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आपराधिक कानून
अवैध पारितोषण की मांग के मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17क लागू नहीं होती
«05-Feb-2026
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अनिल दाइमा आदि बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "धारा 17क को किसी भी प्रकार से अवैध पारितोषण की मांग के मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता है।" न्यायमूर्ति जे.बी परदीवाला और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और एस.सी. शर्मा की पीठ ने अनिल दाइमा आदि बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17क के अधीन संरक्षण को लोक सेवकों द्वारा अवैध पारितोषण की मांग से जुड़े मामलों तक विस्तारित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह उपबंध आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में लिये गए निर्णयों या सिफारिशों तक ही सीमित है।
अनिल दाइमा आदि बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- ये याचिकाएँ राजस्थान उच्च न्यायालय के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थीं, जिसमें राज्य के भीतर तैनात केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों को दर्ज करने और उनके अन्वेषण करने के लिये राज्य भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो की अधिकारिता को बरकरार रखा गया था।
- उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस प्रकार के अन्वेषण के लिये केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की पूर्व सहमति या अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
- याचिकाकर्त्ता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 7क के अधीन अपराधों का सामना कर रहा था।
- उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों के विरुद्ध विधि के दो प्रश्नों का उत्तर देते हुए यह माना था कि राज्य ACB केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन मामले दर्ज करने के लिये सक्षम है।
- उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि CBI की मंजूरी के बिना राज्य ACB द्वारा दायर किया गया आरोपपत्र वैध था।
- कर्मचारी ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 17-क के अधीन नियुक्ति प्राधिकारी, अर्थात् केंद्र सरकार से पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी अन्वेषण आगे नहीं बढ़ सकता।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि चूँकि वह केंद्र सरकार का कर्मचारी है, इसलिये केवल CBI ही उसके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों का अन्वेषण कर सकती है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि धारा 17क एक विशेष उद्देश्य से अधिनियमित की गई थी और यह लोक सेवकों द्वारा आधिकारिक कार्यों या कर्त्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिये गए निर्णयों से संबंधित अपराधों की जांच या अन्वेषण पर लागू होता है।
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी प्रकार से धारा 17क को अवैध पारितोषण की मांग के मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता है।
- न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के इस विचार का समर्थन किया कि यह कहना गलत है कि केवल CBI ही केंद्र सरकार के कर्मचारी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित कर सकती है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य पुलिस भी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध अन्वेषण कर सकती है।
- न्यायालय ने यह माना कि धारा 17क के अधीन मंजूरी की आवश्यकता तभी उत्पन्न होती है जब अपराधिक कृत्य आधिकारिक कर्त्तव्य के निर्वहन के दौरान किया गया हो।
- पारितोषण अवैध पारितोषण का कथित कृत्य आधिकारिक कर्त्तव्यों के अंतर्गत नहीं आता था, इसलिये पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता उत्पन्न नहीं हो सकती थी।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता की याचिका खारिज करते हुए केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों का अन्वेषण करने के लिये राज्य ACB की अधिकारिता की पुष्टि की।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17क क्या है?
परिचय:
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में धारा 17क को 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था।
- इसमें यह अनिवार्य किया गया है कि अधिनियम के अधीन किसी लोक सेवक के विरुद्ध अन्वेषण शुरू करने के लिये सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।
- इस उपबंध में कहा गया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिये गए किसी भी निर्णय या सिफारिश के संबंध में किसी लोक सेवक के विरुद्ध कोई पूछताछ, जांच या अन्वेषण प्रारंभ नहीं कर सकता है।
- सक्षम प्राधिकारी से तात्पर्य केंद्र या राज्य सरकार के उपयुक्त प्राधिकारी से है।
धारा 17क के पीछे का तर्क:
- यह उपबंध लोक सेवकों के विरुद्ध निराधार और परेशान करने वाले परिवादों को रोकने के लिये लागू किया गया था।
- इसका उद्देश्य लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण अन्वेषण के माध्यम से उत्पीड़न से बचाना था।
- इसका उद्देश्य उन ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देना था जो आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में सद्भावनापूर्ण निर्णय लेते हैं।
- समर्थकों ने तर्क दिया कि अन्वेषण के भय से उत्पन्न होने वाले नीतिगत गतिरोध को रोकने के लिये यह आवश्यक था।
- इस उपबंध का उद्देश्य पूर्ण अन्वेषण से पहले परिवादों के अन्वेषण के लिये एक सांविधिक फिल्टर बनाना था।