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पारिवारिक कानून

समझौता करार होने के बाद पति या पत्नी पारस्परिक विवाह-विच्छेद के लिये दी गई सम्मति को वापस नहीं ले सकते

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 14-Apr-2026

धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी 

"यद्यपि किसी भी पक्षकार के लिये पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद किये जाने से पहले किसी भी प्रक्रम में सम्मति वापस लेना विधि के दायरे में हैलेकिन यदि पक्षकारों के बीच उनके विवादों के पूर्ण और अंतिम निपटारे के संबंध में कोई समझौता पत्र या समझौता-करार हो चुका हैतो उस स्थिति में पक्षकार के लिये उनके बीच तय की गई शर्तों और नियमों से पीछे हटना संभव नहीं है।" 

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी (2026)के मामले मेंनिर्णय दिया कि एक पति या पत्नी पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के लिये दी गई सम्मति को वापस नहीं ले सकता हैजहाँ ऐसी सम्मति पक्षकारों के बीच सभी विवादों को सुलझाने वाले व्यापक मध्यस्थता समझौते के हिस्से के रूप में दी गई थी। 

  • न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन विवाह को भंग कर दिया और पत्नी द्वारा शुरू की गई घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि यह समझौता से मुकर जाने के बाद मुकदमेबाजी को जारी रखने के लिये दायर की गई एक बाद की सोची-समझी कार्रवाई थी। 

धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • दोनों पक्षकारों का विवाह 2000 में हुआ था। 2023 मेंपति ने तलाक के लिये अर्जी दी और कुटुंब न्यायालय ने मामले को मध्यस्थता के लिये भेज दिया। 
  • दोनों पक्षकारों के बीच एक समझौता हुआ जिसके अधीन वे पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के लिये और अपने सभी वित्तीय दावों को आपस में निपटाने पर सहमत हुए। समझौते के अनुसारपति ने प्रथम तलाक याचिका वापस लेने और पत्नी को दो किस्तों में 1.5 करोड़ रुपएकार खरीदने के लिये 14 लाख रुपए और कुछ आभूषण सौंपने पर सहमति जताई। 
  • पत्नी ने अपने संयुक्त व्यवसाय खाते से पति को 2.5 करोड़ रुपए अंतरित करने के लिये एक दान विलेख पर हस्ताक्षर करने पर सहमति व्यक्त की। 
  • इसके बाद आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त याचिका दायर की गई। पति ने समझौते के अनुसार पहली किस्त के रूप में 75 लाख रुपये और 14 लाख रुपये का भुगतान कियाऔर पत्नी ने पति को 2.52 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए। 
  • तथापितलाक के लिये दूसरी याचिका दायर करने से पहले पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली। उसने पति और उसकी माता के विरुद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अधीन परिवाद भी दर्ज करायाजिसके बाद मजिस्ट्रेट ने समन जारी किया। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन कार्यवाही रद्द करने से इंकार करने से व्यथित होकर पति ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। उसने विवाह विच्छेद के लिये अनुच्छेद 142 के अधीन एक आवेदन भी दायर किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • न्यायालय ने वैवाहिक विधिमें एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। न्यायालय ने स्वीकार किया कि पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद को नियंत्रित करने वाले सांविधिक ढाँचे के अधीनअंतिम निर्णय पारित होने से पहले किसी भी पक्षकार को सामान्यत: अपनी सम्मति वापस लेने की स्वतंत्रता होती है। यद्यपिन्यायालय ने यह माना कि यह अधिकार पक्षकारों के बीच सभी विवादों को सुलझाने वाले वार्ता समझौते से उत्पन्न दायित्त्वों की अवहेलना करने तक विस्तारित नहीं होता है। 
  • न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों पर जोर दिया: 
    • एक बार मध्यस्थ द्वारा समझौता प्रमाणित हो जाने और न्यायालय द्वारा पुष्टि हो जाने के बादयह प्रभावी रूप से मूल विवाद का स्थान ले लेता है और पक्षकारों के बीच मार्गदर्शक ढाँचा बन जाता है। कोई भी पक्षकार ऐसे समझौते से आसानी से पीछे नहीं हट सकताक्योंकि ऐसा करना मध्यस्थता प्रक्रिया के मूल आधार पर प्रहार करता है।  
    • विधि के अधीनकोई पक्ष मध्यस्थता समझौते से तभी पीछे हट सकता है जब वह बलकपट या असम्यक् असर के माध्यम से प्राप्त किया गया होया यदि दूसरा पक्षकार करार में निर्धारित दायित्त्वों को पूरा करने में असफल रहा हो। 
    • समझौते की शर्तों से अनुचित विचलन के लिये कठोर परिणाम भुगतने होंगेजिसमें भारी जुर्माना भी शामिल हैजिससे प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके। 
  • पत्नी ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष दावा किया कि अभिलिखित समझौते के अलावापति ने निजी तौर पर 120 करोड़ रुपए के आभूषण और 50 करोड़ रुपए के सोने के बिस्कुट अंतरित करने पर सहमति व्यक्त की थीऔर कर देयता से बचने के लिये इन शर्तों को जानबूझकर अभिलिखित नहीं किया गया था। इस दावे को न्यायालय ने कठोर अस्वीकृति देते हुए कहा कि वह "इस तरह के निडर दावे से स्तब्ध" है। 
  • घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन कार्यवाही के संबंध मेंन्यायालय ने पाया कि विवाह के 23 वर्ष बाद पहली बार कार्यवाही शुरू की गई थीऔर वह भी तब जब पति ने पत्नी के विरुद्ध समझौते से मुकरने के लिये अवमानना ​​याचिका दायर की थी। न्यायालय ने इन कार्यवाहियों को पूर्व नियोजित और बाद में सोची-समझी साजिश मानते हुए इन्हें रद्द कर दिया। 
  • यह देखते हुए कि विवाह अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका थान्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए विवाह को भंग कर दिया और पति को पत्नी को शेष बकाया राशि का भुगतान करने का निदेश दिया। 

पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद क्या है? 

पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद: 

  • पारस्परिक सम्मति से होने वाला विवाह-विच्छेद बिना किसी त्रुटी के विवाह-विच्छेद के सिद्धांत के अंतर्गत आता हैजहाँ पक्षकारों को दूसरे व्यक्ति की गलती साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है। 
  • हिंदू विधि के अधीन पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद का उपबंध धारा 13ख द्वारा जोड़ा गया थाजिसे विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया था और यह 25 मई 1976 से लागू हुआ था। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 : 

  • पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के लिये दोनों पक्षकारों द्वारा संयुक्त रूप से दो याचिकाएँ दायर की जानी आवश्यक हैं। 
  • धारा 13 (1) के अनुसार: 
    • विवाह विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। 
    • क्या विवाह विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के लागू होने से पहले या बाद में संपन्न हुआ था? 
    • दोनों पक्षकार एक वर्ष या उससे अधिक समय से पृथक् रह रहे हों। 
    • याचिका में यह बताया जाना चाहिये कि वे एक साथ रहने में असमर्थ रहे हैंऔर उन्होंने पारस्परिक सम्मति से विवाह को भंग करने का निर्णय लिया है। 
  • धारा 13  (2) द्वितीय प्रस्ताव (motion) के लिये उपबंधित करती है: 
    • इसे कब दाखिल किया जाना चाहिये? 
      • प्रथम प्रस्ताव प्रस्तुत करने के छह महीने से पहले नहीं और उक्त प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अठारह महीने बाद नहीं। 
      • यदि इस बीच याचिका वापस नहीं ली जाती है। 
    • तलाक की डिक्री कैसे पारित की जाती है? 
      • दोनों पक्षकारों की बात सुनने और उचित समझे जाने वाली जांच करने के बाद 
      • विवाह संपन्न हो चुका है और याचिका में उल्लिखित सभी बातें सत्य हैं। 
      • विवाह को निरस्त घोषित करने का डिक्री पारित करेंजो डिक्री जारी होने की तिथि से प्रभावी हो। 
    • उपर्युक्त प्रक्रिया निर्धारित करने का उद्देश्य पक्षकारों को पृथक् होने से पहले कुछ समय साथ बिताने का अवसर देना है। 
    • विवाह किसी भी व्यक्ति के जीवन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और इसलिये पारस्परिक सम्मति से विवाह भंग करने से पहलेदोनों पक्षकारों को विवाह भंग करने के अपने निर्णय पर विचार करने के लिये कुछ उचित समय दिया जाना चाहिये 

धारा 13 ख के अधीन सम्मति वापस लेना: 

  • हितेश भटनागर बनाम दीपा भटनागर (2011): 
    • यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं तो न्यायालय विवाह को भंग घोषित करते हुए विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिये बाध्य है: 
      • दोनों पक्षकारों द्वारा दूसरा प्रस्ताव उपधारा (1) के अधीन आवश्यक याचिका दाखिल करने की तिथि से महीने से पहले और 18 महीने से बाद में नहीं किया जाएगा। 
      • दोनों पक्षकारों की बात सुनने और उचित समझी जाने वाली जांच करने के बादन्यायालय संतुष्ट है कि याचिका में दिये गए कथन सत्य हैंऔर 
      • डिक्री पारित होने से पूर्व किसी भी पक्षकार द्वारा याचिका वापस नहीं ली जाती है; 
  • स्मृति पहाड़िया बनाम संजय पहाड़िया (2009): 
    • धारा 13 ख के अधीन विवाह-विच्छेद की डिग्री केवल पक्षकारों की निरंतर पारस्परिक सम्मति से ही पारित की जा सकती है। 
    • न्यायालय को पक्षकारों के बीच पारस्परिक सम्मति के अस्तित्व के बारे में कुछ ठोस सामग्री के आधार पर संतुष्ट होना होगा जो स्पष्ट रूप से ऐसी सम्मति को प्रकट करती हो। 

कूलिंग-ऑफ पीरियड  (Cooling-off Period):  

  • धारा 13 ख के अधीन यदि याचिका प्रस्तुत करने की तिथि से महीने (और 18 महीने से अधिक नहीं) के बाद याचिका वापस नहीं ली जाती है तो न्यायालय विवाह-विच्छेद की डिग्री पारित कर सकता है। 
  • इस प्रकारदोनों पक्षकारों को महीने का 'कूलिंग ऑफ पीरियड' (सोचने-समझने का समय) दिया जाता है। 

प्रश्न यह उठता है कि क्या कूलिंग ऑफ पीरियड अनिवार्य है या निर्देशात्मक? 

  • अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017): 
    • माननीय आदर्श कुमार गोयल और माननीय उदय उमेश ललित की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्णय दिया कि किसी अवधि को निर्देशात्मक या अनिवार्य निर्धारित करने में केवल भाषा ही निर्णायक नहीं होती। अपितु न्यायालय को संदर्भ पर भी विचार करना होगा। 
    • न्यायालय ने निर्णय दिया कि 'कूलिंग ऑफ पीरियड' (सोचने-समझने का समय) को केवल निम्नलिखित कारकों पर विचार करने के बाद ही क्षमा किया जा सकता है: 
      • धारा 13(2) में निर्दिष्ट छह महीने की सांविधिक अवधिपक्षकारों के पृथक्करण की धारा 13(1) के अंतर्गत एक वर्ष की सांविधिक अवधि के अतिरिक्तप्रथम प्रस्ताव से पहले ही समाप्त हो चुकी है; 
      • पक्षकारों को फिर से मिलाने के लिये आदेश32-क नियम सिविल प्रक्रिया संहिता/अधिनियम की धारा 23(2)/कुटुंब न्यायालय अधिनियम की धारा के अधीन किये गए प्रयासों सहित मध्यस्थता/समझौते के सभी प्रयास असफल रहे हैं और आगे किसी भी प्रयास से उस दिशा में सफलता की कोई संभावना नहीं है; 
      • दोनों पक्षकारों ने गुजारा भत्ताबच्चे की अभिरक्षा या दोनों पक्षकारों के बीच लंबित किसी भी अन्य मुद्दे सहित अपने मतभेदों को वास्तव में सुलझा लिया है; 
      • प्रतीक्षा अवधि से उनकी पीड़ा और भी बढ़ जाएगी। 
  • शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023): 
    • संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि उच्चतम न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 142 (1) के अधीन शक्ति का प्रयोग कर सकता है और धारा 13 ख के अधीन निर्धारित प्रतीक्षा अवधि को समाप्त करते हुए पारस्परिक सम्मति से तलाक दे सकता है।  
    • न्यायालय ने कहा कि 'कूलिंग ऑफ पीरियड' (सोचने-समझने का समय) का उद्देश्य पहले से ही विघटित हो चुके विवाह को और अधिक खींचना या पक्षकारों की पीड़ा को बढ़ाना नहीं है। 
    • न्यायालय ने माना कि उपरोक्त मामले में उल्लिखित कारकों के अलावान्यायालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिये कि क्या पक्षकारों ने स्वेच्छा से और अपनी मर्जी से एक वास्तविक समझौते पर सहमति व्यक्त की है जिसमें गुजारा भत्ताभरण-पोषण और अन्य मामलों का ध्यान रखा गया है। 
    • इस प्रकारन्यायालय ने यह माना कि धारा 13 पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद की डिग्री प्रदान करने के न्यायालय के अधिकार पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती है।