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आपराधिक कानून

बाल देखरेख और पुनर्वास हेतु संस्थागत तंत्र

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 02-Feb-2026

परिचय 

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 यह मानता है कि प्रभावी बाल संरक्षण के लिये विशेष संस्थानों के एक व्यापक नेटवर्क की आवश्यकता होती हैजिनमें से प्रत्येक देखरेख और पुनर्वास की निरंतरता में अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करता है। इन संस्थागत तंत्रों में तत्काल आवश्यकता वाले बालकों के लिये अस्थायी आश्रय से लेकर अपराध करने वाले बालकों के लिये दीर्घकालिक पुनर्वास गृह तक सम्मिलित हैं। 

  • इस अधिनियम में खुले आश्रयपोषण देखरेख व्यवस्थाओंपर्यवेक्षण गृहोंविशेष गृहोंसुरक्षित स्थानोंबाल गृहों और उपयुक्त सुविधाओं का उपबंध हैजिनमें से प्रत्येक को विशिष्ट उद्देश्यों और संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्थापित एवं संचालित किया जाना अभिप्रेत है।  

संस्थागत तंत्रों पर आधारित विधिक उपबंध 

धारा 43: खुला आश्रय 

  • राज्य सरकार स्वयं या स्वैच्छिक अथवा गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से उतने खुले आश्रय स्थापित कर सकेगी और उनका रखरखाव कर सकेगी, जितने अपेक्षित हों और ऐसे खुले आश्रय का ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, उस रूप में रजिस्टर किया जाएगा 
  • खुले आश्रय उन बालकों के लिये सामुदायिक सुविधाओं के रूप में कार्य करते हैं जिन्हें अल्पकालिक आधार पर आवासीय सहायता की आवश्यकता होती है। 
  • इसका प्राथमिक उद्देश्य बालकों को दुर्व्यवहार से बचानाउन्हें सड़कों पर निराश्रित छोड़े जाने से बचाने के उद्देश्य से दूर करना या उन्हें सड़कों से दूर रखना है। 
  • खुले आश्रय प्रत्येक मास ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, आश्रय की सेवाओं का लाभ उठाने वाले बालकों की बाबत जिला बालक संरक्षण एकक और समिति की सूचना भेजेंगे 

धारा 44: पोषण देखरेख 

  • जिन बालकों को देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता हैउन्हें समिति के आदेशों के माध्यम से उन कुटुंब में पोषण देखरेख में रखा जा सकता है जिनमें उनके जैव या दत्तक माता-पिता सम्मिलित नहीं हैं।  
  • पोषण कुटुंब का चयनआशयक्षमता और पूर्व अनुभव के आधार पर किया जाता है। 
  • सहोदरों को पोषण कुटुंबों में तब तक एक साथ रखने प्रयास किया जाएगा, जब तक उन्हें एक साथ रखना उनके सर्वोत्तम हित में हो  
  • राज्य सरकार जिला बाल संरक्षण एकक के माध्यम से मासिक वित्त पोषण प्रदान करती है। पोषण कुटुंबों का उत्तरदायित्त्व बालकों को शिक्षास्वास्थ्य और पोषण प्रदान करना है। 
  • समिति को बालकों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिये मासिक निरीक्षण करना होगा। 
  • यदि माता-पिता को अयोग्य पाया जाता हैतो वे नियमित अंतराल पर बालकों से मिल सकते हैंजब तक कि समिति अन्यथा निर्णय न लेऔर माता-पिता के योग्य घोषित होने पर बच्चे अंततः घर लौट सकते हैं। 
  • किसी भी ऐसे बालक कोजिसे दत्तक ग्रहण योग्य पाया जाता हैदीर्घकालीन पोषण देखरेख के लिये नहीं दिया जाएगा। 

धारा 47: संप्रेक्षण गृह 

  • राज्य सरकार को प्रत्येक जिले या जिलों के समूह में संप्रेक्षण गृह स्थापित करने और उनका रखरखाव करने की आवश्यकता हैजिससे जांच लंबित रहने के दौरान विधि का उल्लंघन करने के अभिकथित किसी बालक को अस्थायी रूप से रखा जा सकेउनकी देखरेख की जा सके और उनका पुनर्वास किया जा सके। 
  • इन गृह को धारा 41 के अधीन रजिस्ट्रीकृत कराना होगा। 
  • राज्य सरकार अन्य उपयुक्त संस्थानों को भी संप्रेक्षण गृह के रूप में रजिस्ट्रीकृत कर सकती है। नियमों में प्रबंधनमानीटरी​​मानक और पुनर्वास एवं सामाजिक एकीकरण के लिये सेवाओं का उपबंध हैजिसमें रजिस्ट्रीकरण मंजूर करने या वापस लेने की परिस्थितियाँ भी सम्मिलित हैं। 
  • संप्रेक्षण गृहों में रखे गए बालकों को उनकी आयु और लिंग के अनुसार अलग-अलग रखा जाना चाहियेसाथ ही उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति और किये गए अपराध की गंभीरता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये 

धारा 48: विशेष गृह  

  • राज्य सरकार प्रत्येक जिले या जिलों के समूह में उन बालकों के पुनर्वास के लिये विशेष गृह स्थापित और रखरखाव कर सकती है जो विधि का उल्लंघन करते हैं और जिन्हें अपराध करने का दोषी पाया गया है और जिन्हें धारा 18 के अधीन किशोर न्याय बोर्ड के आदेशों द्वारा वहाँ रखा गया है। 
  • इन गृह का विहित रीति से रजिस्ट्रीकरण कराना अनिवार्य है। नियमों में प्रबंधनमानीटरी​​मानक और सामाजिक पुनर्एकीकरण के लिये आवश्यक सेवाओं का उपबंध है।  
  • इन नियमों में बालकों को उनकी आयुलिंगकिये गए अपराध की प्रकृति और मानसिक एवं शारीरिक स्थिति के आधार पर विलग करने और पृथक् करने का भी उपबंध है। 

धारा 49: सुरक्षित स्थान 

  • राज्य सरकार को धारा 41 के अधीन रजिस्ट्रीकृतराज्य में कम से कम एक सुरक्षित स्थान स्थापित करना होगाजिसमें अठारह वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों या सोलह से अठारह वर्ष की आयु के विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों को रखा जा सकेजिन पर जघन्य अपराध करने का आरोप है या जिन्हें दोषी ठहराया गया है। 
  • प्रत्येक सुरक्षित स्थान में जांच की प्रक्रिया के दौरान उपस्थित लोगों और दोषी ठहराए गए लोगों के लिये अलग प्रबंध और सुविधाएं होनी चाहिये 
  • राज्य सरकार नियमों के माध्यम से उन स्थानों के प्रकार का उपबंध कर सकती है जिन्हें सुरक्षित स्थान के रूप में अभिहित किया जा सकता है और उनमें प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और सेवाओं को भी विहित कर सकती है। 

धारा 50: बाल गृह 

  • राज्य सरकार प्रत्येक जिले या जिलों के समूह में बाल गृह स्थापित और संचालित कर सकती हैजिससे देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों को उनकी देखरेखउपचारशिक्षाप्रशिक्षणविकास और पुनर्वास के लिये रखा जा सके। 
  • राज्य सरकार को विशेष आवश्यकता वाले बालकों के लिये उपयुक्त गृह नामित करने होंगे जो विशेष सेवाएँ प्रदान करते हों। नियमों में बाल गृहों की मानीटरी और प्रबंधन का उपबंध हैजिसमें प्रत्येक बालक के लिये व्यक्तिगत देखरेख योजनाओं के आधार पर मानक और सेवाएँ सम्मिलित हैं। 

धारा 51: उचित सुविधा तंत्र  

  • बोर्ड या समिति किसी भी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत सरकारीस्वैच्छिक या गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संचालित सुविधाओं को विनिर्दिष्ट उद्देश्यों के लिये किसी बालक का अस्थायी रूप से उत्तरदायित्त्व लेने के लिये उपयुक्त मान सकती है। 
  • विहित रीति से बालक की देखरेख करने के लिये सुविधा और संगठन की उपयुक्तता के संबंध में उचित जांच के बाद मान्यता प्रदान की जाती है। 
  • बोर्ड या समिति लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों के आधार पर मान्यता वापस ले सकती है। 

निष्कर्ष 

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के अधीन स्थापित संस्थागत तंत्र बाल संरक्षण और पुनर्वास के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रस्तुत करते हैं। ये उपबंध इस बात को मान्यता देते हैं कि विभिन्न श्रेणियों के बालकों को अलग-अलग प्रकार की देखरेख और हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। तत्काल अल्पकालिक सहायता प्रदान करने वाले खुले आश्रयों से लेकर कुटुंब-आधारित देखरेख प्रदान करने वाले पोषण गृहोंऔर विधि का उल्लंघन कर रहे बालकों के लिये संप्रेक्षण गृहों और विशेष गृहों तकयह अधिनियम देखरेख विकल्पों की एक श्रृंखला प्रदान करता है। रजिस्ट्रीकरणमानीटरी​​निरीक्षण और विहित मानकों की देखरेख पर बल देने से उत्तरदायित्त्व और देखरेख की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। किशोर न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति के समन्वय से कार्य करने वाले ये संस्थागत तंत्र भारत की किशोर न्याय प्रणाली की रीढ़ हैंजो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक बालक को उचित देखरेखसंरक्षण और पुनर्वास तथा समाज में पुनः एकीकरण के अवसर प्राप्त हों।