आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

अंतरिम आदेश और उच्च न्यायालय की समयसीमा

    «
 21-Jan-2026

गिरिराज एवं अन्य बनाम मो. अमीर एवं अन्य 

"उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226(3) का अनुपालन करना होगाजो अंतरिम आदेशों को रद्द करने के लिये आवेदनों का निपटारा दो सप्ताह के भीतर अनिवार्य करता है।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गिरिराज और अन्य बनाम मोहम्मद अमीर और अन्य (2025)के मामले में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अंतरिम आदेश को रद्द करने के लिये लंबित आवेदन का निपटारा करने का निदेश दियाजिसमें भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 226(3) के अनुपालन पर बल दिया गया। 

गिरिराज एवं अन्य बनाम मोहम्मद आमिर एवं अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक रिट याचिका पर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश पारित किया था। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने इस अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की। 
  • अंतरिम आदेश को रद्द करने के लिये जनवरी 2025 में उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया था। 
  • समय बीतने के बावजूद, 16 जनवरी, 2026 तक आवेदन का कोई निपटारा नहीं हुआ था। 
  • इस मामले की सुनवाई 19 जनवरी, 2026 को उच्च न्यायालय में सूचीबद्ध की गई थी। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने अंतरिम आदेश के जारी रहने के विरुद्ध अनुतोष पाने के लिये उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने में हुए विलंब को क्षमा कर दिया। 
  • न्यायालय ने दोनों पक्षकारों की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं। 
  • पीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(3) पर प्रकाश डालाजिसमें अंतरिम आदेशों को रद्द करने के लिये आवेदनों के निपटान के संबंध में एक विशिष्ट जनादेश सम्मिलित है। 
  • न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226(3) के अनुसारउच्च न्यायालय को ऐसे आवेदन दाखिल करने की तिथि से दो सप्ताह की अवधि के भीतर निपटाना आवश्यक है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि इस सांविधानिक उपबंध के होते हुए भीयह आवेदन जनवरी 2025 से बिना किसी निपटारे के लंबित है। 
  • इस बात पर ध्यान देते हुए कि मामला पहले ही 19 जनवरी, 2026 को उच्च न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध थाउच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय से आवेदन पर विचार करने और उसके गुण-दोष के आधार पर उसका निपटारा करने का अनुरोध किया। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किये गए प्रतिद्वंद्वी तर्कों की खूबियों पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। 
  • उच्च न्यायालय को जारी किये  गए निदेशों के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका का निपटारा कर दिया। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित सभी आवेदनों का भी तदनुसार निपटारा कर दिया गया। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 226 संविधान के भाग के अंतर्गत निहित हैजो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 226(1) मेंकहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजन के लिये किसी व्यक्ति या किसी सरकार को बंदी प्रत्यक्षीकरणपरमादेशप्रतिषेधअधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण याचिका सहित आदेश या रिट जारी करने की शक्ति होगी। 
  • अनुच्छेद 226(2)में कहा गया है कि उच्च न्यायालय को किसी भी व्यक्तिसरकार या प्राधिकारी को रिट या आदेश जारी करने का अधिकार है। 
    • इसके अधिकारिता के भीतर स्थित या 
    • यदि वाद-हेतुक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियाँ पूर्णतः या भागत: उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होती हैंतो वह उसके स्थानीय अधिकारिता से बाहर हो जाती है। 
  • अनुच्छेद 226(3)में कहा गया है कि जब किसी पक्षकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा व्यादेशस्थगन या अन्य माध्यमों से अंतरिम आदेश पारित किया जाता हैतो वह पक्षकार न्यायालय में ऐसे आदेश को रद्द करने के लिये आवेदन कर सकता है और न्यायालय द्वारा ऐसे आवेदन का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 226(4)कहता है कि इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को दी गई शक्ति अनुच्छेद 32 के खण्ड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को दी गई शक्ति को कम नहीं करेगी। 
  • यह अनुच्छेद सरकार सहित किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जा सकता है। 
  • यह मात्र एक सांविधानिक अधिकार हैमौलिक अधिकार नहींऔर आपातकाल के दौरान भी इसे निलंबित नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के मामले में अनिवार्य प्रकृति का है और जब इसे "किसी अन्य प्रयोजन" के लिये जारी किया जाता है तो विवेकाधीन प्रकृति का होता है। 
  • यह न केवल मौलिक अधिकारों को अपितु अन्य विधिक अधिकारों को भी लागू करता है। 

अनुच्छेद 226 के अधीन उपलब्ध रिट याचिकाएँ: 

  • बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका (Writ of Habeas Corpus) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है 'शरीर के साथ प्रस्तुत करना'। 
    • यह सबसे अधिक प्रयोग किये जाने वाली याचिका है। 
    • जब किसी व्यक्ति को सरकार द्वारा सदोषपूर्ण निरुद्ध किया जाता हैतब वह व्यक्ति स्वयं या उसके परिवारजन/मित्र उसके मुक्त किये जाने हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट दायर कर सकते हैं।  
  • परमादेश याचिका (Writ of Mandamus) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अनुवाद 'हम आदेश देते हैंहोता है। 
    • परमादेश एक न्यायिक आदेश है जो सभी लोक प्राधिकारियों को उनके लोक कर्त्तव्य के निर्वहन हेतु जारी किया जाता है 
    • इसका उपयोग सांविधानिकसांविधिकअसांविधिकविश्वविद्यालयोंन्यायालयों और अन्य निकायों द्वारा लोक कर्त्तव्यों के निष्पादन के लिये किया जाता है। 
    • इस याचिका का प्रयोग करने की एकमात्र शर्त यह है कि लोक कर्त्तव्य होना चाहिये।  
  • उत्प्रेषण याचिका (Writ of Certiorari) : 
    • यह एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है 'सूचित किया जाना'। 
    • यह रिट उच्चतर न्यायालय द्वारा निम्नतर न्यायालय या अधिकरण को जारी की जाती है । 
    • जब कोई अधीनस्थ न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता हैतब यह रिट जारी की जाती है । 
    • यदि उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश में कोई त्रुटि मिलती हैतो वह उसे निरस्त (quash) कर सकता है। 
  • प्रतिषेध याचिका (Writ of Prohibition) : 
    • इसका सीधा सा अर्थ है 'रोकना'। 
    • यह रिट अधीनस्थ न्यायालयों (अर्थात् अधीनस्थ न्यायालयोंअधिकरणोंअर्ध-न्यायिक निकायों) के विरुद्ध उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाती है। 
  • अधिकार-पृच्छा याचिका (Writ of Quo Warranto) : 
    • अधिकार-पृच्छा शब्द का अर्थ है 'किस अधिकार से'। 
    • यह किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध उस अधिकार के अधीन जारी की जाती है जिसके अधीन वह ऐसे पद पर आसीन है जिस पर उसे कोई अधिकार नहीं है। 
    • इस रिट के माध्यम से न्यायालय लोक अधिकारियों की नियुक्ति को नियंत्रित कर सकता है और किसी नागरिक को उस लोक पद से वंचित होने से बचा सकता है जिसका वह हकदार हो सकता है। 

विधिक मामले: 

  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ (1984) केमामले मेंउच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि अनुच्छेद 226 को विधिक अधिकारों की रक्षा के लिये भी जारी किया जा सकता है। 
  • कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के मामलेमें, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोक प्राधिकारियों द्वारा लोक दायित्त्वों को लागू करने के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन रिट भी जारी की जा सकती है।