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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 343 के अधीन क्षमा-दान प्राप्त व्यक्ति का अभियोजन साक्षी के रूप में परीक्षा

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 25-Mar-2026

अजाज़ अहमद बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेशथाना प्रभारी (SHO), पुलिस स्टेशन पुंछ एवं अधीक्षकजिला कारागारपुंछ 

"क्षमादान की शर्तों का अनुपालन किये जाने के उपरांत भी अभियोजन साक्षी की निरंतर अभिरक्षासंविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त पवित्र मानवीय अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकती है।" 

न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी 

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी ने अजाज़ अहमद बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि जब किसी अभियोजन साक्षी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 343 के अंतर्गत प्रदत्त क्षमादान की शर्तों का पूर्णतः एवं सत्यनिष्ठा से पालन कर लिया होतब उसे विचारण की समाप्ति तक अनिवार्य रूप से अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जा सकता। 

  • न्यायालय ने आगे यह भी प्रतिपादित किया कि उच्च न्यायालयधारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत निहित अपनी अंतर्निहित शक्तियों के आधार परउपयुक्त परिस्थितियों में ऐसे अभियोजन साक्षी को जमानत प्रदान कर सकता हैजिससे सांविधिक आशय एवं सांविधानिक प्रत्याभूति के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सके 

अजाज़ अहमद बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • यह याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के अधीन दायर की गई थीजिसमें याचिकाकर्त्ता अजाज़ अहमद - एक सरकारी शिक्षक - की जमानत याचिका को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला आयुध अधिनियम की धारा 120-, 121, 122, 201, 7/25 और विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम के कई प्रावधानों के अधीन दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से संबंधित है।  
  • अन्वेषण के दौरान यह स्थापित हुआ कि याचिकाकर्त्ता सह-अभियुक्त गुलशन अहमद के दबाव और धमकी के अधीन अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थाऔर उसे सह-अभियुक्त से प्रतिबंधित संगठन के आयुधगोला-बारूद और पोस्टर बरामद करने में शामिल आपराधिक आशय या षड्यंत्र की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। 
  • अंतिम रिपोर्ट/चालान दाखिल होने के बादयाचिकाकर्त्ता ने संहिता की धारा 306 के अधीन क्षमा प्राप्त करने की शर्त पर तथ्यों का सत्यपूर्ण विवरण देने की इच्छा व्यक्त की।  
  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने क्षमादान प्रदान किया और याचिकाकर्त्ता का कथन अभियोजन साक्षी के रूप में दर्ज किया गया। बाद में विचारण के दौरान उससे पूछताछ की गईजिसमें उसने मुख्य और प्रतिपरीक्षा दोनों में पूर्ण और सुसंगत परिसाक्ष्य दिया 
  • पूर्ण अनुपालन के होते हुए भीविचारण न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका को केवल इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 343(4)(ख) के अधीन विचारण की समाप्ति तक निरोध अनिवार्य है। इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 343(4)(ख) के अधीन अभियोजन साक्षी को निरोध में रखनासुरक्षात्मक प्रकृति काहै —जिसका उद्देश्य अभियोजन साक्षी को सह-अभियुक्त की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से बचाना और सत्य परिसाक्ष्य सुनिश्चित करना है—न कि दण्डात्मक उपचार। इस प्रावधान को "जब तक वह पहले से जमानत पर न हो" शब्दों के साथ पढ़ा जाना चाहियेजो यह दर्शाता है कि निरोध सशर्त हैपूर्ण नहीं। 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि एक बार अभियोजन साक्षी द्वारा पूर्ण और सत्य का प्रकटन करने और क्षमादान की शर्तों का पालन करने के बादविचारण न्यायालय के पास उसे जमानत पर छोड़ने का विवेकाधिकार रहता है। इस अवधि के बाद लंबे समय तक निरोध में रखना किसी भी सांविधिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता और अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। 
  • उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन उसकी अंतर्निहित शक्तियां उचित मामलों में इस प्रकार के निरोध का निवारण करने के लिये उपलब्ध हैंऔर अभियोजन साक्षी द्वारा गैर-अनुपालन के संबंध में किसी भी चिंता को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 308 के अधीन पृथक् कार्यवाही के माध्यम से संबोधित किया जा सकता है। 
  • विचारण न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुएन्यायालय ने निदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता को उचित शर्तों के अधीन जमानत के लिये विचार किया जाएजिससे क्षमा की शर्तों का अनुपालन और उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 343 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 343 - सह-अपराधी को क्षमा-दान: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 343 मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को किसी भी ऐसे व्यक्ति को क्षमादान देने का अधिकार देती है जिस पर किसी अपराध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का संदेह होअन्वेषणजांचविचारण के किसी भी प्रक्रम में। 
  • क्षमादान इस शर्त पर दिया जाता है कि संबंधित व्यक्ति अपराध से संबंधित और उसमें सम्मिलित हर दूसरे व्यक्ति से संबंधित अपने ज्ञान में मौजूद सभी परिस्थितियों का पूर्ण और सत्य खुलासा करे। 
  • यह धारा उन अपराधों पर लागू होती है जिनका विचारण केवल सेशन न्यायालय या विशेष न्यायाधीश द्वारा किया जा सकता हैऔर उन अपराधों पर भी लागू होता है जिनके लिये सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास के दण्ड का उपबंध है। 
  • क्षमादान देने वाले मजिस्ट्रेट को अपने कारणों को अभिलिखित करना होगा और यह भी अभिलिखित करना होगा कि क्षमादान स्वीकार किया गया था या नहींऔर आवेदन करने पर अभियुक्त को ऐसे अभिलेख की एक प्रति निःशुल्क उपलब्ध करानी होगी। 
  • क्षमादान स्वीकार करने वाले व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष और पश्चात्वर्ती विचारण की कार्यवाही में साक्षी के रूप में पेश किया जाना चाहियेऔर यदि वह पहले से जमानत पर नहीं है तो विचारण की समाप्ति तक अभिरक्षा में रहेगा। 
  • एक बार ऐसे व्यक्ति की परीक्षा हो जाने के बादमजिस्ट्रेट को मामले को विचारण के लिये सौंप देना चाहिये - यदि अपराध केवल सेशन न्यायालय या विशेष न्यायाधीश द्वारा ही विचारणीय हैतो ऐसे मामलों में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोया अन्य सभी मामलों मेंबिना किसी और जांच के।