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सांविधानिक विधि

लोकहित में सरकार उद्योगों को प्रदान की गई कर रियायतों को निरस्त कर सकती है

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 31-Mar-2026

महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं अन्य 

"रियायत प्राप्त करने वाले व्यक्ति को रियायत प्रदान करने वाली सरकार के विरुद्ध कोई विधिक रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं हैसिवाय रियायत की अवधि के दौरान उसके लाभों का आनंद लेने के अधिकार के। यह आनंद लेने का अधिकार अपरिहार्य हैइस अर्थ में कि इसे उसी शक्ति के प्रयोग से छीना जा सकता है जिसके अधीन छूट प्रदान की गई थी।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ नेस्टेट ऑफ महाराष्ट्र एंड अदर्स बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड एंड अदर्स (2026)के मामले में निर्णय दिया कि सरकार द्वारा दी गई कर रियायतें प्राप्तकर्ता को अनिश्चित काल तक उन पर दावा करने का कोई अविभाज्य अधिकार नहीं देती हैंऔर सरकार लोकहित में ऐसी रियायतें वापस ले सकती है। 

  • न्यायालय ने कैप्टिव बिजली उत्पादकों के विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार की अपील को मंजूर करते हुएसरकार के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें कैप्टिव बिजली उत्पादन के लिये उद्योगों को उपलब्ध कर लाभ वापस ले लिया गया था – अर्थात्ग्रिड आपूर्ति पर निर्भर किये बिनाउद्योगों द्वारा अपने स्वयं के उपयोग के लिये उत्पादित बिजली। 

महाराष्ट्र राज्य बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद महाराष्ट्र राज्य द्वारा 1994 से बॉम्बे विद्युत शुल्क अधिनियम, 1958 की धारा 5क के अधीन उद्योगों द्वारा कैप्टिव विद्युत उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिये दी गई विद्युत शुल्क छूट से उत्पन्न हुआ। 
  • 2000-2001 मेंराज्य ने वित्तीय बाधाओं और लोक राजस्व बढ़ाने की आवश्यकता का हवाला देते हुए इन छूटों को आंशिक रूप से वापस ले लिया। उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को मनमाना और विभेदकारी बताते हुए रद्द कर दियाजिसके बाद राज्य ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की छूटें सांविधिक रियायतें हैं - संविदात्मक आश्वासन नहीं - और इसलियेसरकार द्वारा इन्हें संशोधित या वापस लिया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने वचनबद्धता के सिद्धांत पर उद्योगों की निर्भरता को खारिज कर दियायह देखते हुए कि ऐसी योजनाओं के लाभार्थी इस बात से अवगत हैं कि विधि के अधीन दी गई छूटें लोकहित में स्वाभाविक रूप से निरस्त की जा सकती हैं। 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि चूँकि छूट को वापस लेने और संशोधित करने का निर्णय लोकहित में लिया गया थाइसलिये वैध अपेक्षा और वचनबद्धता के सिद्धांत इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होते हैं। 
  • वापसी के तरीके के प्रश्न परन्यायालय ने माना कि यद्यपिराज्य के पास किसी सांविधिक प्रावधान के अधीन दी गई रियायत को वापस लेने या संशोधित करने की शक्ति हैलेकिनऐसी शक्ति का प्रयोग करने का तरीका भी तर्कसंगतता और निष्पक्षता की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिये 
  • जिन व्यक्तियों ने रियायत के आधार पर अपनी वाणिज्यिक या औद्योगिक क्रियाकलापों की संरचना की हैउन्हें अचानक नीतिगत उलटफेर का शिकार नहीं बनाया जाना चाहियेजिससे उन्हें बदले हुए नियामक ढाँचे के अनुकूल होने के लिये उचित समय न मिले। 
  • तदनुसारन्यायालय ने अधिनियम की धारा 5क के अधीन दी गई छूट को वापस लेने या संशोधित करने के राज्य सरकार के अधिकार को बरकरार रखा और यह माना कि दिनांक 01.04.2000 और 04.04.2001 की अधिसूचनाएँ संबंधित तिथियों से एक वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद ही प्रभावी होंगी। अपील मंजूर कर ली गई। 

कर छूट क्या होती है? 

कर छूट: 

सरकार द्वारा किसी विशेष समूह या संगठन के प्रकार द्वारा देय कर की राशि में की गई कमी या कर प्रणाली में किया गया ऐसा परिवर्तन जिससे उन लोगों को लाभ हो। 

भारत में कर प्रणाली: 

करों के बारे में: 

  • कर अनिवार्य वित्तीय शुल्क या भार होते हैं जो सरकार द्वारा लोक सेवाओं और सरकारी कार्यों के वित्तपोषण के लिये व्यक्तियोंव्यवसायों या संपत्ति पर लगाए जाते हैं। 
  • करदाता और लोक प्राधिकरण के बीच कोई लेन-देन नहीं होता है। 
  • भारत की कर प्रणाली में प्रत्यक्ष करअप्रत्यक्ष कर और अन्य करों का मिश्रण शामिल है। 

करों के प्रकार: 

  • प्रत्यक्ष कर : ये व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा सरकार को संदाय किये जाते हैं और इन्हें दूसरों को अंतरित नहीं किया जा सकता है। 
  • अप्रत्यक्ष कर : ये वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए जाते हैंविक्रय के समय बिचौलियों द्वारा उपभोक्ताओं से एकत्र किये जाते हैं और सरकार को भेजे जाते हैं। 
  • अन्य कर : ये कर विशिष्ट उद्देश्यों के लिये लगाए जाते हैंप्राय: बुनियादी ढाँचे या कल्याणकारी कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिये