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पारिवारिक कानून
अविवाहित पोत्री की सीमित संपत्ति आत्यन्तिकतः में परिवर्तित हो सकती है
«03-Feb-2026
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श्रीमती अजीत इंदर सिंह बनाम श्री सिमरनजीत सिंह ग्रेवाल और अन्य "किसी पूर्व-मृत पुत्र की अविवाहित अवयस्क पुत्री का भरण-पोषण करने का कर्त्तव्य हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के अधीन उसकी सीमित संपत्ति को आत्यन्तिकतः स्वामित्व में विस्तारित करने में सक्षम 'पूर्ववर्ती अधिकार' का गठन कर सकता है।" न्यायमूर्ति पुरुषइंद्र कुमार कौरव |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पुरुषैन्द्र कुमार कौरव ने श्रीमती अजीत इंदर सिंह बनाम श्री सिमरनजीत सिंह ग्रेवाल एवं अन्य (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि पूर्व-मृत पुत्र की अविवाहित अवयस्क पुत्री का भरण-पोषण करने का कर्त्तव्य एक "पूर्ववर्ती अधिकार" हो सकता है जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (HSA) की धारा 14(1) के अधीन उसकी सीमित संपत्ति को आत्यन्तिकतः स्वामित्व में विस्तारित करने में सक्षम है।
श्रीमती अजीत इंदर सिंह बनाम श्री सिमरनजीत सिंह ग्रेवाल और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला नई दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित संपत्ति के बंटवारे से संबंधित एक वाद से संबंधित था।
- यह वाद मूल स्वामी के दिवंगत पुत्र की पुत्री , 79 वर्षीय अविवाहित महिला द्वारा संपत्ति के बंटवारे की मांग करते हुए संस्थित किया गया था।
- वादी महिला को उनके दादा, स्वर्गीय श्री आर.बी. सरदार बिशन सिंह द्वारा 1956 में निष्पादित एक दान विलेख के माध्यम से विवादित संपत्ति में आजीवन अधिकार दिया गया था।
- 1956 में दान विलेख के निष्पादन के समय, वादी एक अविवाहित अवयस्क थी, और उसके पिता की मृत्यु उसके दादा से पहले हो चुकी थी।
- विवादित संपत्ति मूल स्वामी के वादी और जीवित पुत्रों को संयुक्त रूप से दान में दी गई थी।
- मूल स्वामी के अन्य दो जीवित पुत्रों के वंशज, प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन विभाजन वाद को नामंजूर करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।
- प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि 1956 के दान विलेख के अधीन महिला के पास केवल आजीवन संपत्ति का अधिकार था और दान की प्रतिबंधात्मक शर्तों के कारण उसका हित आत्यन्तिकतः स्वामित्व में तब्दील नहीं हो सकता था।
- प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि वाद का कारण स्पष्ट न होने के कारण उसे नामंजूर कर दिया जाना चाहिये।
- प्रतिवादियों ने यह भी अभिवचन किया कि वाद परिसीमा के कारण वर्जित था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि शास्त्रीय हिंदू विधि महिलाओं की रक्षा और भरण-पोषण के लिये एक निरंतर पारिवारिक दायित्त्व को मान्यता देता है, जो प्राथमिक संरक्षक की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता है, अपितु निकटतम नातेदारों पर आ जाता है।
- याज्ञवल्क्य स्मृति (श्लोक 1.85) के एक हिंदी श्लोक का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि यह कथन शास्त्रीय हिंदू विधि के एक मूलभूत सिद्धांत को समाहित करता है, अर्थात् एक महिला की रक्षा और भरण-पोषण करने का कर्त्तव्य।
- न्यायालय ने कहा कि यह सिद्धांत अवयस्क अवस्था के दौरान पिता पर, विवाह के पश्चात् पति पर और बाद के वर्षों में पुत्रों पर महिला के संरक्षण का कर्त्तव्य निर्धारित करता है।
- न्यायालय ने माना कि यदि वादी महिला का कोई पूर्ववर्ती अधिकार था जिसकी मान्यता में उसे वाद संपत्ति में आजीवन हित दिया गया था, तो उसका भाग हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) के अधीन उसकी पूर्ण संपत्ति होगी।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि हिंदू विधि के अधीन, दादा, निकटतम पैतृक नातेदार होने के नाते, अपने दिवंगत पुत्र की अविवाहित अवयस्क पुत्री का भरण-पोषण करने के लिये नैतिक रूप से बाध्य हो सकते हैं।
- न्यायालय ने कहा कि एक बार संपत्ति किसी आश्रित और अन्य उत्तराधिकारियों को संयुक्त रूप से दान में दे दी जाती है, तो उसका भरण-पोषण करने का दायित्त्व विधिक रूप से सह-अंशधारियों पर आ सकता है।
- न्यायालय ने यह पाया कि स्वर्गीय श्री आर.बी. सरदार बिशन सिंह निकटतम पैतृक नातेदार थे और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन आवेदन पर विचार करने के प्रक्रम में, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि ऐसे आश्रित का भरण-पोषण करने का कोई नैतिक दायित्त्व बिल्कुल नहीं था।
- न्यायाधीश ने विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया जिनमें यह माना गया है कि नैतिक दायित्त्व, कुछ संदर्भों में, संपत्ति प्राप्त करने वालों के हाथों में एक विधिक दायित्त्व में परिवर्तित हो सकता है।
- न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि वादी को भरण-पोषण का पूर्व-स्थापित अधिकार था, जो उसके पैतृक चाचाओं द्वारा उसका भरण-पोषण करने के कानूनी दायित्व से जुड़ा हुआ था।
- न्यायालय ने आगे कहा कि कुछ मामलों में नैतिक दायित्त्व विधिक दायित्त्व का रूप ले सकता है और इसलिये, इस आधार पर वाद-हेतुक प्रकट न करने के कारण वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- न्यायमूर्ति कौरव ने इस अभिवचन को नामंजूर कर दिया कि वाद परिसीमा द्वारा वर्जित है, यह मानते हुए कि स्वामित्व की घोषणा की मांग करने का अधिकार तभी उत्पन्न होगा जब वादी के अधिकारों को पहली बार नकारा गया हो, जो कि 2024 में होने का दावा किया गया था।
- न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन दायर विभाजन वाद को नामंजूर करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 क्या है?
बारे में:
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 को भारत की संसद द्वारा संपत्ति के उत्तराधिकार और विरासत के लिये एक राष्ट्रीय संहिता के रूप में पारित किया गया था।
- इस अधिनियम का उद्देश्य उसके प्रवर्तन से पूर्व भारत में प्रचलित विविध एवं भिन्न-भिन्न रूढ़िगत परंपराओं तथा नियमों को सरल एवं एकरूप बनाना था, जो संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित करते थे।
- महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों को और अधिक सुदृढ़ एवं स्पष्ट करने हेतु इस अधिनियम में वर्ष 2005 में संशोधन किया गया।
- इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य एक एकीकृत, सरल एवं समान विधिक ढाँचा स्थापित करना था जो विभिन्न पारंपरिक प्रथाओं को प्रतिस्थापित करे और लिंग के आधार भेदभाव किये बिना समान संपत्ति अधिकार प्रदान करे।
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने महिलाओं को पुरुषों के समान संपत्ति के स्वामित्व के आत्यन्तिकतः अधिकार प्रदान किये।
अधिनियम की धारा 14:
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 हिंदू महिला की संपत्ति से संबंधित है और उसे उसकी आत्यन्तिकतः संपत्ति के रूप में मान्यता प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि –
(1) हिंदू नारी के कब्जे में की कोई भी संपत्ति, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात् अर्जित की गई हो, उसके द्वारा पूर्ण स्वामी के तौर पर न कि परिसीमित स्वामी के तौर पर धारित की जाएगी।
स्पष्टीकरण- इस उपधारा में "संपत्ति" के अंतर्गत वह जंगम और स्थावर संपत्ति आती है जो हिंदू नारी ने विरासत द्वारा अथवा वसीयत द्वारा अथवा विभाजन में अथवा भरण-पोषण के या भरण-पोषण की बकाया के बदले में अथवा अपने विवाह के पूर्व या विवाह के समय वा पश्चात् दान द्वारा किसी व्यक्ति में, चाहे वह संबंधी हो या न हो, अथवा अपने कौशल या परिश्रम द्वारा अथवा क्रय द्वारा अथवा चिरभोग द्वारा अथवा किसी अन्य रीति से, चाहे वह कैसी ही क्यों न हो, अर्जित की हो और ऐसी संपत्ति भी जो इस अधिनियम के प्रारंभ से अव्यवहित पूर्व स्त्रीधन के रूप में उसके द्वारा धारित थी।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई बात भी किसी संपत्ति को लागू न होगी जी दान अथवा विल द्वारा या अन्य किमी लिखित के अधीन सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के अधीन या पंचाट के अधीन अर्जित की गई हो यदि दान, विल या अन्य लिखत अथवा डिग्री, आदेश या पंचाट के निबंधन ऐमी संपत्ति में निर्बंधन संपदा विहित करते हो।
- चौधरी बनाम अजुधिया (2003) के मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यह अप्रासंगिक है कि महिला ने संपत्ति कैसे अर्जित की और यदि उसके पास कोई संपत्ति है, तो संपत्ति को उसकी आत्यन्तिकतः संपत्ति माना जाता है।