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सांविधानिक विधि
अनुच्छेद 227 की अधिकारिता के प्रयोग के सिद्धांत
« »04-May-2026
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नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अन्य बनाम बी. गुरप्पा नायडू और अन्य "पर्यवेक्षी अधिकारिता का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय, प्रथम अपील न्यायालय के रूप में कार्य नहीं करता है कि वह चुनौती दिये गए निर्णय के आधार पर साक्ष्य या तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन करे। पर्यवेक्षी अधिकारिता का उद्देश्य अंतिम निर्णय के न्यायसंगत या समर्थित होने पर तथ्य की प्रत्येक त्रुटि या यहाँ तक कि विधिक कमी को भी सुधारना नहीं है।" न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी शामिल थे, ने नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अन्य बनाम बी. गुरप्पा नायडू और अन्य (2026) के मामले में, उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें निष्पादन न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रतिकर की राशि को कम कर दिया गया था, यह मानते हुए कि उच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन अपने पर्यवेक्षी अधिकारिता की संकीर्ण सीमाओं का उल्लंघन किया था।
- न्यायालय ने दोहराया कि अनुच्छेद 227 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय किसी मामले की गुण-दोष की पुन: परीक्षा नहीं कर सकता या अधीनस्थ न्यायालय के उचित निर्णय के स्थान पर अपना स्वयं का दृष्टिकोण प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, और ऐसी अधिकारिता अनुचित अधिकारिता ग्रहण, अधिकारिता के घोर दुरुपयोग, अधिकारिता का प्रयोग करने से अनुचित इंकार को सुधारने तक ही सीमित है।
नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अन्य बनाम बी. गुरप्पा नायडू और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 2007 में, नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइजेज लिमिटेड (NICE) और बेंगलुरु के भूस्वामियों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अधीन NICE ने एक सड़क परियोजना के लिये उनकी भूमि का एक भाग अधिग्रहित कर लिया था।
- समझौते की शर्तों के अधीन, NICE प्रभावित भूस्वामियों को वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने या सरकारी दिशानिर्देश मूल्य के आधार पर गणना किये गए प्रतिकर का संदाय करने के लिये बाध्य था।
- NICE वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने में असफल रहा, जिसके बाद भूस्वामियों ने समझौते को लागू कराने और प्रतिकर के संदाय के लिये निष्पादन न्यायालय से संपर्क किया।
- निष्पादन न्यायालय ने उचित विचार-विमर्श के बाद प्रतिकर की राशि 1,000 रुपए प्रति वर्ग फुट निर्धारित की।
- NICE ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन अपने पर्यवेक्षी अधिकारिता का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय के समक्ष इस निर्णय को चुनौती दी।
- उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 227 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए मुआवजे को घटाकर ₹500 प्रति वर्ग फुट कर दिया, जिससे उसने निष्पादन न्यायालय के आकलन के स्थान पर अपना स्वयं का आकलन लागू कर दिया।
- इस कटौती से व्यथित होकर, NICE ने उच्चतम न्यायालय में अपील का विकल्प चुना।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 227 की अधिकारिता की प्रकृति और दायरे पर: न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 227 के अधीन अधीक्षण की शक्ति का प्रयोग तब तक नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि न्यायालय या अधिकरण में निहित न होने वाली अधिकारिता का अनुचित रूप से ग्रहण न किया गया हो, अधिकारिता का घोर दुरुपयोग न हुआ हो, या विधिवत रूप से निहित अधिकारिता का प्रयोग करने से अनुचित इंकार न किया गया हो।
- पर्यवेक्षी और अपीलीय अधिकारिता के बीच अंतर पर: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 227 के अधीन कार्य करते हुए, अपीलीय न्यायालय के रूप में अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता या अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय के स्थान पर अपना स्वयं का निर्णय नहीं दे सकता। उच्च न्यायालय के लिये उस त्रुटि को सुधारना संभव नहीं है जो अभिलेख में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।
- साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन पर: न्यायालय ने यह माना कि पर्यवेक्षी अधिकारिता उच्च न्यायालय को उन साक्ष्यों या तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन या पुन: मूल्यांकन करने की अनुमति नहीं देता जिन पर चुनौती दी गई निर्णय आधारित है। इस अधिकारिता का उद्देश्य तथ्यों की प्रत्येक त्रुटि या विधिक कमी को सुधारना नहीं है, जहाँ अंतिम निर्णय अन्यथा न्यायसंगत या समर्थित हो।
- हस्तक्षेप की सीमाएँ: न्यायालय ने यह माना कि उच्च न्यायालय किसी अधीनस्थ न्यायालय के उचित निर्णय को केवल इसलिये अपने मत से प्रतिस्थापित नहीं कर सकता क्योंकि वह उस निष्कर्ष से असहमत है। निष्पादन न्यायालय द्वारा अपनाए गए मत के विपरीत कोई वैकल्पिक मत अपनाकर, उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 के अंतर्गत अनुमत जांच की संकीर्ण और सीमित सीमाओं का उल्लंघन करता है।
- वर्तमान मामले के तथ्यों के आधार पर: न्यायालय ने पाया कि निष्पादन न्यायालय ने तर्कसंगत निर्धारण के माध्यम से प्रतिकर की राशि 1,000 रुपए प्रति वर्ग फुट निर्धारित की थी और इसमें कोई अधिकारिता संबंधी त्रुटि नहीं हुई थी। उच्च न्यायालय ने प्रतिकर की राशि को पुनः निर्धारित करके और उसे घटाकर 500 रुपए प्रति वर्ग फुट करके, प्रभावी रूप से एक अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य किया और निष्पादन न्यायालय के निर्णयों को संशोधित किया, जो अनुच्छेद 227 के अधीन अस्वीकार्य था। तदनुसार, उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर निष्पादन न्यायालय के अवधारण को बहाल कर दिया। अपील मंजूर कर ली गई।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 227 क्या है?
- यह अनुच्छेद संविधान के भाग 5 के अंतर्गत निहित है, जो उच्च न्यायालय द्वारा सभी न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति से संबंधित है।
- यह प्रकट करता है की-
- खंड (1) में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण का अधिकार होगा जिनके संबंध में वह अधिकारिता का प्रयोग करता है।
- खंड (2) में कहा गया है कि पूर्वगामी उपबंध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालय निम्नलिखित कार्य कर सकता है—
- ऐसे न्यायालयों से विवरणी मंगा सकेगा।
- ऐसे न्यायालयों की पद्धति और कार्यवाहियों के विनियमन के लिये साधारण नियम और प्ररूपबना सकेगा और निकाल सकेगा तथा विहित कर सकेगा।
- ऐसे न्यायालयों के अधिकारियों द्वारा राखी जाने वाली वाली पुस्तकों, प्रविष्टियों और लेखाओं के प्ररूप विहित कर सकेगा।
- उच्च न्यायालय उन फीसों की सारणियां भी स्थिर कर सकेगा जो ऐसे न्यायालयों के शैरिफ को तथा सभी लिपिकों और अधिकारियों को तथा उनमें विधि-व्यवसाय करने वाले अटर्नियों, अधिवक्ताओं और प्लीडरों को अनुज्ञेय होंगी।
- परंतु खंड (2) या खंड (3) के अधीन बनाए गए कोई नियम, विहित किये गए कोई प्ररूप या स्थिर की गई कोई सारणी तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंध से असंगत नहीं होगी और इनके लिये राज्यपाल के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी।
- खंड (4) में कहा गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात उच्च न्यायालय को सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिकरण पर अधीक्षण की शक्तियां देने वाली नहीं समझी जाएगी।