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सिविल कानून
राष्ट्रीय हरित अधिकरण भवन योजना के उल्लंघन से संबंधित विवादों का निर्णय नहीं कर सकता
« »21-Jan-2026
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राज सिंह गेहलोत एवं अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य "खुले एवं हरित क्षेत्रों के संदर्भ में भवन योजनाओं के अनुपालन न किये जाने से संबंधित विवाद में, पर्यावरण का प्रश्न राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कोई महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रश्न नहीं था; अतः इस प्रकरण में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा अपने अधिकारिता के आह्वान को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राज सिंह गहलोत और अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य (2025) के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और संदीप मेहता की पीठ ने निर्णय दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) उन विवादों का निपटारा नहीं कर सकता जो मूल रूप से भूमि उपयोग, ज़ोनिंग नियमों और नगर नियोजन अनुपालन से संबंधित हैं, भले ही ऐसे विवादों को पर्यावरणीय चिंताओं के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
राज सिंह गहलोत और अन्य बनाम अमिताभ सेन और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला गुरुग्राम में स्थित एंबियंस लैगून आइलैंड परियोजना से संबंधित विशेष अनुमति याचिकाओं के एक समूह से संबंधित था।
- आरोप लगाए गए थे कि आवासीय उपयोग के लिये मूल रूप से लाइसेंस प्राप्त भूमि पर वाणिज्यिक निर्माण किये गए थे।
- इस विवाद को पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ा हुआ बताया गया।
- इन दावों पर कार्यवाही करते हुए, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने पर्यावरण संबंधी प्रतिकर का आदेश देते हुए अंतरिम आदेश पारित किये।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने कथित उल्लंघनों का आकलन करने के लिये विशेषज्ञ समितियों का गठन किया।
- एक विशेषज्ञ समिति (संयुक्त विशेषज्ञ समिति) ने भारी शास्ति की सिफारिश की, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं:
- 138.83 करोड़ रुपए का जुर्माना।
- पर्यावरण संबंधी प्रतिकर के रूप में 10.33 करोड़ रुपए।
- विकासकर्त्ताओं से उनके लाभ का 25% से 50% तक रोके जाने का निदेश।
- वाणिज्यिक परिसर में कुछ इमारतों को ध्वस्त किये जाने की संभावना है।
- मुख्य विवाद लाइसेंस रद्द करने की वैधता और नगर नियोजन विधियों के अधीन भूमि के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति से संबंधित था।
- इन विवाद्यकों से संबंधित कार्यवाही पहले से ही पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी।
- अपीलकर्त्ता- एम्बिएंस डेवलपर्स ने इस मामले पर सुनवाई करने के लिये राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने पाया कि मूल विवाद पर्यावरणीय क्षरण नहीं अपितु लाइसेंस रद्द करने की वैधता और नगर नियोजन विधियों के अधीन भूमि के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति से संबंधित था।
- पीठ ने टिप्पणी की कि "खुले और हरित क्षेत्रों के संबंध में भवन योजनाओं के अनुपालन न करने से संबंधित विवाद... पर्यावरण का विवाद्यक राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न नहीं था, जिससे इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा अधिकारिता का प्रयोग उचित ठहराया जा सके। अपितु, वर्तमान मामला अपीलकर्त्ता-एम्बेंस डेवलपर्स की भूमि के उपयोग में अनियमितताओं से संबंधित पक्षकारों के विवादित दावों से संबंधित है, जिसका उपयोग आवासीय कॉलोनी के विकास में किया गया था।"
- न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की कि जहाँ विवाद मूल रूप से भूमि उपयोग, ज़ोनिंग, भवन योजना अनुमोदन और नगर नियोजन अनुपालन से संबंधित है, वहाँ यह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अधिकारिता से बाहर आता है ।
- न्यायालय ने उच्च न्यायालय में लंबित मामले के निपटारे तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष लंबित कार्यवाही को स्थगित रखा।
- न्यायालय ने निदेश दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पारित संयुक्त विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश, जिसमें भारी जुर्माने और शास्ति अधिरोपित करने की सिफारिश की गई थी, पर फिलहाल अमल नहीं किया जाएगा।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है?
बारे में:
- यह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (NGT Act) के अधीन स्थापित एक विशेष निकाय है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान करना है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के साथ, भारत ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया जिसने एक विशेष पर्यावरण अधिकरण की स्थापना की, और ऐसा करने वाला पहला विकासशील देश बन गया।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण को आवेदन या अपील दाखिल होने के 6 मास के भीतर उनका अंतिम निपटारा करने का दायित्त्व सौंपा गया है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पाँच बैठक स्थल हैं, नई दिल्ली मुख्य बैठक स्थल है और भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई अन्य चार हैं।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण की संरचना:
- गठन:
- अधिकरण में अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य सम्मिलित होते हैं। इनका कार्यकाल तीन वर्ष का या पैंसठ वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, तक रहेगा और ये पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं हैं।
- नियुक्ति:
- अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श के पश्चात् की जाती है।
- न्यायिक सदस्यों और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति के लिये केंद्र सरकार द्वारा एक चयन समिति का गठन किया जाएगा।
- सदस्य संख्या:
- अधिकरण में न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 20 पूर्णकालिक न्यायिक एवं विशेषज्ञ सदस्य नियुक्त किये जा सकते हैं ।
शक्ति एवं अधिकारिता:
- प्रक्रिया का विनियमन:
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 19 राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने का अधिकार देती है।
- सिविल मामलों में अधिकारिता:
- अधिकरण को उन सभी सिविल मामलों पर अधिकारिता प्राप्त है जिनमें पर्यावरण से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न (जिसमें पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन भी सम्मिलित है) निहित हो।
- अक्टूबर 2021 में, उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थिति को एक "अद्वितीय" मंच के रूप में घोषित किया, जिसे देश भर में पर्यावरणीय मुद्दों को उठाने के लिये स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने की शक्तियां प्राप्त हैं।
- अधिकरण को उन सभी सिविल मामलों पर अधिकारिता प्राप्त है जिनमें पर्यावरण से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न (जिसमें पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन भी सम्मिलित है) निहित हो।
- अपीलीय अधिकारिता:
- न्यायालयों के समान एक सांविधिक न्यायनिर्णायक निकाय होने के कारण, राष्ट्रीय हरित अधिकरण को आवेदन प्रस्तुत किये जाने पर मूल अधिकारिता के अतिरिक्त अपीलीय अधिकारिता भी प्राप्त है। ।
- प्राकृतिक न्याय:
- अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में निहित प्रक्रिया से बाध्य नहीं है, तथापि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निदेशित होगा।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत:
- किसी भी आदेश/निर्णय/पंचाट को पारित करते समय, इसमें सतत विकास के सिद्धांत, एहतियाती सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को लागू किया जाएगा।
- शक्ति:
- प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति (जिसमें किसी भी खतरनाक पदार्थ को संभालते समय होने वाली दुर्घटनाएं शामिल हैं) के पीड़ितों को अनुतोष और प्रतिकर प्रदान करना।
- क्षतिग्रस्त संपत्ति की क्षतिपूर्ति के लिये और
- अधिकरण द्वारा उचित समझे जाने वाले किसी भी क्षेत्र या क्षेत्रों के पर्यावरण की बहाली के लिये।
- अधिकरण का कोई आदेश/निर्णय/पंचाट सिविल न्यायालय के निर्णय के समान ही निष्पादन योग्य होता है।
- शास्ति
- तीन वर्ष तक का कारावास की सजा।
- दस करोड़ रुपए तक का जुर्माना और
- जुर्माना और कारावास दोनों।
- अपील:
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश/निर्णय/पंचाट के विरुद्ध अपील सामान्यत: सूचना मिलने की तारीख से नब्बे दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है।
- प्रमुख विधियाँ:
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974,
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977,
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980,
- वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981,
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986,
- लोक दायित्त्व बीमा अधिनियम, 1991 और
- जैव विविधता अधिनियम, 2002।
- इन विधियों से संबंधित किसी भी उल्लंघन या इन विधियों के अधीन सरकार द्वारा लिये गए किसी भी निर्णय को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।
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