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पारिवारिक कानून
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की प्रयोज्यता
«04-Feb-2026
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एक्स बनाम एक्स "यदि विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई एक इस अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है, तो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत विवाह विधिक रूप से मान्य नहीं हो सकता है।" न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण और न्यायमूर्ति वकिती रामकृष्ण रेड्डी |
स्रोत: तेलंगाना उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण और वकिती रामकृष्ण रेड्डी की खंडपीठ ने एक्स बनाम एक्स (2026) के मामले में अनुसूचित जनजाति की महिला और अनुसूचित जाति के पुरुष के बीच विवाह को शून्य घोषित कर दिया, यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत विवाह विधि में मान्य नहीं हो सकता है यदि पक्षकारों में से एक अधिनियम द्वारा शासित नहीं है।
एक्स बनाम एक्स (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता महिला अनुसूचित जनजाति से संबंधित थी, जबकि प्रत्यर्थी अनुसूचित जनजाति (SC माला) श्रेणी से संबंधित था।
- दोनों पक्षकारों के बीच विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन रजिस्ट्रीकृत किया गया था और कथित तौर पर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार एक मंदिर में संपन्न हुआ था।
- अपीलकर्त्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अधीन विवाह विच्छेद की मांग करते हुए कुटुंब न्यायालय का रुख किया।
- उसने दावा किया कि यह विवाह प्रत्यर्थी के दबाव और धमकी के कारण हुई थी।
- प्रत्यर्थी ने अभिकथनों से इंकार किया और तर्क दिया कि विवाह स्वैच्छिक था और दोनों पक्षकारों ने एक-दूसरे के प्रति प्रेम के कारण विवाह किया था।
- प्रत्यर्थी ने आगे यह भी तर्क दिया कि विवाह संपन्न हो चुका था।
- कुटुंब न्यायालय ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपीलकर्त्ता क्रूरता या जबरन विवाह साबित करने में असफल रहा है।
- कुटुंब न्यायालय ने विवाह को शून्य घोषित करने से इंकार कर दिया।
- इस निर्णय से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने अपील में उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को अधिनियम के आवेदन से स्पष्ट रूप से अपवर्जित करती है, जब तक कि केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा अन्यथा निदेश न दे।
- इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि अपीलकर्त्ता की जनजाति पर अधिनियम की प्रयोज्यता बढ़ाने वाली कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई थी।
- न्यायालय ने यह माना कि व्यक्तिगत विधि के किसी संविधि की प्रयोज्यता विधायी आदेश से उत्पन्न होती है, न कि पक्षकारों की इच्छा या आचरण से।
- यदि कोई हिंदू किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के दायरे में नहीं आता है, तो विधिक रूप से अनुमत तरीका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन ऐसा विवाह करना है, जो कि ऐसे विवाहों को नियंत्रित करने के लिये बनाया गया एक पंथनिरपेक्ष अधिनियम है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि सांविधिक अपवर्जन को रजिस्ट्रीकरण, संस्कार या आपसी सहमति से खत्म नहीं किया जा सकता है।
- इस प्रश्न पर कि क्या केवल विवाह संपन्न होना ही अधिनियम के अंतर्गत लागू होने के लिये पर्याप्त है, न्यायालय ने नकारात्मक उत्तर दिया।
- न्यायालय ने माना कि इस बात को साबित करने के लिये न तो कोई सबूत था और न ही कोई अभिवचन था कि अपीलकर्त्ता ने जनजातीय रीति-रिवाजों को त्याग दिया था या वह पूरी तरह से इस अधिनियम द्वारा शासित था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऐसे मामले में केवल विवाह संपन्न करना विधिक रूप से अपर्याप्त है।
- उच्च न्यायालय ने माना कि कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन वैवाहिक विवाद का निर्णय करते समय, अपीलकर्त्ता पर इसकी सांविधिक प्रयोज्यता का पूर्व अवधारण किये बिना, अधिकारिता संबंधी त्रुटि की थी।
- न्यायालय ने तर्क दिया कि जब अधिकारिता स्वयं ऐसी प्रयोज्यता पर निर्भर करता है, तो उस पर निर्णय न देना संपूर्ण प्रक्रिया को अधिकारिक दृष्टि से कमजोर बना देता है, जिसके लिये अपीलीय हस्तक्षेप आवश्यक है।
- परिणामस्वरूप, यह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम अपीलकर्त्ता पर लागू नहीं होता है, न्यायालय ने अपील को स्वीकार कर लिया और कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को अपास्त कर दिया, इस प्रकार विवाह को शून्य घोषित कर दिया।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 क्या है?
बारे में:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 एक ऐसा विधान है जिसे हिंदुओं में विवाह से संबंधित विधि को संहिताबद्ध और संशोधित करने के लिये अधिनियमित किया गया है।
- यह अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है, किंतु अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को स्पष्ट रूप से इससे अपवर्जित किया गया है, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा अन्यथा अधिसूचित न किया जाए।
- अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों को इसकी प्रयोज्यता से सांविधिक रूप से अपवर्जित करने का उपबंध करती है।
- यह अधिनियम वैध हिंदू विवाहों के लिये शर्तें, तलाक के आधार और वैवाहिक उपचारों की प्रक्रियाएँ विहित करता है।
अनुसूचित जनजातियों पर हिंदू विवाह अधिनियम की प्रयोज्यता:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को अधिनियम के आवेदन से स्पष्ट रूप से अपवर्जित करती है।
- यह अपवाद तब तक लागू रहेगा जब तक कि केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से किसी विशेष अनुसूचित जनजाति या जनजातियों के लिये अन्यथा निदेश न दे दे।
- सांविधिक अपवर्जन विधायी जनादेश पर आधारित है और इसे पक्षकारों के आचरण, सम्मति या इच्छा माध्यम से अधिभावी नहीं किया जा सकता।
- हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन विवाह का रजिस्ट्रीकरण या हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह का संपन्न होना, उस स्थिति में विवाह को वैधता प्रदान नहीं करता जब एक पक्षकार विधिक रूप से विवाह से वंचित हो।
वैकल्पिक विधिक ढाँचा:
- यदि कोई हिंदू किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के दायरे में नहीं आता है, तो विधिक रूप से अनुमत तरीका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन ऐसा विवाह करना है।
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 एक पंथनिरपेक्ष अधिनियम है जिसे अंतर-सामुदायिक और अंतर-धार्मिक विवाहों को नियंत्रित करने के लिये बनाया गया है।
- यह अधिनियम धार्मिक या सामुदायिक आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है और ऐसे विवाहों के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
- विशेष विवाह अधिनियम विभिन्न समुदायों या धर्मों से संबंधित व्यक्तियों के बीच विवाह को विधिक वैधता और संरक्षण सुनिश्चित करता है।