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आपराधिक कानून

सार्वजनिक अभिलेखों में दस्तावेज़ का पता न चल पाना ही उसे कूटरचित साबित नहीं करता

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 26-Feb-2026

वंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"केवल इसलिये कि कोई दस्तावेज़ जारी होने के कई वर्षों बाद अभिलेखों में नहीं मिल पातायह नहीं कहा जा सकता कि वह दस्तावेज़ कूटरचित है। किसी दस्तावेज़ को कूटरचित तभी माना जाएगा जब अभिकथन यह साबित करने के लिये किये गए हों कि वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अंतर्गत एक मिथ्या दस्तावेज़ है।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और मनोज मिश्रा  

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और मनोज मिश्रा की पीठ नेवंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें एक आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया थाजिसमें कूटरचना का आरोप केवल एक सार्वजनिक कार्यालय के अभिलेखों में एक दस्तावेज़ के न मिलने पर आधारित था। 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया किकिसी दस्तावेज़ का पता न चल पाना स्वतः ही इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा सकता कि दस्तावेज़ कूटरचित हैऔर धारा 464 भारतीय दण्ड संहिता (भारतीय न्याय संहिता की धारा 335) के तत्त्वों को स्वतंत्र रूप से स्थापित किया जाना चाहिये 

वंदना जैन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या है ? 

  • यह मामलाकानपुर में एक संपत्ति के विकास के लिये अपीलकर्त्ताओं और मोटर जनरल सेल्स लिमिटेड के बीच 16 अगस्त, 2010 को हुए एकसंयुक्त उद्यम समझौते (JVA) से उत्पन्न हुआ है। 
  • अंततः संयुक्त उद्यम समझौते (JVA) असफल साबित हुआ। 
  • लगभग 11 वर्ष पश्चात्मार्च 2021 मेंपरिवादकर्त्ता ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406, 420, 467, 468 और 471 के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई। 
  • परिवादकर्त्ता ने अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ताओं ने संपत्ति पर अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिये कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया एक कूटरचित पत्र प्रस्तुत किया था।  
  • कूटरचना के आरोप का आधार यह था कि उक्त पत्र उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट के कार्यालय में नहीं मिलाजहाँ से इसे जारी किया गया माना जा रहा था। 
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ताओं की याचिका खारिज कर दी। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने भारत के उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया है कि जब तक भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 की शर्तें पूरी नहीं होतीं , तब तक मिथ्या दस्तावेज़ रचने का कोई अपराध नहीं बनता। 
  • न्यायालय ने परिवादकर्त्ता के इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया किआधिकारिक अभिलेखों में किसी दस्तावेज़ का न मिल पानाअपने आप मेंकूटरचना का निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं हो सकता।  
  • न्यायालय ने टिप्पणी की: "यह सर्वविदित है कि प्रश्नगत प्रमाण पत्र/पत्र जैसे दस्तावेज़ स्थायी रूप से संरक्षित नहीं रखे जाते हैं। इसलियेयदि 10 या 11 वर्षों के बादकेवल इसलिये कि कार्यालय यह रिपोर्ट करता है कि ऐसा पत्र/प्रमाण पत्र कार्यालय के अभिलेखों में नहीं मिल रहा हैतो यह नहीं कहा जा सकता कि यह कूटरचित है।" 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कोई दस्तावेज़ तभी कूटरचित माना जाता है जब आरोप यह साबित करते हैं कि वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अधीन एक मिथ्या दस्तावेज़ है - जिसके लिये दस्तावेज़ के निर्माणहस्ताक्षर या परिवर्तन के समय बेईमानी या कपटपूर्ण आशय का सबूत आवश्यक है। 
  • उपरोक्त तथ्यों के आलोक मेंन्यायालयने अपील मंजूर कर लीऔर अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 335 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 335 मिथ्या दस्तावेज़ रचित करने से संबंधित है। 
  • पहले यह धारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 464 के अंतर्गत आती थी। 

अपराध किसके द्वारा किया जाता है? 

कोई व्यक्ति मिथ्या दस्तावेज़ अथवा मिथ्या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख रचता हैयदि वह बेईमानी या कपटपूर्वक निम्नलिखित में से किसी भी प्रकार से कार्य करता है:    

  • किसी दस्तावेज़ को या दस्तावेज़ के भाग को रचितहस्ताक्षरितमुद्रांकित या निष्पादित करता है।  
  • किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख को या किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख के भाग को रचित या पारेषित करता है 
  • किसी इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख पर कोई इलैक्ट्रॉनिक चिन्हक लगाता है 
  • किसी दस्तावेज़/इलेक्ट्रॉनिक चिन्हक की अधिप्रमाणिकता का द्योतन करने वाला कोई भी चिह्न बनानायह जानते हुए कि वास्तव में उस व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया हैजिससे उसका आभास कराया जा रहा है।  
  • किसी भी दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के किसी भी महत्त्वपूर्ण भाग में बिना विधिक अधिकार के परिवर्तन करनाचाहे मूल निर्माता जीवित हो या मृत। 
  • किसी अन्य व्यक्ति से उसकी चित्त-विकृतिमत्तता या प्रवंचना के माध्यम से इस प्रकार हस्ताक्षरमुद्रांकननिष्पादन अथवा परिवर्तन कराना कि वह व्यक्ति दस्तावेज़ की विषयवस्तु या किये गए परिवर्तन की प्रकृति से अनभिज्ञ रहे।  

मुख्य स्पष्टीकरण: 

  • यदि कोई व्यक्ति अपने नाम से हस्ताक्षर करता हैतथापि यदि उसका आशय उसी नाम के किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिरूपण करना होतो वह भी कूटरचना का अपराध कर सकता है।  
  • किसी काल्पनिक या मृत व्यक्ति के नाम से इस आशय से मिथ्या दस्तावेज़ बनाना कि उसे वास्तविक अथवा उसके जीवनकाल में निर्मित माना जाएकूटरचना की श्रेणी में आएगा। 
  • "इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर अंकित करना" का वही अर्थ है जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत निर्धारित है।