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सांविधानिक विधि
अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत बालक के मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को संरक्षण प्राप्त है
« »14-May-2026
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पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में अपना मानक आधार पाता है, क्योंकि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रत्याभूति में अनिवार्य रूप से सार्थक और बोधगम्य रूप में सूचना प्राप्त करने का अधिकार सम्मिलित है।" न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे, ने पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले में राजस्थान राज्य को राज्य भर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने और उपलब्ध कराने के लिये ठोस कदम उठाने और साथ ही इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग करने की सुविधा प्रदान करने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने निर्णय कि किसी बालक को अपनी पसंद की भाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है और इस जनादेश को लागू करने में राजस्थान राज्य की निरंतर निष्क्रियता संविधान के भाग 3 के अधीन प्रत्याभूत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
पदम मेहता और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ?
- यह याचिका राजस्थान राज्य द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त कदम उठाने में विफलता के कारण दायर की गई थी कि बालकों को राजस्थानी में या कम से कम उनकी पसंद की भाषा में शिक्षा मिले, जो कि मातृभाषा आधारित शिक्षा पर केंद्र सरकार की नीति के अनुरूप है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य ने न तो स्कूलों में राजस्थानी को एक विषय के रूप में शामिल किया है और न ही इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग करने की सुविधा के लिये पर्याप्त उपाय किये हैं, जिससे बच्चे एक सुबोध भाषा में शिक्षा तक सार्थक पहुँच से वंचित रह गए हैं।
- राज्य की निष्क्रियता की जांच करने पर उच्चतम न्यायालय ने जनादेश को लागू करने में विफलता की आलोचना की और इसके निवारण के लिये निदेश जारी किये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 19(1)(क) और मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार पर: न्यायालय ने माना कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित है। वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रत्याभूति में सार्थक और बोधगम्य रूप में सूचना प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है। इस स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य केवल संवाद करने की क्षमता में नहीं, अपितु सूचना को समझने, आत्मसात करने और संसाधित करने की क्षमता में निहित है जिससे सोच-समझकर निर्णय लिये जा सकें।
- शिक्षा में मातृभाषा की भूमिका पर: न्यायालय ने पाया कि शिक्षा, ज्ञान के प्रसार का प्राथमिक माध्यम होने के नाते, यथासंभव उस भाषा में दी जानी चाहिये जिसे बालक सबसे अच्छी तरह समझता हो। मातृभाषा या पसंद की भाषा में शिक्षा देने से शिक्षार्थी की अवधारणात्मक स्पष्टता मजबूत होती है, गहन संज्ञानात्मक जुड़ाव सुनिश्चित होता है और ज्ञान तक सार्थक पहुँच का सांविधानिक वचन पूरा होता है।
- कर्नाटक राज्य बनाम एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ इंग्लिश मीडियम प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स के मामले में, न्यायालय ने इस पूर्व निर्णय का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया था कि अनुच्छेद 19(1)(क) प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम के संबंध में बालक को चुनाव की स्वतंत्रता प्रदान करता है। महत्त्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने दोहराया कि राज्य किसी बालक पर मातृभाषा में शिक्षा थोप नहीं सकता, भले ही यह लाभकारी हो, क्योंकि चुनाव की स्वतंत्रता बालक में निहित है।
- राजस्थान की निष्क्रियता पर: न्यायालय ने पाया कि मातृभाषा आधारित शिक्षा के विवाद्यक पर केंद्र सरकार की नीति स्पष्ट है। न्यायालय ने राजस्थान राज्य की इस बात के लिये आलोचना की कि वह बालक की पसंद की भाषा या कम से कम क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा सुनिश्चित करने के लिये उचित कदम उठाने में विफल रहा है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह की निरंतर निष्क्रियता न केवल सांविधिक और नीतिगत निर्देशों को कमजोर करती है, अपितु संविधान के भाग 3 के अधीन प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी खतरा उत्पन्न करती है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 19(1)(क) में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निहित है ।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार सरकार द्वारा प्रतिशोध, निर्बंधन या दमन के भय के बिना स्वतंत्र रूप से सोचने और बोलने तथा प्रकाशनों और सार्वजनिक चर्चा के माध्यम से दूसरों से जानकारी प्राप्त करने की क्षमता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क):
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में कहा गया है कि सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा।
- इस अनुच्छेद के पीछे का दर्शन संविधान की उद्देशिका में निहित है, जहाँ सभी नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का दृढ़ संकल्प लिया गया है।
- अनुच्छेद 19(1)(क) में निम्नलिखित पहलू शामिल हैं:
- प्रेस की स्वतंत्रता
- वाणिज्यिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- प्रसारण का अधिकार
- सूचना का अधिकार
- आलोचना करने का अधिकार
- राष्ट्रीय सीमाओं से परे अभिव्यक्ति का अधिकार
- न बोलने का अधिकार या मौन रहने का अधिकार
भारत के संविधान (COI) के अनुच्छेद19(1)(क) के आवश्यक तत्त्व:
- यह अधिकार केवल भारत के नागरिक को ही प्राप्त है, विदेशी नागरिकों को नहीं।
- इसमें किसी भी विषय पर अपने विचारों एवं मतों को किसी भी माध्यम, जैसे— मौखिक अभिव्यक्ति, लेखन, मुद्रण, चित्र, चलचित्र, फिल्म आदि के द्वारा अभिव्यक्त करने का अधिकार समाविष्ट है।
- तथापि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और यह सरकार को युक्तियुक्त निर्बंधन अधिरोपित करने के लिये विधि बनाने की अनुमति देता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(2):
- यद्यपि, इस अधिकार का प्रयोग अनुच्छेद 19(2) के अधीन अधिरोपित किये गए कुछ प्रयोजनों के लिये युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है ।
- अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि खंड (1) के उपखंड (क) में कोई बात किसी भी मौजूदा कानून के संचालन को प्रभावित नहीं करेगी, या राज्य को कोई विधि बनाने से नहीं रोकेगी, जहाँ तक ऐसी विधि भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के हित में या न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिये उकसाने के संबंध में उक्त उपखंड द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाता है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क) का महत्त्व:
- सामाजिक हित : बिना किसी बाधा के, और विशेष रूप से दण्ड के भय के बिना, विचारों और राय को व्यक्त करने की स्वतंत्रता किसी विशेष समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- आत्म-विकास : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति के आत्म-विकास और आत्म-पूर्ति के अधिकार का अभिन्न अंग है। निर्बंधन हमारे व्यक्तित्व और उसके विकास में बाधा डालते हैं।
- लोकतांत्रिक मूल्य : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक सरकार का आधार स्तंभ है। यह स्वतंत्रता लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुचारू संचालन के लिये आवश्यक है क्योंकि यह लोगों को सरकार की आलोचना करने की अनुमति देती है। लोकतंत्र में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विवाद्यकों पर स्वतंत्र चर्चा के मार्ग खोलती है।
- बहुलतावाद सुनिश्चित करें : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुलतावाद को प्रतिबिंबित और मजबूत करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विविधता को मान्यता दी जाए और एक विशेष जीवनशैली का पालन करने वालों के आत्मसम्मान को बढ़ावा मिले।