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आपराधिक कानून
धारा 498A: लिव-इन रिलेशनशिप का अपवर्जन
« »15-Jul-2024
स्रोत: द हिंदू
परिचय:
हाल ही में केरल उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 498A, जो किसी महिला के पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा उसके साथ की गई क्रूरता को अपराध बनाती है, लिव-इन रिलेशनशिप (सहजीवन) में रहने वाले जोड़ों पर लागू नहीं होती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "पति" शब्द का अर्थ केवल विधिक रूप से विवाहित पुरुष से है।
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला के साथी पर IPC की धारा 498A के अधीन क्रूरता के लिये वाद नहीं चलाया जा सकता। यह निर्णय उस मामले में लिया गया जिसमें एक व्यक्ति ने इस धारा के अधीन अपने विरुद्ध कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
- न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विधि के अनुसार किसी पुरुष को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498A के अधीन "पति" माने जाने के लिये विवाह आवश्यक है।
एक्स बनाम केरल राज्य मामले की पृष्ठभूमि और न्यायालय की टिप्पणी क्या है?
पृष्ठभूमि:
- याचिकाकर्त्ता मार्च से अगस्त 2023 तक एक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में था।
- महिला ने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उनके रिश्ते के दौरान उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
- याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 498A के अधीन आपराधिक कार्यवाही आरंभ की गई।
- याचिकाकर्त्ता ने इन कार्यवाहियों को रद्द करने के लिये केरल उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
न्यायालय की टिप्पणियाँ:
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498A विशेष रूप से पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के विरुद्ध की गई क्रूरता पर लागू होती है।
- इस संदर्भ में "पति" शब्द का तात्पर्य केवल विधिक रूप से विवाहित पुरुष से है।
- एक लिव-इन पार्टनर, जो विधिक रूप से विवाहित नहीं है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498A के अंतर्गत "पति" की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है।
- टिप्पणियों के आधार पर, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्त्ता, विधिवत विवाह के बिना लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, अतः उस पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498 A के अधीन वाद नहीं चलाया जा सकता।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति क्या है?
- विधिक मान्यता का विकास:
- ऐतिहासिक रूप से वर्जित माने जाने वाले लिव-इन रिलेशनशिप को शहरी भारत में तेज़ी से स्वीकृति मिल रही है तथा इस सामाजिक परिवर्तन से निपटने के लिये विधिक संरक्षण भी विकसित हो रहा है।
- घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आर्थिक अधिकार:
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को कुछ आर्थिक अधिकार प्रदान करता है।
- महाराष्ट्र सरकार का प्रस्ताव:
- वर्ष 2008 में, महाराष्ट्र ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को 'उचित अवधि' के लिये पत्नी जैसा दर्जा देने का प्रस्ताव रखा था, जिसकी अवधि मामले-दर-मामला निर्धारित की जाएगी।
- राष्ट्रीय महिला आयोग की अनुशंसा:
- NCW ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में 'पत्नी' की परिभाषा में संशोधन करने की अनुशंसा की है, ताकि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी इसमें शामिल किया जा सके, जिसका उद्देश्य विधिक सुरक्षा प्रदान करना है।
- न्यायिक समिति की अनुशंसाएँ:
- न्यायमूर्ति मलिमथ समिति ने दीर्घकालिक सहजीवन को विवाह मानने का समर्थन किया तथा लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के लिये भरण-पोषण के दावे को अनुमति देने के लिये CrPC में संशोधन का सुझाव दिया।
- भरण-पोषण पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय:
- वर्ष 2009 में, उच्चतम न्यायालय ने माना कि धारा 125 CrPC के अधीन भरण-पोषण के दावे के लिये विवाह का औपचारिक प्रमाण आवश्यक नहीं है, जिससे प्रभावी रूप से यह अधिकार लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी मिल गया।
- सहजीवन अधिकारों पर उच्च न्यायालय का निर्णय:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वयस्कों के बिना विवाह के सहमति से साथ रहने के अधिकार की पुष्टि की है, जबकि उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि दीर्घकालिक लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह माना जा सकता है तथा ऐसे संबंधों से उत्पन्न बच्चे भी धर्मज माने जाएंगे।
- अन्य:
- लिव-इन रिलेशनशिप की विधिक वैधता पहली बार वर्ष 1978 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय द्वारा स्थापित की गई थी।
- लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता देने में आपसी सहमति, इच्छाशक्ति और विधिक विवाह योग्य आयु जैसे कारकों पर विचार किया जाता है।
- जो जोड़े काफी समय तक एक साथ रहते हैं, उन्हें कुछ विधिक व्याख्याओं के तहत विवाहित माना जा सकता है।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप के वैधानिक प्रावधान क्या हैं?
- संवैधानिक आधार:
- भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को विधिक मान्यता देने का आधार संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
- उच्चतम न्यायालय ने अपने व्याख्यात्मक क्षेत्राधिकार के माध्यम से इस अधिकार को विस्तारित करते हुए, वैवाहिक स्थिति पर ध्यान दिये बिना, अपनी पसंद के साथी के साथ रहने के अधिकार को भी इसमें शामिल कर लिया है।
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005:
- यह अधिनियम लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को विधिक मान्यता और सुरक्षा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण है।
- अधिनियम की धारा 2(f) में "घरेलू संबंध" को परिभाषित करते हुए "विवाह की प्रकृति वाले" संबंधों को शामिल किया गया है।
- यह प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी अधिनियम के अधीन संरक्षण प्रदान करता है तथा उन्हें घरेलू हिंसा के विरुद्ध उपचार प्राप्त करने की अनुमति देता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973:
- CrPC की धारा 125, जो भरण-पोषण से संबंधित है, की व्याख्या न्यायालयों द्वारा इस प्रकार की गई है कि इसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी शामिल किया गया है।
- चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा (2011) मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएँ CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण पाने की अधिकारी हैं।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872:
- साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 दीर्घकालिक सहजीवन के मामलों में विवाह की पूर्वधारणा मानने की अनुमति देती है।
- यह पूर्वधारणा न्यायालयों द्वारा लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले भागीदारों के अधिकारों की रक्षा के लिये लागू की गई है।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता क्या है?
- बद्री प्रसाद बनाम उप निदेशक, चकबंदी (1978): उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विधिक आयु और स्वस्थ मस्तिष्क वाले दो वयस्कों के बीच सहमति से सहजीवन को बिना किसी वैधानिक प्रतिबंध के वैध माना जाएगा, इस ऐतिहासिक निर्णय ने भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता स्थापित की।
- इंद्रा शर्मा बनाम वी. के. शर्मा (2013): न्यायालय ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत यह निर्धारित करने के लिये विशिष्ट मानदण्ड निर्धारित किये हैं कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप, "विवाह की प्रकृति का संबंध" है।
- लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006): संभावित नैतिक चिंताओं को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने पुष्टि की कि भारतीय न्यायशास्त्र के अंतर्गत लिव-इन रिलेशनशिप अवैध नहीं हैं।
- एस. खुशबू बनाम कन्नियाम्मल एवं अन्य (2010): न्यायालय ने कहा कि सहजीवन को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिससे लिव-इन रिलेशनशिप की विधिक स्थिति की पुष्टि होती है।
- इंद्रा शर्मा बनाम वी. के. वी. शर्मा (2013): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बना लिव-इन रिलेशनशिप भारतीय विधि के अधीन अपराध नहीं है।
- अभिजीत भीकासेठ औटी बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2009): न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की व्याख्या का विस्तार करते हुए कहा कि भरण-पोषण का दावा करने के लिये महिला को विवाहित होने को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, इस प्रकार लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर को भी विधिक सुरक्षा प्रदान की गई है।
- एस. पी. एस. बालासुब्रमण्यम बनाम सुरुत्तयन (1993): न्यायालय ने, जब तक अन्यथा सिद्ध न हो जाए, दीर्घकालिक सहजीवन करने वाले दंपतियों के लिये विवाह की धारणा स्थापित की तथा ऐसे संबंधों से उत्पन्न हुए बच्चों के उत्तराधिकार अधिकारों की पुष्टि की।
- अजय भारद्वाज बनाम ज्योत्सना (2016): न्यायालय ने CrPC की धारा 125 के सुरक्षात्मक दायरे को लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर तक बढ़ा दिया तथा प्रावधान की व्याख्या इस प्रकार के संबंधों पर लागू होने वाले अभाव और बेघर होने से रोकने के उद्देश्य से की।
- ये निर्णय सामूहिक रूप से एक विधिक ढाँचा स्थापित करते हैं, जो लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करते हैं और उनकी रक्षा करते हैं, साथ ही भरण-पोषण, उत्तराधिकार तथा ऐसे संबंधों से उत्पन्न हुए बच्चों की स्थिति जैसे संबंधित मुद्दों पर भी ध्यान देते हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप में निहित अधिकार और दायित्व क्या हैं?
- भरण-पोषण अधिकार:
- न्यायिक व्याख्याओं के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएँ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 और CrPC की धारा 125 के अधीन भरण-पोषण पाने की अधिकारी हैं, बशर्ते कि यह रिश्ता वैवाहिक रिश्ते के समान कुछ मानदण्डों को पूरा करता हो।
- संपत्ति का अधिकार:
- हालाँकि लिव-इन पार्टनर के लिये उत्तराधिकार का कोई स्वत: अधिकार नहीं है, परंतु वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010) मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि लिव-इन पार्टनर को रिश्ते के अस्तित्व के दौरान अर्जित संपत्ति पर अधिकार हो सकता है, यदि उसने उस संपत्ति के अधिग्रहण में योगदान दिया हो।
- बच्चों का अधिकार:
- लिव-इन रिलेशनशिप से उत्पन्न हुए बच्चों की धर्मजत्त्व एवं उत्तराधिकार का अधिकार दिया गया है।
- तुलसा बनाम दुर्गतिया (2008) मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि लिव-इन रिलेशनशिप से उत्पन्न हुए बच्चों को अधर्मज नहीं कहा जा सकता, यदि माता-पिता एक ही घर में काफी समय तक साथ रहे हों।
- घरेलू हिंसा संरक्षण:
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएँ घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अधीन सुरक्षा की अधिकारी हैं, जिसमें साझा घर में रहने का अधिकार, सुरक्षा आदेश और क्षतिपूर्ति शामिल है।
निष्कर्ष:
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की विधिक स्थिति संवैधानिक सिद्धांतों और मौजूदा विधानों की प्रगतिशील व्याख्या के आधार पर न्यायिक घोषणाओं के माध्यम से विकसित हुई है। हालाँकि अब इन रिश्तों को कुछ विधिक सुरक्षा प्राप्त है, खासकर घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत और भरण-पोषण अधिकारों के माध्यम से, परंतु व्यापक विधियों की कमी एक चुनौती का सामना करती है। हाल ही में केरल उच्च न्यायालय का निर्णय, जिसमें लिव-इन पार्टनर को IPC की धारा 498A से बाहर रखा गया है, ऐसे रिश्तों के इर्द-गिर्द चल रही विधिक जटिलताओं को प्रकट करता है। जैसे-जैसे भारतीय समाज विकसित होता जा रहा है, लिव-इन रिलेशनशिप के विभिन्न विधिक आयामों को व्यापक रूप से संबोधित करने के लिये अधिक स्पष्ट वैधानिक मान्यता की आवश्यकता बनी हुई है, जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक मानदंडों के साथ संतुलित किया जा सके।