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वाणिज्यिक विधि

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66

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 11-Mar-2026

पन्नालाल भंसाली बनाम भारती टेलीकॉम लिमिटेड और अन्य 

"शेयर पूँजी में कमी एक विशेष प्रस्ताव और अधिकरण द्वारा पुष्टि के माध्यम से प्राप्त की जा सकती हैइसके लिए किसी अनुमोदित/रजिस्ट्रीकृत मूल्यांकनकर्ता से मूल्यांकन रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती है।" 

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और संजय कुमार 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ नेपन्नालाल भंसाली बनाम भारती टेलीकॉम लिमिटेड और अन्य (2026)के मामले में निर्णय दिया कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66 के अधीन शेयर पूँजी में कमी करने के लिये अनुमोदित या रजिस्ट्रीकृत मूल्यांकनकर्ता की मूल्यांकन रिपोर्ट एक सांविधिक पूर्वापेक्षा नहीं है। 

  • न्यायालय ने भारती टेलीकॉम लिमिटेड द्वारा की गई पूँजी कटौती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली अल्पसंख्यक अंशधारकों द्वारा दायर अपीलों के एक समूह को खारिज कर दियायह पुष्टि करते हुए कि अंशधारक बैठक बुलाने की सूचना में मूल्यांकन रिपोर्ट की अनुपस्थिति प्रक्रिया को अमान्य नहीं करती है। 

पन्नालाल भंसाली बनाम भारती टेलीकॉम लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • भारती टेलीकॉम लिमिटेड ने पूँजी कटौती प्रक्रिया के अधीन कुछ सार्वजनिक अंशधारकों के पास विद्यमान अंशों को कम करने का निर्णय लिया है और उनके अंशों के बदले उन्हें मौद्रिक रूप से प्रतिकर दिया है। 
  • कंपनी ने एक बाहरी अभिकरण से मूल्यांकन प्राप्त कियाजिसनेअंशों की गैर-सूचीबद्ध और गैर-तरल प्रकृति के कारणबाज़ारयोग्यता क्षमता की कमी के लिये छूट (DLOM) लागू करते हुए अंश का मूल्य ₹163.25 प्रति शेयर निर्धारित किया। 
  • एक पृथक् वित्तीय संस्था की निष्पक्षता रिपोर्ट ने स्वतंत्र रूप से इस मूल्यांकन का समर्थन किया। 
  • राष्ट्रीयकंपनी विधि अधिकरण (NCLT) नेपूँजी कटौती को मंजूरी देते हुए प्रति शेयर भुगतान को बढ़ाकर ₹196.80 कर दिया। 
  • पूँजी में कटौती को अंशधारकों के भारी बहुमत द्वारा एक विशेष प्रस्ताव के माध्यम से अनुमोदित किया गया। 
  • इसके होते हुए भीकुछ अल्पसंख्यक अंशधारकों ने इस प्रक्रिया को चुनौती दीयह आरोप लगाते हुए कि मूल्यांकन अनुचित था और बैठक बुलाने की सूचना के साथ अंशधारकों को मूल्यांकन रिपोर्ट का प्रकटन नहीं किया गया था। 
  • अंततः पीड़ित अल्पसंख्यक अंशधारकों द्वारा दायर अपीलों के माध्यम से यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने यह माना किकंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66पूँजी कटौती प्रक्रिया के भाग के रूप में मूल्यांकन रिपोर्ट प्राप्त करने या प्रसारित करने का कोई सांविधिक दायित्त्व अधिरोपित नहीं करता हैजैसा कि विलयसमामेलन या तरजीही आवंटन के मामलों में होता है। 
  • न्यायालय ने पाया कि शेयर पूँजी में कमी कोरजिस्ट्रीकृत मूल्यांकनकर्ता की रिपोर्ट की आवश्यकता के बिना, केवल अधिकरण द्वारा एक विशेष प्रस्ताव और पुष्टि के माध्यम से वैध रूप से प्राप्त किया जा सकता है। 
  • पीठ ने धारा 232 (समामेलन/विलय) के साथ एक स्पष्ट विरोधाभास दिखायाजो उपधारा (2) (घ) के अधीन स्पष्ट रूप से एक विशेषज्ञ मूल्यांकन रिपोर्ट अनिवार्य करता हैऔर धारा 236 (2) (अल्पसंख्यक अंशों की वापसी या खरीद)जो इसी तरह की रिपोर्ट की आवश्यकता है - यह देखते हुए कि धारा 66 में ऐसी कोई आवश्यकता "स्पष्ट रूप से" विद्यमान नहीं है। 
  • न्यायालय ने अल्पसंख्यक अंशधारकों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि बैठक की सूचना में मूल्यांकन और निष्पक्षता रिपोर्टों का प्रकटन न करना गलत प्रकटन था या इससे प्रक्रिया दूषित हो गईयह मानते हुए कि पूँजी कटौती के संदर्भ में विधि में ऐसे प्रकटन की मांग नहीं की गई है। 
  • आगे यह भी कहा गया कि पूँजी कटौती की कार्यवाही के दौरान किये गए विशेषज्ञ शेयर मूल्यांकन मेंसामान्यत: न्यायालयों या अधिकरणों द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहियेजब तक कि यह साबित न हो जाए कि मूल्यांकन स्पष्ट रूप से गलतपक्षपातपूर्ण या अवैध है - इनमें से कोई भी बात वर्तमान मामले में साबित नहीं हुई। 
  • तदनुसारसभी अपीलें खारिज कर दी गईं। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66 क्या है? 

धारा 66 — शेयर पूँजी में कमी 

पूँजी को कौन कम कर सकता है? 

  • केवल शेयर पूँजी वाली कंपनियाँया प्रत्याभूति द्वारा सीमित कंपनियाँ ही मान्य हैं। 
  • इसके लिये विशेष प्रस्तावऔरअधिकरण (NCLT) की पुष्टिआवश्यक है। 

पूँजी को कैसे कम किया जा सकता है? 

  • अवैतनिक शेयर पूँजी पर दायित्त्व को समाप्त करना/कम करना। 
  • खोई हुई या परिसंपत्तियों द्वारा अप्रतिनिधित्वित भुगतानित पूँजी को रद्द करें। 
  • कंपनी की आवश्यकताओं से अधिक चुकाई गई पूँजी का संदाय करें। 
  • प्रतिबंध:यदि कंपनी जमा राशि की वापसी या उस पर ब्याज के संदाय में बकाया है तो कटौती नहीं की जा सकती।  

अधिकरण प्रक्रिया 

  • अधिकरण केंद्र सरकाररजिस्ट्रार, SEBI (सूचीबद्ध कंपनियों) और लेनदारों को अधिसूचित करता है। 
  • लेनदारों को आपत्ति दर्ज कराने के लिये 3 मास का समय मिलता हैमौन का अर्थ है कोई आपत्ति नहीं मानी जाएगी। 
  • अधिकरण कमी की पुष्टि तभी करता है जब सभी लेनदारों के ऋण चुका दिये गए होंसुरक्षित कर दिये गए हों या उनकी सहमति प्राप्त कर ली गई हो। 
  • मंजूरी देने से पहले धारा 133 के अधीन लेखांकन मानकों के अनुपालन की पुष्टि करने वालालेखा परीक्षक का प्रमाण पत्र अनिवार्य है। 

पुष्टि के बाद के दायित्त्व: 

  • कंपनी को अधिकरण के आदेश को निर्देशानुसार प्रकाशित करना होगा। 
  • आदेश की प्रमाणित प्रति और अनुमोदित कार्यवाही विवरण की प्रति 30 दिनोंके भीतर रजिस्ट्रार के पास जमा करनी होगी। 
  • रजिस्ट्रार इसका रजिस्ट्रीकरण करता है और प्रमाण पत्र जारी करता है। 

सदस्यों का संरक्षण: 

  • किसी भी सदस्य (भूतपूर्व या वर्तमान) पर संदाय की गई राशि और घटे हुए शेयर मूल्य के बीच के अंतर से अधिक की कोई देनदारी नहीं होगी। 

लेनदारों का संरक्षण (लोपित लेनदार) 

  • यदि किसी लेनदार का नाम अनजाने में लेनदारों की सूची से छूट जाता है और कंपनी बाद में संदाय करने में विफल हो जाती हैतो रजिस्ट्रीकरण तिथि तक प्रत्येक सदस्य अपनी समापन अंशदान सीमा तक अंशदान करने के लिये उत्तरदायी होगा। 
  • यदि कंपनी का परिसमापन किया जाता है तो अधिकरण अंशदान सूची का निपटारा कर सकता है और वसूली के लिये आह्वान लागू कर सकता है। 

शास्ति: 

  • जो अधिकारी लेनदारों के नाम छुपाते हैंऋण राशि को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैंया ऐसे कृत्यों में सहायता करते हैंवेधारा 447 (कपट) के अधीन उत्तरदायी हैं। 

अपवर्जन: 

  • धारा 68 के अधीन प्रतिभूतियों की वापसी खरीद (buyback) पर यह लागूनहींहोता है।