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आपराधिक कानून

स्वेच्छया से घर छोड़ने वाले अवयस्क के साथ मात्र जाने से व्यपहरण का अपराध सिद्ध नहीं होता

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 07-May-2026

रवि दास गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य 

"मात्र निष्क्रिय सहमति या मौन स्वीकृति — अर्थात् किसी अवयस्क को उसकी स्वयं की इच्छा से साथ जाने देना — को न्यायालयों द्वारा निरंतर यह माना गया है कि वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के अर्थ में ‘ले जाना’ नहीं है।" 

न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल 

स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की एकल पीठजिसमें न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल शामिल थेनेरवि दास गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले मेंद्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध दायर दाण्डिक अपील को मंजूर कर लियाजिसमें अपीलकर्त्ता कोधारा 363 भारतीय दण्ड संहिता (137(2) भारतीय न्याय संहिता) केअधीन दोषी ठहराया गया था और उसे कथित तौर पर एक अवयस्क महिला को उसकी विधिपूर्ण संरक्षकता से व्यपहरण करने के आरोप में तीन वर्ष के कठोर कारावास के साथ ₹1,000 का जुर्माना लगाया गया था। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया किभारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(1)() के अंतर्गत "ले जाना" शब्द के लिये अभियुक्त द्वारा कुछ सक्रिय और सकारात्मक आचरण की आवश्यकता होती है जिसके परिणामस्वरूप अवयस्क को संरक्षक की अभिरक्षा से हटा दिया जाता है। चूँकि पीड़िता स्वेच्छया से अपना घर छोड़कर अपनी मर्जी से अपीलकर्त्ता के साथ गई थीइसलिये "ले जाने" या "बहकाने" का आवश्यक तत्त्व सिद्ध नहीं हुआ और दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता। 

रवि दास गुप्ता बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह घटना 15 मार्च, 2013 को घटीजब पीड़िता कथित तौर पर सुबह-सुबह अपने घर से निकली और अपीलकर्त्ता के साथ कई स्थानों की यात्रा की। 
  • अपीलकर्त्ता पर अवयस्क लड़की को उसकी विधिपूर्ण संरक्षकता से व्यपहरण का विचारण चलाया गया था। 
  • विचारण के दौरानपीड़िता ने स्वयं परिसाक्ष्य दिया कि उसने स्वेच्छया से अपना घर छोड़ा थाअपनी माता को सूचित किया था और स्वेच्छया से अपीलकर्त्ता के साथ गई थी। 
  • उन्होंने विशेष रूप से कहा कि अपीलकर्त्ता ने किसी भी प्रकार के बलप्रपीड़न या उत्प्रेरणा का प्रयोग नहीं किया थाऔर न ही कोई सदोष या लैंगिक दुराचार हुआ था।  
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को धारा 366 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अधिक गंभीर आरोप से दोषमुक्त कर दियालेकिन धारा 363 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषी ठहरायाइस आधार पर कि चूँकि पीड़िता अवयस्क थीइसलिये उसकी सम्मति विधिक रूप से अप्रासंगिक थीऔर इसलिये अपराध बनता है। 
  • अपीलकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष इस दोषसिद्धि को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि विचारण न्यायालय ने अपराध के आवश्यक तत्त्वों के मूल्यांकन में त्रुटी की थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के तत्त्वन्यायालय ने विधिपूर्ण संरक्षकता से व्यपहरण के चार आवश्यक तत्त्वों को इस प्रकार गिनाया: (i) जिस व्यक्ति को ले जाया गया या बहकाया गया वह अवयस्क होना चाहिये - महिला के मामले में 18 वर्ष से कम आयु का; (ii) अभियुक्त अवयस्क को लेकर गया या बहकाया होना चाहिये; (iii) ले जाना या बहकाना विधिपूर्ण संरक्षकता से बाहर होना चाहियेऔर (iv) ऐसा ले जाना या बहकाना विधिपूर्ण संरक्षकता की सम्मति के बिना होना चाहिये।   
  • "ले जाना" के अर्थ पर:न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के अंतर्गत "ले जाना" शब्द का अर्थ अभियुक्त द्वारा किसी सक्रिय और सकारात्मक आचरण से है — एक स्वैच्छिक और जानबूझकर किया गया कार्य — जिसके परिणामस्वरूप अवयस्क को संरक्षता की अभिरक्षा से हटा दिया जाता है। मात्र निष्क्रिय सहमति या मौन स्वीकृतिअर्थात् किसी अवयस्क को अपनी इच्छा से किसी के साथ जाने देनाभारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के अंतर्गत "ले जाना" नहीं माना जाता है। 
  • अवयस्क की सम्मति का महत्त्वहीन होना:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार अवयस्क की सम्मति विधिक रूप से अप्रासंगिक हैफिर भी अभियुक्त द्वारा अवयस्क को "ले जाना" या "बहकाना" एक स्वतंत्र और आवश्यक तत्त्व है जिसे अभियोजन पक्ष द्वारा संदेह से परे साबित किया जाना चाहिये। अवयस्क की सम्मति का महत्त्वहीन होना "ले जाने" या "बहकाने" के अप्रमाणित तत्त्व की कमी को पूरा करने के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
  • विचारण न्यायालय की त्रुटी पर:न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय ने दो अलग-अलग और स्वतंत्र विधिक प्रस्तावों को आपस में मिलाकर त्रुटी की है — अवयस्क की सम्मति का महत्त्वहीन होना और "ले जाने" या "बहकाने" के कृत्य को साबित करने की आवश्यकता। भले ही साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो कि अभियुक्त ने न तो अवयस्क को लिया और न ही बहकायाऔर अवयस्क स्वयं संरक्षक की अभिरक्षा से चली गईफिर भी अवयस्क की आयु चाहे जो भी होधारा 361 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अपराध नहीं बनता। तदनुसारधारा 363 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि को अभिलेख पर विद्यमान साक्ष्यों के आधार पर अस्थिर मानते हुए अपास्त कर दिया गया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 137 क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 137— व्यपहरण 

परिभाषा एवं प्रकार: 

  • व्यपहरण दो प्रकार का होता है: (i) भारत में से व्यपहरणऔर (ii) विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण 

भारत में से व्यपहरण: 

  • किसी भी व्यक्ति को उसकी सम्मति के बिनाया उसकी ओर से सम्मति देने के लिये वैध रूप से प्राधिकृत व्यक्ति की सम्मति के बिनाभारत की सीमाओं से बाहर ले जाना। 

विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण: 

  • 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक या विकृत चित्त व्यक्ति कोउनके विधिपूर्ण संरक्षक की सम्मति के बिनाउनकी देखरेख से बाहर ले जाना या फुसलाना। 
  • स्पष्टीकरण: "विधिपूर्ण संरक्षक" में कोई भी ऐसा व्यक्ति शामिल है जिसे विधिपूर्वक ऐसे बालक या व्यक्ति की देखरेख या अभिरक्षा सौंपी गई हो।  

अपवाद: 

  • यह नियम उस व्यक्ति पर लागू नहीं होता जो सद्भावनापूर्वक स्वयं को 18 वर्ष से कम आयु के अधर्मज बालक का पिता मानता हो। 
  • यह नियम उस व्यक्ति पर लागू नहीं होता जो सद्भावनापूर्वक स्वयं को ऐसे बालक की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार मानता हो। 
  • यदि कोई कृत्य अनैतिक या विधिविरुद्ध उद्देश्य से किया गया हो तो अपवाद लागू नहीं होता है। 

दण्ड: 

  • किसी भी प्रकार की कारावास का दण्डजिसकी अवधि वर्ष तक की हो सकेगीऔर जुर्माने का भी दायी होगा 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत वर्गीकरण: 

  • संज्ञेय  
  • जमानतीय  
  • प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय