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आपराधिक कानून
दिल्ली के मुख्यमंत्री का मानहानि मामला
« »22-Mar-2024
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
परिचय:
हाल के विधिक घटनाक्रम में, उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के मुख्यमंत्री (अपीलकर्त्ता) के विरुद्ध मानहानि के मामले की प्रगति को रोकने के लिये हस्तक्षेप किया। अरविंद केजरीवाल बनाम राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एवं अन्य (2024) शीर्षक वाला मामला, अपीलकर्त्ता द्वारा एक राजनीतिक दल के IT सेल (cell) की आलोचना करने वाले यूट्यूब वीडियो को रीट्वीट करने के इर्द-गिर्द घूमता है।
मामले की पृष्ठभूमि क्या है?
- अपीलकर्त्ता को वर्ष 2018 में YouTuber द्वारा पोस्ट किये गए एक वीडियो को रीट्वीट करने के लिये आपराधिक मानहानि के मामले का सामना करना पड़ा।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को जारी किये गए समन को बरकरार रखते हुए कहा कि मानहानिकारक आरोप का प्रत्येक रीट्वीट आमतौर पर भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 499 के तहत 'प्रकाशन' माना जाएगा।
- अपीलकर्त्ता ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि रीट्वीट करने का अर्थ ज़रूरी नहीं कि समर्थन करना ही हो।
भारत में मानहानि का कानून क्या है?
भारत में मानहानि सिविल दोष और दाण्डिक अपराध दोनों हो सकता है।
- सिविल मानहानि:
- सिविल मानहानि किसी के बारे में मिथ्या कथन देने का कार्य है जिससे उसकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची है।
- यह प्रभावित पक्षकार को मिथ्या कथन देने वाले व्यक्ति पर सिविल न्यायालय में क्षति के लिये मुकदमा करने की अनुमति देता है।
- सिविल मानहानि का उद्देश्य पीड़ित को उसकी प्रतिष्ठा को हुई किसी भी क्षति की भरपाई करना है।
- आपराधिक मानहानि:
- आपराधिक मानहानि एक दाण्डिक अपराध है जिसमें कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी और की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने के आशय से उसके बारे में मिथ्या कथन देता है।
- यह मिथ्या कथन किसी तीसरे पक्ष को प्रकाशित या सूचित किया जाना चाहिये। IPC की धारा 499 के तहत आपराधिक मानहानि को दाण्डिक अपराध माना जाता है।
- आपराधिक मानहानि की सज़ा में IPC की धारा 500 के तहत निर्धारित दो वर्ष का कारावास और/या ज़ुर्माना शामिल हो सकता है।
स्वतंत्र भाषण और विधिक पूर्व-निर्णय क्या हैं?
- संवैधानिक स्थिति:
- जबकि अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, अनुच्छेद 19(2) मानहानि सहित उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
- सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016):
- उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आपराधिक मानहानि का कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असंगत प्रतिबंध नहीं हैं।
- यह तर्क दिया गया कि प्रतिष्ठा की रक्षा करना एक मौलिक अधिकार है जो लोक हित की सेवा करता है, तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा पारस्परिक समन्वय बनाए रखने के लिये स्वतंत्र भाषण पर उचित प्रतिबंध आवश्यक हैं।
- कौशल किशोर बनाम भारत संघ (2023):
- इस मामले में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित गरिमा के अधिकार के बीच संघर्ष को संबोधित किया।
- न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को संतुलित करने और आधुनिक समाज में इन अधिकारों की विकसित होती समझ को संबोधित करने के महत्त्व पर ज़ोर दिया।
- बहुमत के निर्णय में कहा गया कि हालाँकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे केवल किसी व्यक्ति की गरिमा की रक्षा के लिये कम नहीं किया जा सकता है।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015):
- उच्चतम न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के कारण सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT अधिनियम) की धारा 66A को रद्द कर दिया।
रीट्वीट और मानहानि में क्या संबंध है?
- कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री को रीट्वीट करना मानहानि का मामला बन सकता है, क्योंकि इसमें मानहानिकारक कथनों को व्यापक स्तर पर जनता तक पहुँचाना शामिल है।
- जबकि ऑनलाइन मानहानि IPC की धारा 499 के तहत आती है, IT अधिनियम की धारा 69 ऐसी सामग्री को हटाने की अनुमति देती है।
IT अधिनियम की धारा 69 क्या है?इसमें किसी भी कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से किसी भी सूचना के अवरोधन या निगरानी या डिक्रिप्शन के लिये निर्देश जारी करने की शक्ति शामिल है।
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निष्कर्ष:
मानहानि के मामले में उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप स्वतंत्र अभिव्यक्ति और प्रतिष्ठा की क्षति के बीच नाज़ुक संतुलन को रेखांकित करता है। जबकि व्यक्तियों को, विशेषकर जो प्रभावशाली पदों पर बैठे हैं, स्वयं को, स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करना तथा ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिये।