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सिविल कानून

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 13-क

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 02-May-2026

रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण 

"जहाँ न्यायालय को लगता है कि दावा या बचाव इतना कमजोर है कि प्रथम दृष्टया उसमें सफलता की कोई संभावना नहीं दिखतीवहाँ पक्षकारों को पूर्ण विचारण की कठिनाइयों से गुजारना न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। इस प्रकारयह उपबंध न्यायालय को ऐसी कार्यवाही को प्रारंभिक अवस्था में ही रोकने का अधिकार देता हैजिससे न्यायिक समय और संसाधनों के अनावश्यक उपयोग को रोका जा सके।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थेनेरिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण (2026) के मामलेमें एक वाणिज्यिक अपील को मंजूर करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 13- के अधीन धन वसूली वाद का संक्षिप्त निपटारा करने से इंकार करने को अपास्त कर दिया। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि जहाँ मूलभूत तथ्य निर्विवाद होंमौखिक साक्ष्य की आवश्यकता न होऔर प्रतिवादी प्रतिरक्षा में सफलता की वास्तविक संभावना वाला कोई तर्क प्रस्तुत करने में असफल रहेवहाँ न्यायालयों को संक्षिप्त निर्णय देने में संकोच नहीं करना चाहिये। न्यायालय ने आगे आदेश 13- सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अधिकारिता के प्रयोग को नियंत्रित करने के लिये गैर-विस्तृत दिशानिर्देश भी निर्धारित किये 

रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा 2007 में नई दिल्ली के जसोला में एक व्यावसायिक भूखंड के लिये आयोजित सार्वजनिक नीलामी से उत्पन्न हुआ। अपीलकर्त्ता ने उच्चतम बोली लगाकर 164 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान कियाजिसके बाद 2008 में एक हस्तांतरण विलेख निष्पादित किया गया। 
  • बाद मेंपूर्व स्वामी द्वारा दायर मुकदमे के बाद भूमि के स्वामित्व पर संदेह उत्पन्न हो गया। यह पाया गया कि भूमि अधिग्रहणपुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 24(2) के अधीन अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त हो गई थी। समय दिये जाने के बावजूददिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) भूमि का पुनः अधिग्रहण करने में विफल रहा। 
  • स्वामित्व अमान्य हो जाने और कब्ज़ा खो जाने के बादअपीलकर्त्ता ने ब्याज सहित भुगतान की गई पूरी राशि की वापसी की मांग करते हुए एक वाणिज्यिक वाद दायर किया। न्यायालयों के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पूर्ण विचारण के बिनाआदेश 13- सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वाद का संक्षिप्त निपटारा किया जा सकता है। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने वाद का संक्षिप्त निपटारा करने से इंकार कर दियाजिसके कारण उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • संक्षिप्त निर्णय के उद्देश्य पर: न्यायालय ने माना कि आदेश 13- के अधीन संक्षिप्त निर्णय एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियात्मक तंत्र है जिसका उद्देश्य वाणिज्यिक विवादों में दक्षता को बढ़ावा देना और अनावश्यक विचारणों को रोकना है। इसने न्यायालयों को काल्पनिक या निराधार प्रतिरक्षा के आधार पर मुकदमेबाजी को जारी रखने की अनुमति न देने की चेतावनी दी। 
  • निर्णय देने के मानदंड पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संक्षिप्त निर्णय तभी दिया जाना चाहिये जब बचाव पक्ष का तर्क मात्र काल्पनिक हो या उसकी सफलता की कोई वास्तविक संभावना न होऔर जब पूर्ण विचारण का कोई सार्थक उद्देश्य न हो। जहाँ मूलभूत तथ्य निर्विवाद हों और मौखिक साक्ष्य की आवश्यकता न होवहाँ न्यायालयों को वाणिज्यिक वादों का संक्षिप्त निपटारा करने में संकोच नहीं करना चाहिये 
  • प्रत्यर्थी के विरोध पर: न्यायालय ने त्वरित निपटारे के लिये दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के विरोध को खारिज कर दियायह मानते हुए कि ऐसे तर्क मुकदमे को लंबा खींचने और पहले से तय विवाद्यकों को फिर से उठाने का मात्र प्रयास थे। यह पाया गया कि अपीलकर्त्ता ने प्रथम दृष्टया सफलता की वास्तविक संभावना दर्शाने का भार पूरा कर लिया थाजबकि प्रत्यर्थी केवल महत्त्वहीन आधार उठाकर इसका खंडन करने में विफल रहाजिन पर पूर्ण विचारण के माध्यम से निर्णय की आवश्यकता नहीं थी। 
  • निर्देशों पर: न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की त्वरित निपटान की याचिका को मंजूर कर लिया और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को 12 जुलाई 2007 से 7.5% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित ₹164.91 करोड़ की राशि आठ सप्ताह के भीतर वापस करने का निदेश दिया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13- के अंतर्गत कौन-कौन से दिशानिर्देश निर्धारित किये गए हैं? 

न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13- के अधीन सारांश निर्णय के लिये आवेदन पर विचार करते समय पालन किये जाने वाले निम्नलिखित गैर-विस्तृत दिशानिर्देश निर्धारित किये: 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13- के अधीन प्रक्रियात्मक आदेशों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये 
  • न्यायालय को इस बात पर विचार करना होगा कि क्या वादी के दावे या विवाद्यक पर सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं हैया क्या प्रतिवादी के दावे या विवाद्यक की सफलतापूर्वक प्रतिरक्षा करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है। 
  • न्यायालय को इस बात पर भी विचार करना चाहिये कि क्या ऐसा कोई अन्य कारण नहीं है जिसके चलते मामले या विवाद्यक को विचारण के लिये आगे बढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिये 
  • उपरोक्त बातों की पुष्टि करते समयन्यायालय को हर बात को सच नहीं मानना ​​चाहियेलेकिन उसे लघु विचारण भी नहीं करना चाहिये 
  • न्यायालय को ऐसे वाद या प्रतिरक्षा के बीच अंतर करना होगा जिसमें सफलता की वास्तविक संभावना होऔर ऐसे वाद या प्रतिरक्षा में जो काल्पनिक हो। 
  • संक्षिप्त निर्णय संबंधी आवेदनों से निपटते समय न्यायालय को गंभीरता से विचार करना चाहिये और विधि और निर्वचन के संक्षिप्त बिंदुओं पर निर्णय लेना चाहिये 
  • न्यायालय को न केवल अपने समक्ष विद्यमान साक्ष्यों को ध्यान में रखना चाहियेअपितु उन साक्ष्यों को भी ध्यान में रखना चाहिये जिनकी विचारण के दौरान पेश किये जाने या उपलब्ध होने की यथोचित रूप से अपेक्षा की जा सकती है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13- के अधीन दी गई शक्ति असाधारण हैक्योंकि यह विचारण की प्रक्रिया को छोटा कर देती हैऔर इसका प्रयोग केवल वहीं किया जाना चाहिये जहाँ मौखिक साक्ष्य और पूर्ण विचारण की आवश्यकता नहीं होती है। 
  • यह निर्धारित करने के लिये कि क्या पूर्ण विचारण आवश्यक हैन्यायालय को यह विचार करना होगा कि क्या न्याय के हित में साक्ष्यों का मूल्यांकन करनेसाक्षियों की विश्वसनीयता का आकलन करने या साक्ष्यों से उचित निष्कर्ष निकालने के लिये विचारण की आवश्यकता है। 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 13- क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 13-क — संक्षिप्त निर्णय: 

दायरा (नियम 1): 

  • कोई न्यायालय वाणिज्यिक विवाद में किसी भी "दावे" का निर्णय मौखिक साक्ष्य के बिना कर सकता है। 
  • "दावा" में संपूर्ण दावादावे का एक भाग या प्रतिदावा शामिल है। 
  • आदेश 37 के अंतर्गत संक्षिप्त वादों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया हैक्योंकि वे पहले से ही संक्षिप्त प्रकृति के होते हैं। तथापियदि किसी संक्षिप्त वाद को वाणिज्यिक वाद में परिवर्तित किया जाता हैतो आदेश 13- लागू होता है। 

आवेदन का प्रक्रम (नियम 2): 

  • प्रतिवादी को समन तामील किये जाने के बाद और विवाद्यकों के विरचित किये जाने से पहले संक्षिप्त निर्णय के लिये आवेदन दायर किया जा सकता है। 
  • एक बार विवाद्यक विरचित हो जाने के बादविचारण के लिये आगे बढ़ता है और यह प्रावधान लागू होना बंद हो जाता है। 

मंजूरी के आधार (नियम 3) 

दो अनिवार्य और संयुक्त आधारों को पूरा किया जाना चाहिये: 

  • वादी या प्रतिवादी में से किसी के भी दावे में सफल होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं हैऔर 
  • मौखिक साक्ष्य अभिलिखित करने से पहले दावे का निपटारा न करने का कोई अन्य ठोस कारण नहीं है। 

दोनों आधारों का सह-अस्तित्व होना आवश्यक है—कोई भी अकेला आधार पर्याप्त नहीं है।