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सिविल कानून
प्रवर्तक द्वारा धनराशि प्रविष्टि हेतु उपक्रम
« »12-Jan-2026
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यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025) "किसी उधारकर्ता को उसकी देनदारियों को पूरा करने में सक्षम बनाने के लिये धन उपलब्ध कराने का उपक्रम, अपने आप में उधारकर्ता की लेनदार के प्रति देनदारी को निर्वहन करने के वचन के समकक्ष नहीं ठहराया जा सकता है ।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक आराधे |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025) के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक अराधे की पीठ ने यह निर्णय दिया कि किसी प्रवर्तक को वित्तीय शर्तों को पूरा करने के लिये उधारकर्ता में धन की व्यवस्था करने के लिये बाध्य करने वाला संविदात्मक खंड को भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 के अधीन प्रत्याभूति की संविदा नहीं है।
यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इलेक्ट्रोस्टील लिमिटेड (ESL) ने 26.07.2011 के स्वीकृति पत्र के माध्यम से SREI इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस लिमिटेड (SREI) से 500 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता प्राप्त की ।
- इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (ECL), जो ESL की प्रवर्तक (Promoter) कंपनी थी, को ESL द्वारा वित्तीय उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु धनराशि की प्रविष्टि की व्यवस्था करने संबंधी एक उपक्रम प्रस्तुत करना आवश्यक था।
- जब SREI और ESL ने ऋण करार पर हस्ताक्षर किये, तो उसमें इस आशय का एक खंड सम्मिलित किया गया था।
- तदनुसार, ECL ने दिनांक 27.07.2011 को एक उपक्रम विलेख निष्पादित किया, जिसके अंतर्गत उसने ESL में धनराशि की प्रविष्टि की व्यवस्था करने संबंधी सीमित दायित्त्व स्वीकार किया।
- वर्ष 2017–18 में, ESL के विरुद्ध दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) आरंभ की गई।
- ESL के लिये एक समाधान योजना अनुमोदित एवं कार्यान्वित की गई।
- SREI ने ESL को बिना शर्त 'नो ड्यू सर्टिफिकेट' जारी किया।
- तत्पश्चात्, SREI ने यह दावा किया कि शेष ऋण को इक्विटी में परिवर्तित किये जाने पर उसे अपेक्षा से कम मात्रा में इक्विटी शेयर आबंटित किये गए।
- बाद में SREI ने कथित अवशिष्ट ऋण (Residual Debt) से संबंधित अपने अधिकार यूवी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (अपीलार्थी) के पक्ष में सौंप दिये।
- बकाया ऋण का दावा करते हुए, अपीलकर्त्ता ने दिवाला और शोधन अक्षमता की धारा 7 के अधीन एक याचिका के साथ राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), कटक से संपर्क किया।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLAT) के समक्ष कार्यवाही:
- NCLT ने दो आधारों पर याचिका खारिज कर दी : (i) ECL, ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के संबंध में प्रतिभू नहीं था और इस कारण ECL पर कोई वित्तीय ऋण देय नहीं था, और (ii) समाधान योजना के अधीन ESL के ऋण को इक्विटी में परिवर्तित करने से ECL की किसी भी देनदारी का समापन हो गया।
- अपील में, NCLAT ने माना कि ECL, ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के लिये प्रतिभू नहीं था।
- तथापि, NCLAT ने यह भी पाया कि समाधान योजना की मंजूरी से केवल ESL के संबंध में ऋण समाप्त होते हैं, न कि पर-पक्षकार के संबंध में, जब तक कि विशेष रूप से प्रावधान न किया गया हो।
- अंततः, यह पाते हुए कि ECL, ESL की प्रतिभू नहीं थी, अपील को खारिज कर दिया गया।
- उपर्युक्त निष्कर्षों से असंतुष्ट होकर, दोनों पक्षकारों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने कहा, "इस खंड में न तो लेनदार को देय ऋण चुकाने का कोई उपक्रम है और न ही इसमें व्यतिक्रम की स्थिति में ऋणदाता को संदाय करने का प्रावधान है। इस खंड में लेनदार को व्यतिक्रम होने पर ऋण चुकाने का वचन नहीं है, अपितु उधारकर्ता के प्रति यह वचन है कि उसे वित्तीय शर्तों के अनुपालन में सक्षम बनाया जाएगा।"
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि "ऋण लेने वाले को उसकी देनदारियों को पूरा करने में सक्षम बनाने के लिये धन उपलब्ध कराने का वचन देना, अपने आप में ऋणदाता के प्रति ऋण लेने वाले के दायित्त्व के उपक्रम के वचन के समान नहीं माना जा सकता। केवल वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने या धन उपलब्ध कराने का वचन देना अधिनियम की धारा 126 की सांविधिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।"
- न्यायालय ने स्वीकृति पत्र सहित अन्य दस्तावेज़ों का भी हवाला देते हुए कहा कि ECL द्वारा कोई "प्रत्याभूति" नहीं दी गई थी।
- न्यायालय ने NCLT तथा NCLAT के निष्कर्षों से सहमति व्यक्त की कि उपक्रम विलेख (Deed of Undertaking) की धारा 2.2 प्रत्याभूति की संविदा का गठन नहीं करती तथा ECL को ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के संबंध में प्रतिभू के रूप में नहीं माना जा सकता।
- तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
- ECL द्वारा दायर एक संबंधित अपील में, न्यायालय ने पाया कि समाधान योजना ने SREI सहित वित्तीय लेनदारों को ESL के अस्थिर ऋण का पूरा मूल्य प्रदान नहीं किया।
- न्यायालय ने माना कि ESL की संकल्प योजना की मंजूरी से संपूर्ण ऋण का समापन नहीं हुआ, जिससे ECL के विरुद्ध प्रतिभूति प्रदाता/पर-पक्षकार के प्रतिभू के रूप में किसी भी दावे को रोका जा सके।
- तदनुसार, NCLAT के निर्णय के विरुद्ध ECL की अपील खारिज कर दी गई।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 क्या है?
बारे में:
- भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 में यह उपबंधित किया गया है कि "प्रत्याभूति की संविदा" किसी पर-व्यक्ति द्वारा व्यतिक्रम की दशा में उसके वचन का पालन या उसके दायित्त्व का निर्वहन करने की संविदा है ।
- प्रत्याभूति का अर्थ है प्रतिभू देना या उत्तरदायित्त्व लेना। यह एक ऐसा करार है जिसके अधीन किसी व्यक्ति के व्यतिक्रम की दशा की स्थिति में उसके ऋण अथवा दायित्त्व के निर्वहन का वचन दिया जाता है।
- प्रतिभू के संविदा में तीन पक्षकार सम्मिलित होते हैं।
- प्रतिभू: जो व्यक्ति प्रत्याभूति देता है, उसे प्रतिभू कहते हैं। प्रतिभू का दायित्त्व गौण होता है, अर्थात् उसे संदाय तभी करना होता है जब मूल देनदार संदाय करने में असफल हो जाता है।
- मुख्य देनदार: वह व्यक्ति जिसके व्यतिक्रम के संबंध में प्रत्याभूति दी जाती है, मुख्य देनदार कहलाता है।
- लेनदार: वह व्यक्ति जिसे प्रत्याभूति दी जाती है, उसे लेनदार कहा जाता है।
- प्रत्याभूति लिखित या मौखिक रूप में हो सकती है।
- यह संविदा मूल देनदार को नियोजन, ऋण या वस्तुएँ प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और देनदार की ओर से किसी भी प्रकार के व्यतिक्रम होने की स्थिति में प्रतिभू पुनर्भुगतान सुनिश्चित करेगा।
- उदाहरण
- मोहन लखनऊ विश्वविद्यालय शाखा के यूको बैंक से 5 लाख रुपए का ऋण लेता है। सोहन यूको बैंक को वचन देता है कि यदि मोहन समय पर ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो वह ऋण चुका देगा। यह एक प्रत्याभूति की संविदा है और मोहन मूल देनदार है, यूको बैंक लेनदार है और सोहन प्रतिभू है।
प्रत्याभूति संविदा के आवश्यक तत्त्व:
- संविदा मौखिक या लिखित दोनों प्रकार का हो सकती है। यद्यपि, अंग्रेज़ी विधि में प्रत्याभूति की संविदा केवल लिखित रूप में ही वैध मणि जाती है।
- प्रत्याभूति की संविदा मूल देनदार की किसी विद्यमान या प्रत्याशित देयता अथवा दायित्त्व के निर्वहन पर आधारित होती है। यदि ऐसी कोई मूल देयता अस्तित्व में न हो और कोई पक्षकार बिना किसी अन्य व्यतिक्रम पर निर्भर हुए किसी अन्य को संदाय करने का वचन दे, तो वह संविदा प्रत्याभूति नहीं अपितु क्षतिपूर्ति (Indemnity) की संविदा होगी।
- मूल देनदार के समर्थन में पर्याप्त प्रतिफल होना आवश्यक है। लेनदार और प्रतिभू के बीच पृथक् प्रतिफल का होना अनिवार्य नहीं है; यह पर्याप्त है कि लेनदार ने मूल देनदार के लाभ हेतु कोई कार्य किया हो।
- संव्यवहार से संबंधित किसी भी महत्त्वपूर्ण जानकारी को दुर्व्यपदेशन द्वारा प्रस्तुत करके या छुपाकर आश्वासन की सहमति प्राप्त नहीं की जा सकती है।
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128:
- भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 128 में कहा गया है कि प्रतिभू का दायित्त्व मूल देनदार के दायित्त्व के समान होता है, जब तक कि संविदा में अन्यथा उपबंधित न हो।
- प्रतिभू का दायित्व मूल देनदार के समान ही होता है।
- एक लेनदार प्रत्यक्षत: इसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है।
- मूल देनदार पर वाद किये बिना, लेनदार प्रत्यक्षत: प्रतिभू पर वाद कर सकता है।
- मूल देनदार द्वारा किसी भी संदाय में व्यतिक्रम होने पर प्रतिभू तुरंत संदाय करने के लिये उत्तरदायी होता है ।
- संदाय करने का प्राथमिक उत्तरदायित्त्व मूल देनदार की होता है, जबकि प्रतिभू का उत्तरदायित्त्व गौण होता है। वास्तव में, यदि किसी दस्तावेज़ त्रुटि के कारण मूल देनदार को किसी संदाय के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, तो प्रतिभू भी ऐसे संदाय के लिये उत्तरदायी नहीं होता है।
चलत प्रत्याभूति
- भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 129 चलत प्रत्याभूति से संबंधित है।
- एक प्रकार की प्रत्याभूति जो संव्यवहार की एक श्रृंखला तक विस्तारित होती है , वह चलत प्रत्याभूति है।
- एक चलत प्रत्याभूति उन सभी संव्यवहारों पर लागू होती है जो मूल देनदार प्रतिभू द्वारा प्रत्याभूति रद्द किये जाने से पहले करता है।
- भविष्य के संव्यवहार के लिये चलत प्रत्याभूति को लेनदारों को सूचना देकर किसी भी समय वापस लिया जा सकता है। यद्यपि प्रत्याभूति प्रतिसंहरण होने से पहले पूर्ण किये गए संव्यवहार के लिये प्रतिभू का उत्तरदायित्त्व कम नहीं होता है।