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सांविधानिक विधि
16वाँ वित्त आयोग: आर्थिक विकास के लिये राजकोषीय संघवाद का पुनर्संतुलन
«03-Feb-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट के साथ 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो भारत के वित्तीय संघवाद ढाँचे में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। सरकार द्वारा 2026-31 के लिये विभाज्य केंद्रीय करों में राज्यों का अंश 41% बनाए रखने की आयोग की सिफारिश को स्वीकार करने से निरंतरता सुनिश्चित होती है, जबकि वितरण मानदंडों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आर्थिक प्रदर्शन और सतत विकास को पुरस्कृत करने की दिशा में एक रणनीतिक परिवर्तन का संकेत देता है।
विकेंद्रीकरण के मानदंडों में प्रमुख परिवर्तन क्या हैं?
GDP योगदान पैरामीटर का समावेश:
- सबसे महत्त्वपूर्ण नवाचार "जीडीपी में योगदान" के लिये 10% भार का परिचय है, जिसकी गणना राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के वर्गमूल का उपयोग करके की जाती है।
- यह राज्यों को उनके आर्थिक उत्पादन के लिये प्रोत्साहित करता है, जिससे विकासोन्मुख नीतियों को बढ़ावा मिलता है, साथ ही अनुपातिक संतुलन बनाए रखते हुए छोटी अर्थव्यवस्थाओं के हितों की भी रक्षा करता है।
पुनः अंशांकित भार:
- नए मापदंडों को ध्यान में रखते हुए, समानता पर ध्यान केंद्रित रखते हुए आय दूरी का भार 45% से घटाकर 42.5% कर दिया गया है।
- जनसंख्या का भार 15% से बढ़कर 17.5% हो गया, जो जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को दर्शाता है। क्षेत्रफल का भार 15% से घटकर 10% हो गया, जिससे भौगोलिक आकार पर जोर कम हो गया।
- टैक्स संबंधी प्रयास को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है, जिससे पहले का 2.5% आवंटन भी हट गया है।
उन्नत वन एवं पारिस्थितिकी मानदंड:
- अब 10% वेटेज में खुले वन भी सम्मिलित हैं और यह 2015-23 के बीच वन आवरण वृद्धि को पुरस्कृत करता है, जिससे आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
विकेंद्रीकरण के अतिरिक्त प्रमुख सिफारिशें क्या हैं?
व्यापक अनुदान ढाँचा:
- कुल 9.47 लाख करोड़ रुपए की अनुदान सहायता में से 7.91 लाख करोड़ रुपए स्थानीय निकायों के लिये और 1.56 लाख करोड़ रुपए आपदा प्रबंधन के लिये हैं।
- शहरी स्थानीय निकायों को अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिये विशेष अवसंरचना अनुदान (₹56,100 करोड़) और शहरी बाहरी क्षेत्रों के एकीकरण के लिये शहरीकरण प्रीमियम (₹10,000 करोड़) प्राप्त होता है।
वित्तीय अनुशासन का रोडमैप:
- केंद्र सरकार ने 2030-31 तक राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3.5% पर निर्धारित किया है, जबकि राज्यों के लिये यह सीमा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3% तक सीमित है। संयुक्त ऋण में GDP के 77.3% से घटकर 73.1% होने का अनुमान है, जिससे व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होगी।
संरचनात्मक सुधार:
- विद्युत क्षेत्र में सुधारों के अधीन DISCOM के निजीकरण और SPV के माध्यम से ऋण भंडारण को अनिवार्य किया गया है।
- सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम सुधारों के अधीन 308 निष्क्रिय राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को बंद करना आवश्यक है।
- सब्सिडी के युक्तिकरण के लिये पारदर्शी लेखांकन और लक्षित वितरण तंत्र की आवश्यकता होती है।
वित्त आयोग के संबंध में विधिक उपबंध क्या हैं?
बारे में:
- भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 280 में वित्त आयोग का उपबंध है, जो एक अर्ध-न्यायिक निकाय है। इसका गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
- अनुच्छेद 280(1) में कहा गया है कि राष्ट्रपति, इस संविधान के प्रारंभ से दो वर्ष के भीतर और सत्य प्रत्येक पाँचवे वर्ष की समाप्ति पर या ऐसे पूर्वतर समय पर, जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझता है, आदेश द्वारा, वित्त आयोग का गठन करेगा जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा।
संघटन:
- अनुच्छेद 280(2) में कहा गया है कि विधि द्वारा, उन अर्हताओं का, जो आयोग के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिये अपेक्षित होंगी और उस रीति का, जिससे उनका चयन किया जाएगा, अवधारण कर सकेगी।
- वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले चार अन्य सदस्य सम्मिलित होते हैं।
- वे राष्ट्रपति द्वारा अपने आदेश में निर्दिष्ट अवधि के लिये पद पर बने रहते हैं। वे पुनर्नियुक्ति के पात्र हैं।
- अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होना चाहिये जिसे सार्वजनिक मामलों का अनुभव हो और अन्य चार सदस्यों का चयन निम्नलिखित में से किया जाना चाहिये:
- उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के योग्य व्यक्ति।
- वह व्यक्ति जिसे सरकार के वित्त और लेखा मामलों का विशेष ज्ञान हो।
- एक ऐसा व्यक्ति जिसे वित्तीय मामलों और प्रशासन में व्यापक अनुभव हो।
- अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
कार्य:
- अनुच्छेद 280(3) में कहा गया है कि आयोग का यह कर्त्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को निम्नलिखित के संबंध में सिफारिशें प्रस्तुत करे—
(क) संघ और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के, जो इस अध्याय के अधीन उनमें विभाजित किये जाने हैं या किये जाएं, वितरण के बारे में और राज्यों के बीच ऐसे आगमों के तत्संबंधी भाग के आबंटन के बारे में।
(ख) भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांतों के बारे में।
(खख) राज्य के वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य में पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिये किसी राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिये आवश्यक अध्युपायों के बारे में।
(ग) राज्य के वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य की नगरपालिकाओं के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिये राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिये आवश्यक अध्युपायों के बारे में।
(घ) सुदृढ़ वित्त के हित में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को निर्दिष्ट किये गए किसी अन्य विषय के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करे।
निष्कर्ष
16वें वित्त आयोग ने निरंतरता और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखते हुए, ऊर्ध्वाधर विकेंद्रीकरण को बरकरार रखा है और साथ ही प्रदर्शन-आधारित क्षैतिज मानदंड भी लागू किये हैं। GDP में योगदान, पर्यावरणीय स्थिरता और संरचनात्मक सुधारों पर बल राजकोषीय संघवाद के प्रति दूरदर्शी दृष्टिकोण को दर्शाता है। तथापि, कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं—विशेष रूप से DISCOM के निजीकरण और सब्सिडी सुधारों में—जिनके लिये राज्यों में निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता और प्रशासनिक क्षमता की आवश्यकता है।