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पारिवारिक कानून

पूर्व लिव-इन रिलेशनशिप का अप्रकटीकरण कपट है

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 29-Jan-2026

प्रियंका साही बनाम सिद्धार्थ राव 

"पूर्व लिव-इन संबंध का दमन हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(ग) के अधीन विवाह अकृत करने के लिये एक योग्य कपट है।" 

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी 

स्रोत: झारखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

प्रियंका साही बनाम सिद्धार्थ राव (2026)के मामले में न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की खंडपीठ नेनिर्णय दिया कि विवाह से पहले लिव-इन रिलेशनशिप का प्रकट न करना हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(ग) के अधीन एक भौतिक तथ्य के संबंध में कपट हैजिससे विवाह शून्यकरणीय हो जाता है और अकृतता की डिक्री द्वारा अकृत किये जाने के योग्य है। 

प्रियंका साही बनाम सिद्धार्थ राव (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • दोनों पक्षकारों का विवाह दिसंबर 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अनुष्ठित हुआ। 
  • पत्नी (अपीलकर्त्ता) और पति (प्रत्यर्थी) ने गढ़वा कुटुंब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश द्वारा पारित एक सामान्य निर्णय के विरुद्ध परस्पर अपीलें दायर कीं। 
  • पत्नी ने तय की गई राशि की गलत गणना के आधार पर स्थायी निर्वाह वृत्ति बढ़ाने की मांग की। 
  • पति ने एकपक्षीय निरस्तीकरण के निर्णय को चुनौती दीजिसमें उसने समन की उचित तामील न होने का आरोप लगाया और दावा किया कि विवाह अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका है। 
  • पत्नी के अपने ससुराल जाने के बादउसेएक महिला से पति की 'प्रेमिकाके रूप में मिलवाया गया। 
  • पत्नी को पता चला किविवाह से पहले उसकेपति का उस महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप थायह तथ्य कथित तौर पर उससे और उसके परिवार से छिपाया गया था। 
  • पत्नी ने दावा किया कि 15,00,000 रुपए के अतिरिक्त दहेज की मांग के बाद उसे शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। 
  • उसने आरोप लगाया कि उसका पति शराब का आदी था और अंततः मार्च 2016 में उसे उसके ससुराल से बेदखल कर दिया गया और उसके स्त्रीधन (महिलाओं की संपत्ति) से वंचित कर दिया गया। 
  • पत्नी ने तर्क दिया कि उसकी सहमति कपट/तथ्यों को छिपाकर प्राप्त की गई थीक्योंकि पति को अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया था। 
  • पति ने तर्क दिया कि व्यभिचार और नशीली दवाओं की लत के आरोप उसके विरुद्ध क्रूरता के समान हैं। 
  • पति ने आगे तर्क दिया कि अनेक प्रकार के मुकदमे और सुलह न हो पाने वाले मतभेद यह संकेत देते हैं कि विवाह एक "बेकार" स्थिति में है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विधि में 'कपटका एक अलग दर्जा है औरइसका निर्वचन संविदा अधिनियम, 1872 के अधीन कपट के समान नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने कहा: "उक्त अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत परिकल्पित कपट का निर्वचन संविदा अधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत दी गई परिभाषा के अनुरूप नहीं किया जाना चाहिये। हिंदू विवाह अधिनियम और संविदा अधिनियम दोनों एक समान नहीं हैं... संविदा अधिनियम के अंतर्गत दी गई कपट की परिभाषा को विवाह जैसे पवित्र संस्कार पर पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सकता।" 
  • पीठ ने माना किपूर्व लिव-इन संबंध का दमन/अप्रकटीकरण धारा 12(1)(ग) के अधीन विवाह अकृत करने के लिये एक योग्य कपट है।  
  • न्यायालय ने टिप्पणी की: "चूँकि प्रत्यर्थी/पति के किसी अन्य महिला के साथ पूर्व लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति अपीलकर्त्ता पत्नी को नहीं बताई गई हैइसलिये यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि याचिकाकर्त्ता/अपीलकर्त्ता/पत्नी और उसके संरक्षक की सहमति प्रत्यर्थी/पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(ग) के अधीन कपट द्वारा प्राप्त की गई थी।" 
  • धारा 25 के अधीन स्थायी निर्वाह भत्ता के विवाद्यक परन्यायालय ने पाया कि पति हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में प्रबंधक (इंस्ट्रूमेंटेशन) के रूप में कार्यरत है और लगभग ₹1,56,000 प्रति माह कमाता हैऔर उसकी संपत्ति पर भी विचार किया। 
  • न्यायालय ने अभिलिखित किया कि पत्नी के पास LL.B. की डिग्री है और उसने दावा किया है कि वह वर्तमान में बेरोजगार है। 
  • न्यायालय ने एकमुश्त समझौते के रूप में स्थायी निर्वाह भत्ता बढ़ाकर ₹50,00,000 करना उचित समझा। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12 क्या है? 

परिचय:  

  • हिंदू विवाह अधिनियम कीधारा 12में शून्यकरणीय विवाह के लिये उपबंध इस प्रकार है: 
    • शून्यकरणीय विवाह तब तक वैध विवाह माना जाता है जब तक कि उसे अकृत न कर दिया जाएऔर ऐसा तभी किया जा सकता है जब विवाह के पक्षकारों में से कोई एक इसके लिये याचिका दायर करे। 
    • तथापियदि दोनों पक्षकारों में से कोई भी विवाह को अकृत करने के लिये याचिका दायर नहीं करता हैतो विवाह वैध बना रहेगा। 

आधार: 

  • यदि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा के खण्ड (ii) का अनुपालन नहीं किया जाता हैतोविवाह शून्यकरणीय हो जाता है।  
    • धारा के अनुसार - (ii) विवाह के समयन तो पक्षकार — 
    • (क) चित्त-विकृति के परिणामस्वरुप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ है; 
    • (ख) विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस प्रकार के या इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित न रहा हो कि विवाह और संतानोत्पत्ति के लिये अयोग्य हैया 
    • (ग) उसे उन्मत्तता का बार-बार दौरा पड़ता हो 
  • धारा 12 मेंआगे निम्नलिखित आधारों का उल्लेख किया गया है जिनके आधार पर विवाह को शून्यकरणीय घोषित किया जा सकता है: 
    • यदि प्रत्यर्थी की नपुंसकता के कारणविवाहसंपन्न नहीं हो पाया है। 
    • यदि विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भीसम्मति देने में असमर्थहो या उन्मत्तता के बार-बार दौरे से ग्रस्त हो। 
    • यदि याचिकाकर्त्ता की सम्मति या याचिकाकर्त्ता के संरक्षक की सम्मतिबलपूर्वक या कपट से प्राप्त की गई हो। 
    • यदि प्रत्यर्थीविवाहसे पहले याचिकाकर्त्ता के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से गर्भवती थी । 

प्रभाव: 

  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 के अनुसारपक्षकार पति-पत्नी का दर्जा रखते हैं और उनकी संतान को धर्मज माना जाता है। पति-पत्नी के अन्य सभी अधिकार और दायित्त्व बरकरार रहते हैं।  

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप 

  • लिव-इन रिलेशनशिप से तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था से है जहाँ दो अविवाहित व्यक्ति औपचारिक विवाह किये बिना एक साथ रहते हैं और घरेलू जीवन साझा करते हैं। 
  • तथापि भारत में ऐसे संबंध अवैध नहीं हैं और संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार द्वारा संरक्षित हैंफिर भी ऐसे संबंधों में व्यापक सांविधिक विनियमन का अभाव है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के भाग के रूप में मान्यता दी हैऔर घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 धारा 2(च) के माध्यम से "विवाह की प्रकृति के संबंधों" में महिलाओं को विधिक सुरक्षा प्रदान करता है। 
  • इंद्रा शर्मा बनाम वीकेवी शर्मा (2013)जैसे प्रमुख न्यायिक निर्णयों नेऐसे संबंधों को मान्यता देने के लिये मानदंड स्थापित किये हैंजिनमें सहवास की अवधिसाझा घरसंसाधनों का बंटवारा और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का आशय सम्मिलित है। 
  • लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएँ हिंसा से सुरक्षानिवास का अधिकार और भरण-पोषण का दावा कर सकती हैंजबकि ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को पूर्ण उत्तराधिकार अधिकारों के साथ वैध माना जाता है। 
  • तथापिलिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स को स्वतः संपत्ति के अधिकारोंउत्तराधिकार के दावों और सामाजिक स्वीकृति के संबंध में सीमाओं का सामना करना पड़ता हैजिसमें अधिकांश सुरक्षाएँ लिंग-विशिष्ट होती हैं और महिलाओं के पक्ष में होती हैं।