बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट की गई कोई भी भ्रामक सामग्री, जो मिथ्या, विद्वेषपूर्ण हो और जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना या उसकी निजता का उल्लंघन करना हो, भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रदत्त मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। न्यायालय ने फेसबुक की मूल कंपनी को अवयस्क याचिकाकर्त्ता की पोस्ट और तस्वीरों को ब्लॉक करने या हटाने का निदेश दिया।
आराध्या वर्मा बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपने पिता की मृत्यु के बाद अपनी माता के साथ मायके में रह रही एक अवयस्क लड़की ने यह याचिका दायर की थी ।
- याचिकाकर्त्ता ने अभिकथित किया कि उसके दादा-दादी ने फेसबुक पर एक भ्रामक पोस्ट डालकर मिथ्या दावा किया था कि वह लापता है और उसे ढूंढने वाले किसी भी व्यक्ति को 1 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी।
- उस पोस्ट के कारण कई अज्ञात और अवांछित व्यक्ति उसके घर आने लगे, जिससे अशांति फैली और उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा और स्वतंत्रता को खतरा उत्पन्न हुआ।
- इस याचिका में अज्ञात व्यक्तियों से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने और भ्रामक सामग्री को हटाने की मांग की गई थी।
- प्रत्यर्थियों ने आरोपों से इंकार करते हुए कहा कि दादी का पहले ही निधन हो चुका है और 70 वर्षीय दादा ने न तो ऐसी कोई पोस्ट अपलोड की थी और न ही कोई इनाम देने की पेशकश की थी।
- प्रत्यर्थियों ने आगे यह तर्क दिया कि याचिका केवल प्रत्यर्थियों को परेशान करने के उद्देश्य से दायर की गई थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया पर भ्रामक सामग्री पोस्ट करना संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रत्याभूत व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकारों, गरिमा और प्रतिष्ठा का उल्लंघन है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवेदनशील/असुरक्षित वर्गों की गरिमा और अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये सोशल मीडिया विनियमन आवश्यक है, और मजबूत विधिक ढाँचे, तकनीकी समाधान, डिजिटल साक्षरता और नैतिक प्रथाओं का संयोजन जवाबदेही सुनिश्चित कर सकता है और एक सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण को बढ़ावा दे सकता है।
- न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3 का हवाला दिया, जो फेसबुक और एक्स जैसे मध्यस्थों को ऐसे नियम प्रकाशित करने के लिये अनिवार्य करता है जो उपयोगकर्त्ताओं को स्पष्ट रूप से मिथ्या या भ्रामक जानकारी, प्रतिरूपण, मानहानिकारक सामग्री, निजता का उल्लंघन करने वाली सामग्री, लिंग उत्पीड़न और इसी तरह की सामग्री पोस्ट करने से प्रतिबंधित करते हैं।
- न्यायालय ने पाया कि फेसबुक द्वारा ऐसे कोई पर्याप्त नियम नहीं बनाए गए थे और न ही उन्हें लागू किया गया था, जिसके कारण याचिकाकर्त्ता के बारे में भ्रामक जानकारी प्लेटफॉर्म पर बनी रही, जिससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न हुई।
- चूँकि प्रत्यर्थियों द्वारा सामग्री पोस्ट करने पर विवाद बना रहा, इसलिये न्यायालय ने फेसबुक की मूल कंपनी को अवयस्क याचिकाकर्त्ता की पोस्ट और तस्वीरों को ब्लॉक करने या हटाने के लिये उचित कार्रवाई करने का निदेश दिया।
- तदनुसार याचिका का निपटारा कर दिया गया और आदेश को फेसबुक की मूल कंपनी के रजिस्ट्रीकृत कार्यालय में भेजने का निदेश दिया गया।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है?
बारे में:
- संविधान का अनुच्छेद 21 भारत के संविधान, 1950 के भाग 3 के अंतर्गत प्रदान किया गया एक मौलिक अधिकार है और यह उपबंध करता है कि किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।
- यह मौलिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को समान रूप से प्राप्त है और इसे "मौलिक अधिकारों का हृदय" भी माना जाता है।
- फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक (1981) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति पी. भगवती के माध्यम से यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 "एक लोकतांत्रिक समाज में सर्वोच्च महत्त्व के सांविधानिक मूल्य को समाहित करता है।"
अनुच्छेद 21 के आवश्यक तत्त्व:
- प्राण का अधिकार: अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को प्राण के अधिकार को प्रत्याभूत करता है और इसमें न केवल अस्तित्व का अधिकार अपितु एक सार्थक और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी सम्मिलित है।
- दैहिक स्वतंत्रता: यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और साथ ही व्यक्तियों को मनमानी या विधिविरुद्ध निरोध, गिरफ्तारी या कारावास से बचाती है, जिससे मनमानी राज्य कार्रवाई से मुक्ति को प्रत्याभूत किया जाता है।
- विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया: यह प्राण या दैहिक स्वतंत्रता के हनन की अनुमति देता है, परंतु केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार। इसका अर्थ यह है कि इन अधिकारों पर कोई भी निर्बंधन निष्पक्ष, न्यायसंगत और युतियुक्त विधियों के अनुसार होना चाहिये।
अनुच्छेद 21 का विधिशास्त्रीय विकास:
अनुच्छेद 21 का विधिशास्त्रीय विकास ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) के मामले से प्रारंभ हुआ और मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले के साथ इसमें गति आई।
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950):
- इस मामले में, निवारक निरोध अधिनियम, 1950 की वैधता पर प्रश्न उठाया गया था।
- छह न्यायाधीशों की एक पीठ ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 में 'उचित' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है; इसके बजाय 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' शब्दों का प्रयोग किया गया है, और इसलिये न्यायालय केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करेगा।
- न्यायालय ने बहुमत से यह माना कि किसी विधि को केवल इस आधार पर असांविधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि उसमें प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों का अभाव है या वह विधि की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है।
- यह भी माना गया कि अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 परस्पर अनन्य हैं और एक दूसरे के पूरक नहीं हैं।
- न्यायमूर्ति फजल अली की अल्पमत राय दूरदर्शी थी और समय से बहुत आगे थी।
आर.सी. कूपर बनाम भारत संघ (1970):
- इस मामले को बैंक राष्ट्रीयकरण मामले के नाम से भी जाना जाता है।
- इस मामले में न्यायालय ने ए.के. गोपालन मामले में प्रतिपादित 'पारस्परिक अनन्यता' के सिद्धांत को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने 'उद्देश्य परीक्षण' को निरस्त कर 'प्रभाव परीक्षण' को स्थापित किया, जिसका अर्थ है कि किसी विशेष विधि के उद्देश्य को देखने के बजाय, उसके प्रभाव को देखा जाना चाहिये।
- अत: यदि विधायिका, भले ही अंतिम चरण में ही सही, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे निरस्त किया जा सकता है।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978):
- उचतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि बिना कारण बताए किसी का पासपोर्ट जब्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
- न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 परस्पर विरोधी नहीं हैं, अपितु वे एक दूसरे का समर्थन करते हैं, मजबूत करते हैं और एक दूसरे के साथ-साथ चलते हैं।
- न्यायालय ने "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" शब्दों का निर्वचन "उचित प्रक्रिया" के रूप में किया।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे को बहुत विस्तारित किया गया और इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित सभी अधिकार शामिल माने गए, जिन्हें केवल एक ऐसी प्रक्रिया द्वारा प्रतिबंधित किया जा सकता है जो "निष्पक्ष, न्यायसंगत और युक्तियुक्त हो, न कि मनमाना, दमनकारी या स्वेच्छाचारी।"
- न्यायालय ने आगे कहा कि विधि को न्यायसंगत, निष्पक्ष और युक्तियुक्त भी होना चाहिये, इस प्रकार अनुच्छेद 21 के दायरे में वास्तविक उचित प्रक्रिया को भी सम्मिलित किया जाना चाहिये।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सम्मिलित अधिकार:
- निजता का अधिकार
- विदेश जाने का अधिकार
- आश्रय का अधिकार
- एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार
- सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार
- हथकड़ी लगाने के विरुद्ध अधिकार
- अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध अधिकार
- विलंबित निष्पादन के विरुद्ध अधिकार
- सार्वजनिक फांसी के विरुद्ध अधिकार
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
- प्रदूषण मुक्त जल और वायु का अधिकार
- प्रत्येक बच्चे को पूर्ण विकास का अधिकार है
- स्वास्थ्य और चिकित्सा सहायता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- विचाराधीन कैदियों को संरक्षण