9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

सामाजिक सद्भाव को भंग करने वाली धार्मिक प्रथाएँ अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत संरक्षित नहीं हैं

    «
 02-May-2026

असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"परीक्षण किसी क्रियाकलाप की धार्मिक प्रकृति नहींअपितु उसके सार्वजनिक परिणाम हैं। यद्यपि राज्य को निजी पूजा की अनुमति देनी चाहियेवहीं वह लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली क्रियाकलापों को विनियमित करने के लिये भी उतना ही बाध्य हैचाहे वह सार्वजनिक भूमि पर हो या निजी परिसर में। सांविधानिक प्रणाली में अनुच्छेद 25 और 26 के सुचारू संचालन के लिये यह संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।" 

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद शामिल थेनेअसीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें असीन द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दियाजिसमें अधिकारियों को संभल जिले के एक गाँव में भूमि के एक टुकड़े पर नमाज अदा करने के लिये सुरक्षा और अनुमति प्रदान करने का निदेश देने की मांग की गई थी। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी ऐसी धार्मिक प्रथा का आरंभ या विस्तारजो पहले प्रचलित नहीं थी—विशेषकर जहाँ यह विद्यमान सामाजिक संतुलन को बिगाड़ती है—संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत संरक्षित नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य को वास्तविक व्यवधान की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है और जहाँ ऐसी क्रियाकलाप से सार्वजनिक जीवन प्रभावित होने की संभावना होवहाँ वह उचित निवारक उपाय कर सकता है। 

असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने जून 2023 में निष्पादित एक दान विलेख के आधार पर संभल जिले में एक निजी भूमि पर स्वामित्व का दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी अधिकारी उन्हें उक्त भूमि पर नमाज़ अदा करने से रोक रहे हैंजिससे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अधीन उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। तदनुसारउन्होंने उच्च न्यायालय में सुरक्षा और उस स्थान पर नमाज़ अदा करने की अनुमति के लिये याचिका दायर की। 
  • दूसरी ओरराज्य ने यह तर्क दिया कि विचाराधीन भूमि को आबादी भूमि के रूप में दर्ज किया गया था – अर्थात् सार्वजनिक उपयोग के लिये निर्धारित भूमि - और याचिकाकर्त्ता के पास उस पर कोई वैध स्वामित्व अधिकार नहीं था। 
  • राज्य ने आगे कहा कि उक्त स्थान पर परंपरागत रूप से नमाज़ केवल ईद के अवसर पर ही अदा की जाती रही है और इस स्थापित प्रथा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। यद्यपियाचिकाकर्त्ता गाँव के अंदर और बाहर से लोगों को आमंत्रित करके नियमित रूप से बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज़ शुरू करने का प्रयास कर रहा हैजो एक नई और गैर-पारंपरिक धार्मिक प्रथा की शुरुआत के समान है। 
  • राज्य ने तर्क दिया कि धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान किया जाना चाहियेलेकिन स्थापित प्रथाओं से परे किसी भी नई या गैर-पारंपरिक क्रियाकलाप की अनुमति नहीं दी जा सकती हैक्योंकि ऐसा करने से लोक व्यवस्था भंग होगी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि यद्यपि संविधान धर्म का पालन करने के अधिकार की रक्षा करता हैयह अधिकार स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्थानैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। धर्म का पालन करने का अधिकार असीमित नहीं है और इसका प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिये जिससे दूसरों पर कोई प्रभाव न पड़े या लोक जीवन के सामान्य कामकाज में बाधा न आए। 
  • विद्यमान बनाम नई धार्मिक प्रथाओं पर:न्यायालय ने विद्यमान वैध धार्मिक प्रथाओं और नई या विस्तारित प्रथाओं के बीच स्पष्ट अंतर किया। न्यायालय ने माना कि विद्यमान वैध धार्मिक प्रथाएँ और लंबे समय से विनियमित व्यवस्थाएँ या सीमित या विशिष्ट उद्देश्यों के लिये दी गई अनुमतियां अपने आप में वैध हो सकती हैंलेकिन कोई भी नया या एकतरफा दावा केवल धर्म या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता है। 
  • निजी धार्मिक क्रियाकलापों के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि निजी प्रार्थनाएँपारिवारिक उपासनाएँ और अन्य सीमित धार्मिक क्रियाकलाप सामान्यतः अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षित दायरे में आती हैं। यद्यपियह संरक्षण केवल उन क्रियाकलापों तक सीमित है जो वास्तव में निजीकभी-कभार होने वाली और व्यवधान उत्पन्न न करने वाला हों। यह किसी भी निजी परिसर को वास्तविक सार्वजनिक धार्मिक स्थल में परिवर्तित करने पर लागू नहीं होता है। 
  • निवारक राज्यीय कार्रवाई के संबंध में: न्यायालय ने अभिमत व्यक्त किया कि विधि प्राधिकरणों को वास्तविक विघटन के घटित होने की प्रतीक्षा करने के लिये बाध्य नहीं करती। जहाँ कोई क्रियाकलाप लोक-व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना रखती हैवहाँ राज्य अग्रिम रूप से कार्रवाई करने का अधिकार रखता है। न्यायालय ने यह भी बलपूर्वक कहा कि परीक्षण का मानदंड क्रियाकलाप का धार्मिक स्वरूप नहींअपितु उसके सार्वजनिक परिणाम होते हैं 
  • पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत पर:न्यायालय ने अभिमत व्यक्त किया कि यह दृष्टिकोण पंथनिरपेक्षता के सांविधानिक सिद्धांत के अनुरूप हैजो सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार तथा विधि के समान अनुप्रयोग की अपेक्षा करता है। यद्यपि राज्य को निजी उपासना की अनुमति प्रदान करनी होती हैतथापि वह उन क्रियाकलापों को विनियमित करने हेतु समान रूप से बाध्य है जो लोक-व्यवस्था को प्रभावित करती हैंचाहे वे सार्वजनिक भूमि पर संपन्न हों अथवा निजी परिसरों में।  
  • वर्तमान मामले के गुण-दोष पर:न्यायालय ने पाया कि विचाराधीन भूमि सार्वजनिक भूमि के रूप में दर्ज है और याचिकाकर्त्ता का स्वामित्व का दावा केवल अस्पष्ट सीमा विवरणों पर आधारित है। यदि भूमि को निजी भी मान लिया जाएतो भी न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता अनुतोष पाने का हकदार नहीं हैक्योंकि वह किसी विद्यमान धार्मिक प्रथा की रक्षा करने के बजाय एक नई धार्मिक प्रथा को लागू करने का प्रयास कर रहा था। अभिलेखों से पता चलता है कि नमाज़ पहले केवल ईद जैसे विशिष्ट अवसरों पर ही अदा की जाती थीऔर याचिकाकर्त्ता द्वारा इसे नियमित सामूहिक सभाओं तक विस्तारित करने का प्रयास - जिसमें गाँव के भीतर और बाहर के लोग शामिल हों - संरक्षित क्षेत्र से बाहर था और विनियमन के अधीन था। कोई भी लागू करने योग्य विधिक अधिकार न पाते हुएन्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी।   

भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 क्या हैं? 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25: 

  • यह अनुच्छेदअंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से माननेआचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता से संबंधित है।इसमें कहा गया है कि- 
  • (1) लोक व्यवस्थासदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुएसभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से माननेआचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा 
  • (2) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या राज्य को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी 
    • धार्मिक आवरण से संबद्ध किसी आर्थिकवित्तीयराजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निबंधन करती है
    • सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए या सार्वजनिक प्रकार की हिन्दुओं को धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभागों के लिये खोलने का उपबंध करती है।  
  • स्पष्टीकरण 1 - कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म के मानने का अंग समझा जाएगा 
  • स्पष्टीकरण 2  - खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदुओं के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत सिक्खजैन या बौद्ध धर्म के मानने वाले व्यक्तियों के प्रत्ति निर्देश है और हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओं के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा।  
  • इसमेंन केवल धार्मिक विश्वास अपीति धार्मिक रीति-रिवाज भी शामिल हैं। 
  • ये अधिकारसभी व्यक्तियों को उपलब्धहैं —नागरिकों के साथ-साथ गैर-नागरिकों को भी। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 26: 

  • अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता से संबंधित है।इसमें कहा गया है कि लोक व्यवस्थासदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुएप्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को यह अधिकार होगा-
    (क) धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिये संस्थाओं की स्थापना और पोषण का; 
    (ख) अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का; 
    (ग) जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व काऔर 
    (घ) ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार होगा 
  • यह अनुच्छेदसामूहिक धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। 
  • अनुच्छेद 26 द्वारा प्रत्याभूत अधिकार किसी संगठित निकाय जैसे धार्मिकसंप्रदाय या उसके अनुभागों का अधिकार है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी धार्मिक संप्रदाय कोनिम्नलिखित तीन शर्तों को पूरा करना होगा: 
    • यह ऐसे व्यक्तियों का समूह होना चाहिये जिनकी मान्यताओं की एक ऐसी प्रणाली हो जिसे वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिये अनुकूल मानते हों। 
    • इसका एक समान संगठन होना चाहिये 
    • इसे एक विशिष्ट नाम से नामित किया जाना चाहिये