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आपराधिक कानून

अधिवक्ता की सहायता से दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट संदेहास्पद नहीं मानी जाएगी

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 07-Mar-2026

"केवल इस आधार पर कि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक अधिवक्ता की सहायता से लिखी गई थीयह नहीं माना जा सकता कि इत्तिलाकर्त्ता ने अपीलकर्त्ता के विरुद्ध मिथ्या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई है।" 

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अब्देश कुमारचौधरी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ नेजगदंबा हरिजन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले मेंयह निर्णय दिया कि निजी अधिवक्ता की सहायता से दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट केवल इसी आधार पर संदिग्ध या कमजोर नहीं हो जाती। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि आपराधिक कार्यवाही के हर चरण मेंजिसमें प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का प्रक्रम भी सम्मिलित हैसभी व्यक्तियों को विधिक सहायता उपलब्ध है और ऐसी सहायता प्राप्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। 

जगदंबा हरिजन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला अम्ल हमले से संबंधित मानव वध के मामले में दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली दाण्डिक अपील से उत्पन्न हुआ है। 
  • इत्तिलाकर्त्ता की माता और भाभी इस हमले की पीडिता थींऔर इत्तिलाकर्त्ता ने स्वयं अपीलकर्त्ता का चेहरा देखा थाजिसने पहले इत्तिलाकर्त्ता के भाई को धमकी दी थी और भाभी के पिता को परेशान किया था।  
  • यह घटना 7/8 मई 2014 की दरमियानी रात करीब 2:00 बजे घटीतथापिप्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) 9 मई 2014 को सुबह 11:00 बजे ही दर्ज की गई और अभियुक्त को 13 मई 2014 को गिरफ्तार किया गया। 
  • बाद में दोनों पीड़ितों ने क्षति के कारण दम तोड़ दिया। 
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304, 326-क और 452 के अधीन दोषसिद्ध ठहराया और धारा 304 और 326-क के अधीन 10,000 रुपए के जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तथा धारा 452 के अधीन 5,000 रुपए के जुर्माने के साथ दो वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दियाऔर जुर्माना न भरने पर छह मास के अतिरिक्त कारावास का दण्ड दिया। तथापिउसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323 के अधीन दोषमुक्त कर दिया गया। 
  • अपीलकर्त्ता ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख कियाजिसमें मुख्य रूप से दो आधार उठाए गए – प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में विलंब और यह तथ्य कि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक निजी अधिवक्ता द्वारा तैयार की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि अम्ल हमले की स्थिति में, प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने की बजाय घायल के इलाज को प्राथमिकता देना एक स्वाभाविक और न्यायसंगत कार्रवाई हैऔर इस प्रकार के विलंब को अकेले अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी का खंडन करने के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता है।  
  • न्यायालय ने कहा कि अम्ल हमले के मामलों और तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता वाली अन्य आपात स्थितियों में " प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पहले चिकित्सा सहायता प्रदान करना एक आवश्यक कदम है"और इस प्रकार के  विलंब को सामान्य और स्वाभाविक माना जाना चाहिये।  
  • अधिवक्ता की सहायता के प्रश्न परन्यायालय ने कहा कि इत्तिलाकर्त्ता एक निरक्षर व्यक्ति था जो गंभीर मानसिक संकट की स्थिति में थाजिसके तत्काल परिवार पर क्रूर अम्ल हमला हुआ थाऔर ऐसी परिस्थितियों में एक साक्षर व्यक्ति - जो संयोगवश एक अधिवक्ता था - की सहायता लेना पूरी तरह से स्वाभाविक था। 
  • न्यायालय ने दृढ़तापूर्वक कहा किआपराधिक कार्यवाही के हर प्रक्रम में विधिक सहायता की अनुमति हैजिसमें प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का प्रक्रम भी शामिल हैऔर निजी अधिवक्ता से सहायता लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। 
  • तथापि न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि अधिवक्ता की सहायता से तैयार की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट कीसावधानीपूर्वक जांच कीजानी चाहिये जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह विद्वेषपूर्ण या प्रेरित नहीं हैन्यायालय ने कहा कि ऐसी सहायताअपने आप मेंप्रथम सूचना रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न नहीं करती है या इसे मिथ्या नहीं बनाती है। 
  • न्यायालय ने इस स्थापित विधिक स्थिति को दोहराया किप्रथम सूचना रिपोर्ट साक्ष्य का एक मूल भाग नहीं है - यह केवल एक साधन है जिसके द्वारा आपराधिक तंत्र को गति प्रदान की जाती है। 
  • अपीलकर्ता के तर्कों में कोई दम न पाते हुएन्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी। 

प्रथम सूचना रिपोर्ट क्या है और इससे संबंधित विधिक उपबंध क्या हैं? 

बारे में: 

  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) एक लिखित दस्तावेज़ है जिसे पुलिस द्वारा किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने की सूचना प्राप्त होने पर तैयार किया जाता है। 
  • संहिता में "प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)" शब्द का उल्लेख नहीं हैयहदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अधीन दी गई सूचना का सामान्य नाम हैजिसेअबभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। 

धारा 173(1) — सूचना का अभिलेखन: 

  • संज्ञेय अपराध से संबंधित इत्तिला मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक सूचना के माध्यम से दी जा सकती हैचाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में किया गया हो (Zero FIR)। 
  • यदि इत्तिला मौखिक रूप से दी गई हैतो अधिकारी को उसे लिखित रूप में दर्ज करना होगाउसे सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाना होगा और उस पर हस्ताक्षर करवाना होगा। 
  • यदि सूचना इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी जाती हैतो उसे अभिलेख में दर्ज किये जाने के तीन दिनों के भीतर सूचना देने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिये 
  • इत्तिला का सार पुलिस थाने द्वारा रखी गई एक विहित पुस्तक में दर्ज किया जाना चाहिये 

धारा 173(1) के अधीन विशेष उपबंध: 

  • जहाँ कथित अपराध किसी महिला के विरुद्ध है (भारतीय न्याय संहिता, 2023 की निर्दिष्ट धाराओं के अधीन), वहाँ इत्तिला एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा अभिलिखित की जानी चाहिये 
  • यदि पीड़ित व्यक्ति मानसिक या शारीरिक रूप से नि:शक्त (अस्थायी या स्थायी रूप से) हैतो इत्तिला पीड़ित के निवास स्थान या उनकी पसंद के किसी स्थान परएक दुभाषिया या विशेष प्रबोधक की उपस्थिति में अभिलिखित की जानी चाहियेऔर ऐसी इत्तिला के अभिलेखन की वीडियो फिल्म तैयार की जानी चाहिये 
  • ऐसे मामलों मेंपुलिस अधिकारी को यथासंभव शीघ्र ही न्यायिक मजिस्ट्रेट के माध्यम से पीड़ित का कथन भी अभिलिखित करवाना चाहिये 

धारा 173(2) — इत्तिला करने वाले को प्रतिलिपि: 

  • दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट की एक प्रति इत्तिला देने वाले या पीड़ित को तुरंत और नि:शुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिये 

धारा 173(3) — प्रारंभिक जांच (नया उपबंध): 

  • तीनवर्ष या उससे अधिक किंतु सात वर्ष से कम दण्ड वाले संज्ञेय अपराधों के लियेभारसाधक अधिकारीपुलिस उप अधीक्षक की पूर्व अनुमति सेनिम्न में से कोई एक कार्य कर सकता है: 
  • प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहींयह पता लगाने के लिये 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांचकरें या 
  • यदि प्रथम दृष्टया मामला विद्यमान हो तोसीधे अन्वेषणशुरू करें । 

धारा 173(4) — प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से इंकार के विरुद्ध उपचार: 

  • यदि कोई अधिकारी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इंकार करता हैतो पीड़ित व्यक्ति डाक द्वारा लिखित रूपमेंसूचना का सार पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। 
  • यदि पुलिस अधीक्षक (SP) को यह समाधान हो जाता है कि कोई संज्ञेय अपराध किया गया हैतो वे या तो स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या किसी अधीनस्थ अधिकारी को अन्वेषण करने का निदेश देगा 
  • यदि यह उपचार भी विफल हो जाता हैतो पीड़ित व्यक्ति भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के अधीन मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है। 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की तुलना में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता द्वारा पेश की गई प्रमुख नई विशेषताएँ: 

  • Zero FIR— प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को क्षेत्रीय अधिकारिता की परवाह किये बिना किसी भी पुलिस थाने में दर्ज किया जा सकता है। 
  • इलेक्ट्रॉनिक प्रथम सूचना रिपोर्ट — अब इलेक्ट्रॉनिक संसूचना के माध्यम से सूचना दी जा सकती है। 
  • प्रारंभिक पूछताछ — मध्यम श्रेणी के अपराधों (जिनके लिए से वर्ष तक का दण्ड निर्धारित है) के लिये एक संरचित पूर्व-अन्वेषण जांच तंत्र का उपबंध किया गया है 
  • पीड़ित संरक्षण में वृद्धिसंवेदनशील पीड़ितों के लिये महिला अधिकारी द्वारा रिकॉर्डिंग और वीडियोग्राफी अनिवार्य।