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आपराधिक कानून

विश्वसनीय साक्ष्य द्वारा आरोपों के खंडन पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना

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 08-Apr-2026

सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य 

"जहाँ विश्वसनीय और निर्विवाद सामग्री आरोपों के तथ्यात्मक आधार को विस्थापित करती है और अप्रतिबंधित रहती हैवहाँ न्यायालय अन्याय और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये कार्यवाही को रद्द करने में न्यायसंगत होगा।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथन्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथन्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ नेसजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले में CCTV फुटेज से स्पष्ट रूप से साबित होने के बादभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के अधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दियाकि अभियुक्त कथित अपराध में शामिल नहीं थे। यह निर्णय आपराधिक विधि के दुरुपयोग को रोकने के लिये अंतर्निहित शक्तियों के दायरे को दोहराता है। 

सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला कोलकाता में एक अपार्टमेंट विवाद से संबंधित है (अक्टूबर 2022)। 
  • एक 77 वर्षीय परिवादकर्त्ता ने कई व्यक्तियों द्वारा मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) निम्नलिखित प्रावधानों के अधीन दर्ज की गई थी: 
    • विधिविरुद्ध जमाव 
    • साशय उपहति कारित करना  
    • आपराधिक धमकी 
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय: 
    • दो सह-अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही रद्द कर दी गई (विशिष्ट आरोपों का अभाव) 
    • तीन अपीलकर्त्ताओं को अनुतोष देने से इंकार कर दिया गया 
  • अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

  • निर्विवाद साक्ष्य नियम: 
    जहाँ उत्कृष्ट गुणवत्ता की सामग्री आरोपों को गलत साबित करती हैवहाँ न्यायालय कार्यवाही को रद्द कर सकते हैं। 
  • CCTV फुटेज की भूमिका: 
    • CCTV फुटेज (आरोप पत्र का भाग) में दिखाया गया: 
      • अपीलकर्त्ताहिंसा में शामिल नहीं थे 
      • इसके अतिरिक्त वेस्थिति को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। 
    • यह परिवादकर्त्ता के कथन के बिल्कुल विपरीत था। 
  • अभियोजन पक्ष की विफलता: 
    • अभियोजन पक्ष CCTV फुटेज के साक्ष्यों काखंडन करने में असफल रहा। 
    • इस प्रकार की सामग्री को प्रारंभिक प्रक्रम में भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
  • प्रक्रिया का दुरुपयोग: 
    विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव के होते हुए भी कार्यवाही जारी रखने से निम्नलिखित होगा: 
    • यहआपराधिक विधि का दुरुपयोग है। 
    • न्यायिक समय की बर्बादीहोती है।  
  • प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के मामले में निर्धारित विधि को लागू करते हुएजहाँ न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन याचिका रद्द करने की सुनवाई करते समय उच्च न्यायालय द्वारा विचार किये जाने वाले कदमों को निर्धारित किया थान्यायालय ने टिप्पणी की कि "कथित अपराधों से उन्हें जोड़ने वाले विश्वसनीय साक्ष्यों की पूर्ण कमी के होते हुए भी ऐसी कार्यवाही जारी रखना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।" 
  • प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 में प्रतिपादित परीक्षण निम्नलिखित है: 
    • उत्कृष्ट गुणवत्ता का साक्ष्य:जिस सामग्री पर विश्वास किया गया है वह विश्वसनीयभरोसेमंद और त्रुटिहीन गुणवत्ता की होनी चाहिये 
    • आरोपों का खंडन:प्रस्तुत सामग्री को परिवाद में किये गए तथ्यात्मक दावों को पूरी तरह से गलत साबित करना चाहिये या उनका खंडन करना चाहिये 
    • अभियोजन पक्ष द्वारा खंडन न किया गया:सामग्री को चुनौती नहीं दी गई है या अभियोजन पक्ष द्वारा प्रभावी ढंग से खंडन नहीं किया जा सकता है। 
    • न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग:विचारण को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय के उद्देश्यों को विफल कर देगा। 
  • उच्चतम न्यायालय ने अपील को मंजूर करते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि जहाँ विश्वसनीय साक्ष्य अभियोजन पक्ष के मामले को ध्वस्त कर देते हैं और उन्हें चुनौती नहीं दी जाती हैवहाँ विचारण को जारी रखना अन्यायपूर्ण होगा और आपराधिक विधि के उद्देश्य के विपरीत होगा।

 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 क्या है? 

बारे में: 

  • यह धारा पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत आती थी। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के संरक्षण से संबंधित है। 
  • इसमें कहा गया है कि इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अंतर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली न समझी जाएगी जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिये या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिये या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हों 
  • यह धारा उच्च न्यायालयों को कोई अंतर्निहित शक्ति प्रदान नहीं करता हैअपितु यह केवल इस तथ्य को मान्यता देता है कि उच्च न्यायालयों के पास अंतर्निहित शक्तियां हैं। 

उद्देश्य: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 में यह निर्धारित किया गया है कि अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कब किया जा सकता है।  
  • इसमें उन तीन उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है जिनके लिये अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है: 
    • संहिता के अंतर्गत किसी भी आदेश को प्रभावी बनाने के लिये आवश्यक आदेश देना। 
    • किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये 
    • न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के लिये