9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / एडिटोरियल

सांविधानिक विधि

जन विश्वास विधेयक, 2025-26

    «
 13-Apr-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

भारत के नियामक ढाँचे में लंबे समय से दण्डात्मक प्रवृत्ति हावी रही है। दर्जनों केंद्रीय अधिनियमों के अधीनप्रक्रिया में मामूली लोपदस्तावेज़ दाखिल न करना या तकनीकी खामी जैसी छोटी-मोटी त्रुटियों के कारण भी किसी नागरिक या छोटे व्यवसायी को जेल हो सकती है। जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) विधेयक, 2025-26 इस कमी को दूर करने का प्रयास करता है और भारत के नियामक दृष्टिकोण को दण्डात्मक मॉडल से "विश्वास-आधारित शासन" मॉडल में परिवर्तित करता है। यह विधेयक जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 पर आधारित हैजिसने 42 केंद्रीय विधियों के 183 उपबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। 

यह विधेयक क्यों पेश किया जा रहा है? 

  • 2026 के विधेयक में 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 उपबंधों में संशोधन का प्रस्ताव है।  
  • इनमें से 717 उपबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिये निर्धारित किया गया हैजबकि शेष उपबंध जीवनयापन में सुगमता से संबंधित हैं। 
  • इसका मार्गदर्शक सिद्धांतआनुपातिकताहै - राज्य की प्रतिक्रिया की गंभीरता का उस आचरण की गंभीरता के साथ एक तर्कसंगत संबंध होना चाहिये जिसे वह लक्षित करता है। 
  • यह विधेयक तीन संबंधित लक्ष्यों को पूरा करता हैजो सभी विनियमन में आनुपातिकता सुनिश्चित करने पर आधारित हैं: 
    • सबसे पहलेयह उन आचरणों के बीच एक सैद्धांतिक पृथक्करण चाहता है जो आपराधिक दण्ड के योग्य हैं - जैसे कपटजानबूझकर अपराध से बचना और लोक सुरक्षा के लिये खतरा - और प्रक्रियात्मक गैर-अनुपालनजिसमें कोई तुलनीय नैतिक दायित्त्व नहीं है। इन दोनों को एक ही समझना पहले प्रकार के आचरण की गंभीरता को कम आंकना और दूसरे प्रकार के आचरण में फंसे लोगों के साथ अन्याय करना है। 
    • दूसरायह समानता को संबोधित करता है। छोटे उद्यम और MSME (सूक्ष्मलघु और मध्यम उद्यम) अनुपालन जोखिमों के प्रति असमान रूप से संवेदनशील होते हैं  इसलिये नहीं कि वे विधियों का अधिक उल्लंघन करते हैंअपितु इसलिये कि उन पर उल्लंघन का आरोप लगने पर वे इसके परिणामों को सहन करने की क्षमता नहीं रखते हैं। इसका उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना है। 
    • तीसराइसका उद्देश्य संस्थागत अनुतोष प्रदान करना है। भारत के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में 4.8 करोड़ से अधिक लंबित मामले हैं (NJDG, दिसंबर 2025), जिनमें से एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा छोटे-मोटे नियामक मामलों से संबंधित है। ऐसे मामलों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना नरमी नहीं अपितु न्यायिक संसाधनों का तर्कसंगत पुनर्वितरण है। 

इस विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? 

  • इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य मामूली प्रक्रियात्मक लोप के लिये आपराधिक दायित्त्व के प्रावधान को हटाना और व्यापार करने और जीवन यापन करने में आसानी को बेहतर बनाना है। 
  • इसकामुख्य तंत्रआपराधिक शास्तियों को नागरिक और प्रशासनिक विकल्पों से प्रतिस्थापित करना है। कारावास संबंधी उपायों को उल्लंघन की गंभीरता के अनुरूप मौद्रिक शास्तियों से प्रतिस्थापित किया जाएगा।  
  • मामूली या पहली बार हुए लोप के मामलों मेंअभियोग के स्थान पर चेतावनी और परामर्श नोटिस जैसी श्रेणीबद्ध प्रतिक्रियाएँ दी जाती हैं। 
  • शमनीय संबंधी उपबंधों का विस्तार किया गया हैजिससे पूर्ण न्यायनिर्णयन के बिना ही मामलों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके। 
  • न्यायनिर्णय अधिकारियों को निर्धारित समयसीमा के भीतर मामलों का निर्णय करने का अधिकार हैऔर निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये अपील तंत्र भी विद्यमान हैं। 
  • शास्तियों के निवारक प्रभाव को बनाए रखने के लिये समय-समय पर उनमें संशोधन किया जाएगाऔर विधेयक प्रवर्तन में विसंगतियों को कम करने के लिये डिजिटलीकरण और प्रक्रियात्मक सरलीकरण पर बल देता है।  

यह विधेयक किस प्रकार कुशल न्याय व्यवस्था को बढ़ावा देता है? 

  • आपराधिक शास्तियों का अंधाधुंध उपयोग - कर कपट करने वाले और प्रक्रियात्मक औपचारिकता में चूक करने वाले व्यवसायी के साथ एक समान व्यवहार करना – विधि के व्यावहारिकता को कमजोर करता है। 
  • वास्तविक आशय या नुकसान से जुड़े आचरण के लिये आपराधिक दायित्त्व को आरक्षित करकेऔर प्रक्रियात्मक व्यतिक्रम को सिविल तंत्र के माध्यम से निर्देशित करकेविधेयक संरचित तरीके से अत्यधिक अपराधीकरण की गुंजाइश को सीमित करता है। 
  • अधिक पूर्वानुमानित नियामक वातावरणस्वैच्छिक अनुपालन कोप्रोत्साहित करता है । जब किसी छोटी से लोप का परिणाम अभियोग की आशंका के बजाय उचित शास्ति होती हैतो प्रोत्साहन संरचना पारदर्शिता की ओर अग्रसर होती है। 
  • इन उपलब्धियों की स्थिरता कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। प्रशासनिक विवेकाधिकार में वृद्धि के साथ-साथ स्पष्ट दिशा-निर्देशसार्थक निगरानी और वास्तविक नियंत्रण के रूप में कार्य करने वाले अपीलीय तंत्र भी होने चाहिये 

इस विधेयक का प्रमुख संस्थानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? 

  • व्यवसायोंविशेषकर लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये:आपराधिक जोखिम में कमी से औपचारिकीकरण के दृष्टिकोण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आ सकता है। अभियोग का भयभले ही अंतर्निहित आचरण साशय न होकर तकनीकी होलंबे समय से पारदर्शिता और औपचारिक अर्थव्यवस्था में भागीदारी के प्रति एक बाधक के रूप में कार्य करता रहा है। 
  • न्यायपालिका के लिये:इसका सबसे तात्कालिक परिणाम सार्थक अनुतोष है। आपराधिक मामलों से नियमित नियामक मामलों को अलग करने से न्यायालयों को वास्तविक सार्वजनिक महत्त्व के मामलों पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता मिलेगी। 
  • नियामक अभिकरणों के लिये:विधेयक से उत्तरदायित्व बढ़ता है। प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया आपराधिक अभियोजन की तुलना में तेज़ और कम संसाधन-गहन होती हैलेकिन इसमें संस्थागत क्षमतास्पष्ट दिशानिर्देश और मनमानी से बचने के लिये निगरानी तंत्र की आवश्यकता होती है। विधेयक में निर्मित अपीलीय संरचनाएं इस जोखिम को स्वीकार करती हैंऔर इसलियेउनकी प्रभावशीलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है। 
  • चिंताएँ और आलोचनाएँ 
  • उचित जवाबदेही संरचनाओं के अभाव में प्रशासनिक अधिकारियों के पास अत्यधिक विवेकाधिकार होने का खतरा है। 
  • कुछ क्षेत्रों में कमजोर अपीलीय सुरक्षा उपायों के कारण विनियमित संस्थाएँ मनमानी शास्ति निर्णयों के शिकार हो सकती हैं। 
  • इस बात की संभावना है कि मौद्रिक शास्ति अपराधीकरण का स्थान ले सकते हैंलेकिन वास्तव में प्रभावित पक्षकारों पर भार कम नहीं होगा – विशेषत: यदि शास्ति की राशि अत्यधिक रूप से अधिक निर्धारित की जाती है। 
  • विभिन्न विधियों में एकसमान मानकों को लेकर स्पष्टता की कमी चिंता का विषय बनी हुई है। 
  • इस विधेयक की सफलता इस बात पर कम निर्भर करेगी कि इसमें क्या कहा गया हैअपितु इस बात पर अधिक निर्भर करेगी कि इसे आगे बढ़ाने का दायित्त्व सौंपे गए संस्थान वास्तव में इसके लिये सक्षम हैं और इसके लिये जवाबदेह ठहराए जाते हैं या नहीं। 

निष्कर्ष 

जन विश्वास विधेयक एक गंभीर और लंबे समय से प्रतीक्षित सुधार है। इसका उद्देश्य भारत की नियामक नीति को अपराधीकरण की प्रवृत्ति से हटाकर एक ऐसी प्रणाली की ओर ले जाना हैजहाँ राज्य की प्रतिक्रिया अपराध की गंभीरता के अनुरूप हो। इसके उद्देश्य - लघु एवं मध्यम उद्यमों के अनुपालन भार को कम करनान्यायिक लंबित मामलों को कम करना और स्वैच्छिक नियामक भागीदारी को प्रोत्साहित करना - उचित हैं। तथापिविधेयक की प्रभावशीलता कार्यान्वयन में ही परखी जाएगी: प्रशासनिक विवेकाधिकार में वृद्धि के साथ-साथ सशक्त निगरानी​​वास्तविक अपीलीय नियंत्रण और स्पष्टएकसमान प्रवर्तन मानक भी आवश्यक हैं। यह सुधार आवश्यक हैलेकिन यह तभी कारगर होगा जब इसे लागू करने वाली संस्थागत व्यवस्था मजबूत हो।