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वाणिज्यिक विधि

रियल एस्टेट में दिवाला दुविधा: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के अधीन परियोजना पूर्णता बनाम लेनदारों के अधिकार

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 20-Jan-2026

स्रोत:द इंडियन एक्सप्रेस  

परिचय 

हाल ही मेंउच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय दिया जिसमें स्पष्ट किया गया कि परियोजना पूर्ण होने का चरण दिवाला की कार्यवाही को रोक नहीं सकता। एलिग्ना को-ऑप. हाउसिंग एंड कमर्शियल सोसाइटी लिमिटेड बनाम एडलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (2025) के मामलेमें न्यायमूर्ति जे.बीपारदीवाला और आर. महादेवन के निर्णय मेंदो महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान किया गया: 

  • क्या बिल्डर पर्याप्त निर्माण कार्य पूरा होने का दावा करके दिवाला से बच सकते हैं? 
  • क्या हाउसिंग सोसायटी इस प्रक्रिया को रोकने के लिये हस्तक्षेप कर सकती हैं? 

यह मामला अहमदाबाद स्थित "तकशशिला एलेग्ना" परियोजना से जुड़ा थाजहाँ डेवलपर तकशशिला हाइट्स ने 70 करोड़ रुपए का संदाय नहीं किया था। एडलवाइस ए.आर.सी. द्वारा दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा के अधीन दिवाला याचिका दायर करने के बादराष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने परियोजना की व्यवहार्यता का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दियाकिंतु राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ने इस निर्णय को पलट दिया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

उच्चतम न्यायालय का निर्णय: 

  • न्यायालय ने “पर्याप्त पूर्णता” के प्रतिरक्षण को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि जैसे ही ऋण और व्यतिक्रम स्थापित हो जाता हैदिवाला कार्यवाही में स्वीकृति अनिवार्य हो जाती है और इसमें किसी प्रकार के विवेकाधीन विचार की कोई गुंजाइश नहीं रहती।  
  • न्यायमूर्ति महादेवन ने इस बात पर बल दिया कि धारा 7(5)(क) की जांच केवल ऋण और व्यतिक्रम का निर्धारण करने तक ही सीमित है। परियोजना की पूर्णताचल रहे संचालन या अपेक्षित प्राप्य राशि सांविधिक जनादेश के दायरे से बाहर एवं अप्रासंगिक हैं 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वित्तीय स्थिति का आकलन करना लेनदारों की समिति (CoC) का काम हैन कि अधिकरणों का। लेनदारों की समिति की वाणिज्यिक बुद्धिमत्ता सर्वोपरि है और व्यवहार्यता संबंधी प्रश्न उसकी अधिकारिता में आते हैंन कि प्रारंभिक चरण में। 
  • आवास समितियों के हस्तक्षेप के संबंध मेंन्यायालय ने व्यक्तिगत गृह खरीदारों (दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के अधीन वित्तीय लेनदार) और मेंटेनेंस समितियों के बीच अंतर स्पष्ट किया। समितियाँ अलग-अलग संस्थाएँ हैं और जब तक वे स्वयं धन प्रदान नहीं करतींतब तक वे वित्तीय लेनदार का दर्जा प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकतीं। धारा की कार्यवाही स्वीकृति के समय द्विपक्षीय होती है—समितियों को अनुमति देने से बाधा उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाएगी।  
  • यद्यपि न्यायालय ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के प्रावधानों का कठोर अनुपालन सुनिश्चित कियातथापि उसने लेनदारों की समिति की पारदर्शिता को अनिवार्य ठहराया—असाधारण निर्णयों के लिये लिखित कारण देना आवश्यक होगा तथा सूचना ज्ञापन में सभी आवंटियों का समग्र एवं पूर्ण प्रकटीकरण किया जाना चाहिये 

राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) की स्थिति 

  • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने परियोजना की व्यवहार्यता और पर्याप्त पूर्णता का हवाला देते हुए एडलवाइस की याचिका खारिज कर दीयह तर्क देते हुए कि दिवाला कार्यवाही से गृह-खरीदारों को क्षति पहुँचेगी। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ने उक्त आदेश को पलटते हुए दिवाला कार्यवाही के प्रारंभ का निदेश दिया तथा आवासीय सोसाइटी के हस्तक्षेप आवेदन को अस्वीकार कर दिया।  

घटनाओं का क्रम 

तिथि 

घटना 

2020 से पूर्व 

तक्षशिला हाइट्स (Takshashila Heights) ने परियोजना का विकास कियाजिसके लिये लगभग ₹70 करोड़ का ऋण लिया गया। 

2020-2021 

डेवलपर द्वारा संदाय में व्यतिक्रम कियाखाता NPA घोषित हुआतत्पश्चात ऋण को एडलवाइस के पक्ष में समनुदेशित कर दिया गया।  

2022 

एडलवाइस ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा के अंतर्गत राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया। 

2023 

राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने याचिका खारिज कीएडलवाइस ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) में अपील की। 

2024 

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ने दिवाला कार्यवाही प्रारंभ करने का आदेश पारित कियाआवासीय सोसाइटी की हस्तक्षेप याचिका अस्वीकार की गईआदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपीलें दायर की गईं। 

16 जनवरी, 2026 

उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण के आदेश की पुष्टि करते हुए दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।  

 दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 क्या है? 

बारे में: 

  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 परिसंपत्ति मूल्य को अधिकतम करने के लिये कॉरपोरेट संस्थाओंभागीदारी संस्थाओं और व्यक्तियों के लिये पुनर्गठन और दिवाला समाधान संबंधी विधियों को समयबद्ध तरीके से समेकित करता है। 
  • यह वित्तीय संकट की शीघ्र पहचान के लिये एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है और हितधारकों के हितों को संतुलित करता है। 

प्रमुख उपबंध : 

  • धारा 7:यह उपबंध वित्तीय लेनदारों को व्यतिक्रम होने की स्थिति में कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) प्रारंभ करने का अधिकार प्रदान करता है। 
  • लेनदारों की समिति (CoC):वित्तीय लेनदार सामूहिक रूप से 66% मतदान सीमा के साथ देनदार के भाग्य का निर्णय करते हैं।  
  • समयबद्ध प्रक्रिया:कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया को 180 दिनों के भीतर पूरा करना होगा (जिसे 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)यदि कोई समाधान नहीं निकलता है तो अनिवार्य परिसमापन।  
  • गृह खरीदार वित्तीय लेनदार के रूप में: 2018 के संशोधन ने अचल संपत्ति (रियल एस्टेटआवंटियों को वित्तीय लेनदार के रूप में वर्गीकृत कियाजिसमें लेनदारों की समिति का प्रतिनिधित्व सम्मिलित है। 

दिवाला और शोधन अक्षमता से संबंधित अन्य निर्णय: 

  • विदर्भ इंडस्ट्रीज पावर लिमिटेड बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड (2022): 
    • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया दिया कि राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण के पास धारा के अधीन  दायर आवेदनों को खारिज करने का अवशिष्ट विवेकाधिकार है। एलेग्ना ने स्पष्ट किया कि यह एक अपवाद हैसामान्य नियम नहीं। 
  • स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2019) : 
    • उच्चतम न्यायालय ने वित्तीय लेनदारों की प्रधानता सहित दिवाला और शोधन अक्षमता की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा। 
  • पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2019): 
    • न्यायालय ने घर खरीदारों की वित्तीय लेनदार स्थिति को बरकरार रखा। 
  • एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड के लेनदारों की समिति बनाम सतीश कुमार गुप्ता (2019): 
    • यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें कहा गया है कि लेनदारों की समिति की वाणिज्यिक बुद्धिमत्ता सर्वोपरि है।  

निष्कर्ष 

जनवरी 2026 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने स्पष्ट रूप से पुष्टि की कि दिवाला कार्यवाही त्वरित और निष्पक्ष होनी चाहियेऔर स्वीकृति के समय व्यवहार्यता आकलन से मुक्त होनी चाहिये। पर्याप्त पूर्णता की प्रतिरक्षा को खारिज करते हुए और यह स्पष्ट करते हुए कि आवास समितियां हस्तक्षेप नहीं कर सकतींन्यायालय ने सांविधिक संरचना को सुदृढ़ किया और अनिवार्य लेनदारों की समिति पारदर्शिता के माध्यम से गृह खरीदारों की सुरक्षा सुनिश्चित की। 

रियल एस्टेट के संदर्भ मेंसंदेश स्पष्ट है: निर्माण कार्य पूरा होने की स्थिति डेवलपर्स को जवाबदेही से नहीं बचा सकती। दिवाला विधि के संदर्भ मेंयह स्पष्ट करता है कि वाणिज्यिक बुद्धिमत्ता लेनदारों के पास हैन कि न्यायालयों के पाससाथ ही यह सुनिश्चित करता है कि वसूली और गृह खरीदार संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने वाले निर्णय तर्कसंगत और पारदर्शी हों।