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आपराधिक कानून

डिजिटल गिरफ्तारी: आधुनिक युग का साइबर घोटाला

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 09-Mar-2026

परिचय 

इंटरनेट के शुरुआती दिनों मेंसाइबर अपराधी वेबसाइटों को विकृत करने और हानिरहित शरारतें करने तक ही सीमित थे। आज के समय मेंसाइबर अपराध एक परिष्कृतनिरंतर विकसित हो रहा उद्योग बन गया हैजिसमें कपटकर्त्ता निरंतर नई तकनीकों के अनुकूल ढल रहे हैं। वर्ष 2024 में डिजिटल गिरफ्तारी योजनाओं में भारी वृद्धि देखी गई - ये इतने जटिल ऑपरेशन थे कि वे कुख्यात "जामतारा" घोटाले जैसी बड़े पैमाने पर संगठित कपट के समान थे। 

  • गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के अनुसारअकेले 2024 की पहली तिमाही में डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों के कारण लोगों को लगभग ₹120.30 करोड़ का नुकसान हुआ - यह अलग-थलग घटनाओं को नहीं अपितु एक व्यवस्थित और बढ़ते आपराधिक खतरे को दर्शाता है।       

डिजिटल गिरफ्तारी क्या है?                    

  • डिजिटल गिरफ्तारी एक साइबर अपराध है जिसमें धोखाधड़ी करने वाले (scammers) विधि प्रवर्तन अधिकारियों - जैसे कि भारतीय रिजर्व बैंककेंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों - के रूप में स्वयं को पेश करते हैं और पीड़ित पर मिथ्या आरोप लगाते हैं कि उसने कोई अपराध किया है। 
  • धोखाधड़ी करने वाले पीड़ित को अलग-थलग कर देते हैं और गिरफ्तारी या कारावास जैसे काल्पनिक परिणामों की धमकी का फायदा उठाकर बड़ी रकम की उद्दापित करते हैं या पीड़ित को व्यक्तिगत जानकारी देने के लिये विवश करते हैं। 
  • यह घोटाला सामान्यत: एक फोन कॉल से प्रारंभ होता है - जो पहली नजर में मासूम लगता हैजिसमें पार्सल डिलीवरी का दावा या KYC सत्यापन का अनुरोध सम्मिलित होता है। 
  • जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती हैधोखाधड़ी करने वाले तेजी से आक्रामक हथकंडे अपनाते है और पीड़ित पर मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में शामिल होने का आरोप लगाता है। 
  • फर्जी दस्तावेज़ोंछेड़छाड़ किये गए वीडियो और फर्जी फोन नंबरों की सहायता सेधोखाधड़ी करने वाले वैधता का माहौल बनाकर पीड़ित को भय अथवा दबाव में लाकर उनके निर्देशों के पालन के लिये प्रेरित करते ह।  
  • प्रत्येक नागरिक को यह मूलभूत बात जाननी चाहिएये किभारतीय विधि के अधीन "डिजिटल गिरफ्तारी" की कोई अवधारणा नहीं है। 

ऐसा क्यों होता है? 

  • डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले कई कारकों के संयोजन के कारण सफल होते हैं। स्कैमर भयतात्कालिकता और अधिकारियों का रूप धारण करके मानव मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं जिससे तर्कसंगत सोच को दरकिनार किया जा सके। 
  • कमजोर साइबर सुरक्षा पद्धतियों के कारण व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा में सेंध लगाना और उसका दुरुपयोग करना आसान हो जाता है। 
  • तेजी से विकसित हो रहे उपकरण - डीपफेकवॉयस क्लोनिंग और नंबर स्पूफिंग - स्कैमर्स को खतरनाक हद तक विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। 
  • पता न चलने योग्य डिजिटल भुगतान विधियोंसंगठित डार्क वेब नेटवर्क और सीमा पार संचालन के उदय से इन कपट को और बढ़ावा मिलता है। 
  • अंततःजन जागरूकता की कमी और पीड़ित होने से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण लोग रिपोर्टिंग करने से हिचकते हैंजिससे धोखाधड़ी करने वाले लगभग बिना किसी दण्ड के काम करते रहते हैं। 

धोखाधड़ी करने वालों के सामान्य तौर-तरीके 

डिजिटल गिरफ्तारी से संबंधित साइबर ठगी प्रायः एक सावधानीपूर्वक नियोजित एवं क्रमबद्ध प्रक्रिया का अनुसरण करती हैजिसका उद्देश्य पीड़ित में दहशत उत्पन्न करनाउसे सामाजिक रूप से अलग-थलग करना तथा अंततः उससे धन उद्दापित करना होता है। 

  • प्रारंभिक संपर्क-धोखाधड़ी करने वाले स्वयं को विधि प्रवर्तन या सरकारी अधिकारी (CBI, ED, सीमा शुल्कइंटरपोल, RBI) के रूप में पेश करते हैं और फोन कॉलईमेलव्हाट्सएप संदेश या फर्जी आधिकारिक पत्रों के माध्यम से संपर्क करते हैं। पहला संपर्क सामान्य प्रतीत होता है: पार्सल की सूचना, KYC अपडेट का अनुरोध या कर सत्यापन संबंधी पूछताछ। 
  • दहशत उत्पन्न करना-पीड़ित पर मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग तस्करी जैसे गंभीर अपराधों का मिथ्या आरोप लगाया जाता है और तत्काल गिरफ्तारी की धमकी दी जाती हैजिससे भय की ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जो तर्कसंगत सोच को बाधित करती है। 
  • डिजिटल सत्यापन-विश्वसनीयता बढ़ाने के लियेस्कैमर नकली दस्तावेज़जाली गिरफ्तारी वारण्ट या मनगढ़ंत न्यायालय के आदेश भेजते हैंऔर आधिकारिक दिखने वाली पृष्ठभूमि के सामने पुलिस अधिकारियों के वेश में वीडियो कॉल कर सकते हैं। 
  • अलगाव और दबाव-पीड़ितों को परिवारदोस्तों या अधिवक्ताओं को सूचित न करने का निदेश दिया जाता हैऔर उन्हें घंटों या दिनों तक निरंतर वीडियो कॉल पर रखा जा सकता है - जो एक प्रकार की "डिजिटल अभिरक्षा" है। 
  • भुगतान की मांग-पीड़ितों को UPI, क्रिप्टोकरेंसीप्रीपेड गिफ्ट कार्ड या बैंकिंग क्रेडेंशियल्स की रीयल-टाइम निगरानी के माध्यम से "प्रतिभूति जमा" या "जुर्माना" का भुगतान करने के लिये विवश किया जाता है।  
  • अदृश्य हो जाना तथा धन शोधन -एक बार धन अंतरित हो जाने के बादधोखाधड़ी करने वाले अदृश्य हो जाते हैं। धनराशि को छोटी-छोटी राशियों में विभाजित किया जाता हैकई बिचौलियों के खातों के माध्यम से स्थानांतरित किया जाता हैऔर विदेशों में भेज दिया जाता है - जिससे वसूली लगभग असंभव हो जाती है।  

भारत का साइबर अपराध और डिजिटल गिरफ्तारी के विरुद्ध संघर्ष 

  • भारत सरकार ने कई मोर्चों पर प्रतिक्रिया दी है। I4C ने डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों से जुड़े 1,700 से अधिक स्काइप आई.डी. और 59,000 व्हाट्सएप खातों को ब्लॉक कर दिया हैजबकि राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) त्वरित सार्वजनिक रिपोर्टिंग को सक्षम बनाता है। 
  • सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग सिस्टम ने 9.94 लाख परिवादों के माध्यम से ₹3,431 करोड़ से अधिक की बचत की है। 
  • फर्जी अंतरराष्ट्रीय कॉलों का मुकाबला करने के लिये 6,69,000 से अधिक सिम कार्ड और 1,32,000 IMEIs को ब्लॉक कर दिया गया है। 
  • इन उपायों के पूरक के रूप में साइबर फोरेंसिक प्रयोगशालाएंसाइट्रेन प्लेटफॉर्म के माध्यम से 98,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों का प्रशिक्षण और SMS, सोशल मीडिया और साइबर दोस्त और संचार साथी (Cyber Dost and SancharSathi) प्लेटफॉर्म के माध्यम से जन जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। 

डिजिटल गिरफ्तारी से निपटने के लिये विधिक ढाँचे 

वर्तमान में, "डिजिटल गिरफ्तारी" को भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) के अधीन विशेष रूप से मान्यता प्राप्त अपराध नहीं हैतथापिऐसे कृत्य किये जाने पर दोनों विधियों के विभिन्न उपबंध लागू होते हैं। 

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 204 - लोक सेवक का प्रतिरूपण।  इस अपराध में छह मास से तीन वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है। यह उपबंध CBI, ED या पुलिस अधिकारियों के रूप में धोखाधड़ी करने वाले के मूल कृत्य को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करता है। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 – छल। इसमें सात वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है। इसमें पीड़ितों को प्रवंचना से धन अंतरित करने के लिये कपट सम्मिलित है। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 336/336(3) – कूटरचनासात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दण्डनीय। फर्जी गिरफ्तारी वारण्टन्यायालय आदेश और आधिकारिक दस्तावेज़ों के निर्माण पर लागू।  
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 308 – उद्दापनइसमें दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है। यह प्रत्यक्षत: लागू होने वाला उपबंध हैजो धमकियों के माध्यम से उद्दापन की बात करता है। 
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ग - पहचान की चोरी।इसमें तीन वर्ष तक का कारावास और लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। यह धारा तब लागू होती है जब धोखाधड़ी करने वाले चोरी किये गए व्यक्तिगत डेटा का प्रयोग करके पीड़ितों या संस्थानों का रूप धारण करते हैं। 
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66घ - कंप्यूटर संसाधनों का प्रयोग करके प्रतिरूपण द्वारा छलइसमें तीन वर्ष तक का कारावास और लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। यह धारा डिजिटल माध्यमों से सरकारी अभिकरणों का प्रतिरूपण करने पर प्रत्यक्षत लागू होती है। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और वैध गिरफ्तारी प्रक्रिया।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 63 के अधीन समन की इलेक्ट्रॉनिक तामील की अनुमति तभी देता है जब वह एन्क्रिप्टेड (encrypted), न्यायालय द्वारा मुहरबंद और डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित हो। किसी भी प्रकार का गिरफ्तारी नोटिस व्हाट्सएप या अनौपचारिक डिजिटल चैनलों के माध्यम से नहीं भेजा जा सकता है - इस स्थिति की पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने भी की है। 

निष्कर्ष 

भारत में फर्जी डिजिटल गिरफ्तारियों का बढ़ता प्रचलन एक महत्त्वपूर्ण और निरंतर विकसित हो रही चुनौती है। तथापि भारतीय न्याय संहितासूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन विद्यमान विधिक ढाँचे सार्थक उपाय प्रदान करते हैंलेकिन वे इन घोटालों की जटिल और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति से निपटने के लिये पूरी तरह से सक्षम नहीं हैं। इस बढ़ते खतरे से प्रभावी ढंग से निपटने के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण - जिसमें बेहतर विधिकअंतरराष्ट्रीय सहयोगविधि प्रवर्तन क्षमता निर्माण और व्यापक जन जागरूकता सम्मिलित है - आवश्यक है। 

नागरिकोंविधिक पेशेवरों और नीति निर्माताओं के रूप मेंहम सभी की एक भूमिका है। जागरूकता और शिक्षा ही बचाव की पहली पंक्ति है। साथ मिलकरहम पीड़ितों को सशक्त बना सकते हैंधोखाधड़ी करने वाले का पर्दाफाश कर सकते हैं और एक ऐसी डिजिटल दुनिया का निर्माण कर सकते हैं जहाँ साइबर कपट का बोलबाला न रहे।