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सांविधानिक विधि
अपवादात्मक परिस्थितियों में कारण बताओ नोटिस को रिट अधिकारिता के अंतर्गत चुनौती दी जा है
« »03-Apr-2026
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श्री निशा बनाम विशेष निदेशक, न्यायनिर्णय प्राधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य "कारण बताओ नोटिस (SCN) के चरण पर हस्तक्षेप अपवादात्मक परिस्थितियों में अनुमेय है, जैसे कि जब उक्त नोटिस स्पष्ट रूप से अधिकारिता के अभाव से ग्रस्त हो, मस्तिष्क के अनुप्रयोग के अभाव को दर्शाता हो, पूर्व-निर्धारित या पूर्वनियोजित दृष्टिकोण के साथ जारी किया गया हो, विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग करता हो, अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का परिणाम हो।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने न्यायमूर्ति श्री निशा बनाम विशेष निदेशक, न्यायनिर्णय प्राधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य (2026) के मामले में दोहराया कि कारण बताओ नोटिसों (SCNs) को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं को हतोत्साहित करने वाला सामान्य नियम विवेक का नियम है - कोई अटूट निषेध नहीं - और उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन असाधारण परिस्थितियों में कारण बताओ नोटिस (SCN) चरण में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखते हैं।
न्यायमूर्ति श्री निशा बनाम विशेष निदेशक, न्यायनिर्णय प्राधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णय कार्यवाही में जारी कारण बताओ नोटिस को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी।
- उच्च न्यायालय ने इस आधार पर रिट याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया कि कारण बताओ नोटिस को चुनौती देना सामान्यत: नोटिस जारी करने के चरण में मंजूर नहीं होता है, क्योंकि कारण बताओ नोटिस जारी करने वाले प्राधिकरण को पहले अपनी न्यायिक प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दी जानी चाहिये।
- उच्च न्यायालय द्वारा रिट अधिकारिता का प्रयोग करने से इंकार करने से व्यथित होकर, याचिकाकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और यह प्रश्न उठाया कि क्या और किन परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन कारण बताओ नोटिस के विरुद्ध रिट याचिका विचारणीय होगी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि यद्यपि सामान्य नियम कारण बताओ नोटिस के चरण में न्यायिक हस्तक्षेप को हतोत्साहित करता है – जिससे न्यायिक प्रक्रिया को बाधित या पटरी से न उतारा जा सके - यह सिद्धांत पूर्ण नहीं है और एक कठोर अधिकारिता संबंधी बाधा के रूप में कार्य नहीं करता है।
- पीठ ने इस बात की पुष्टि की कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता का प्रयोग करने और निम्नलिखित असाधारण परिस्थितियों में कारण बताओ नोटिस (SCN) चरण में हस्तक्षेप करने के लिये सशक्त हैं:
- जहाँ नोटिस में अधिकारिता की स्पष्ट कमी हो।
- जहाँ यह जारी करने वाले प्राधिकरण द्वारा विवेक का प्रयोग न करने को दर्शाता है।
- जहाँ इसे पूर्व निर्धारित या सोची-समझी योजना के अधीन जारी किया जाता है।
- जहाँ यह विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाता है।
- जहाँ इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि ऐसी परिस्थितियों में, स्पष्ट अन्याय को रोकने के लिये उच्च न्यायालय द्वारा अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करना उचित होगा, और कारण बताओ नोटिस (SCN) स्तर पर हस्तक्षेप करने में अनिच्छा न्यायिक विवेक का नियम है न कि सांविधानिक प्रतिषेध।
- भारत संघ बनाम VICCO लेबोरेटरीज (2007) के निर्णय पर विश्वास जताया गया, जिसमें न्यायालय ने पहले ही यह टिप्पणी की थी कि जहाँ कारण बताओ नोटिस या तो अधिकारिता के बिना या विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए जारी किया जाता है, वहाँ एक रिट न्यायालय नोटिस के प्रक्रम में भी हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करेगा।
कारण बताओ नोटिस क्या होता है?
- कारण बताओ नोटिस एक औपचारिक संसूचना है जो किसी न्यायालय, सरकारी अभिकरण या अन्य प्राधिकारी निकाय द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को जारी किया जाता है, जिसमें उनसे उनके कार्यों, निर्णयों या व्यवहार को स्पष्ट करने या उचित ठहराने के लिये कहा जाता है।
- कारण बताओ नोटिस का उद्देश्य प्राप्तकर्ता को विशिष्ट चिंताओं या कथित उल्लंघनों के संबंध में प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण प्रदान करने का अवसर देना है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है?
- अनुच्छेद 226 संविधान के भाग 5 के अंतर्गत निहित है, जो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजन के लिये किसी व्यक्ति या किसी सरकार को बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण रिट सहित आदेश या रिट जारी करने की शक्ति होगी।
- अनुच्छेद 226(2) में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्ति, सरकार या प्राधिकरण को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है।
- इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या
- यदि वाद-हेतुक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ पूर्णत: या भागत: रूप से उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता हैं, तो वह उसके स्थानीय अधिकारिता से बाहर हो जाती है।
- अनुच्छेद 226(3) में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेश, स्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता है, तो वह पक्षकार न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये।
- अनुच्छेद 226(4) कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खंड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी।
- यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण के विरुद्ध जारी किया जा सकता है।
- यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं, और आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है।
- यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है।