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आपराधिक कानून
ज्योति प्रकाश राय उर्फ ज्योति प्रकाश बनाम बिहार राज्य (2008)
«20-Jan-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय किशोर न्याय मामलों में आयु अवधारण के महत्त्वपूर्ण विवाद्यक और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की उन मामलों पर प्रयोज्यता को संबोधित करता है जो अधिनियम के लागू होने के समय लंबित थे।
- यह निर्णय न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा और न्यायमूर्ति वी.एस. सिरपुरकर की पीठ द्वारा 4 मार्च, 2008 को दिया गया था।
- यह मामला हत्या के एक मामले से संबंधित दाण्डिक अपील से संबंधित था, जिसमें अपीलकर्त्ता ने दावा किया था कि अपराध करते समय वह अवयस्क था।
तथ्य
- अपीलकर्त्ता पर 12 मई, 2000 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अधीन एक सहपाठी की कई बार चाकू मारकर हत्या करने का आरोप लगाया गया था।
- माननीय मजिस्ट्रेट ने घटना के दिन अपीलकर्त्ता की आयु लगभग 17 वर्ष अनुमानित की।
- अपराध के समय, किशोर न्याय अधिनियम, 1986 लागू था, जिसमें किशोर को 16 वर्ष से कम आयु के लड़के के रूप में परिभाषित किया गया था।
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 1 अप्रैल, 2001 को लागू हुआ, जिससे लड़कों और लड़कियों दोनों के लिये किशोर अवस्था की आयु बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई।
- अपीलकर्त्ता की आयु अवधारित करने के लिये दो चिकित्सा बोर्डों का गठन किया गया था। पहले बोर्ड ने 24 अप्रैल, 2001 को उसकी परीक्षा की और उसकी आयु 18-19 वर्ष के बीच बताई। दूसरे बोर्ड ने 29 जून, 2001 को भी यही राय दी।
- अपीलकर्त्ता ने यह साबित करने के लिये स्कूल प्रमाण पत्र और कुंडली सहित दस्तावेज़ प्रस्तुत किये कि वह अवयस्क है, परंतु ये दस्तावेज़ कूटरचित और मनगढ़ंत पाए गए, जिसके कारण संस्थान के प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या अपीलकर्त्ता 1 अप्रैल, 2001 को, जब किशिर न्याय अधिनियम, 2000 लागू हुआ था, उस समय 18 वर्ष से कम आयु का था, जिससे वह नए अधिनियम के अधीन संरक्षण का हकदार हो जाता है?
- जब मेडिकल बोर्ड एक निश्चित आयु के बजाय एक सीमा (18-19 वर्ष) प्रदान करते हैं, तो आयु की गणना करने की उचित विधि क्या है?
- क्या किशोर न्याय विधि के लाभकारी स्वरूप को देखते हुए, चिकित्सा बोर्डों द्वारा अवधारित न्यूनतम आयु को अभियुक्त के पक्ष में अपनाया जाना चाहिये?
- उम्र अवधारित करने में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को कितना साक्ष्यिक महत्त्व दिया जाना चाहिये, विशेषकर तब जब दस्तावेज़ी साक्ष्य मनगढ़ंत पाए जाते हैं?
- क्या किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 20 के अंतर्गत संक्रमणकालीन प्रावधान अपीलकर्त्ता के मामले पर लागू होंगे?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने माना कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 निस्संदेह एक हितकारी विधि है, किंतु इसके सिद्धांत केवल संविधि के निर्वचन पर लागू होते हैं, न कि इस तथ्यात्मक प्रश्न को अवधारित करने पर कि कोई व्यक्ति किशोर है या नहीं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अपराधी किशोर था या नहीं, यह मूलतः एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका अवधारण पक्षकारों द्वारा अभिलेख पर प्रस्तुत की गई सामग्री के आधार पर किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने दोहराया कि आयु अवधारण करने वाली चिकित्सा रिपोर्टों को न्यायालयों या चिकित्सा वैज्ञानिकों द्वारा कभी भी निश्चायक नहीं माना गया है, क्योंकि ऑसिफिकेशन (अस्थि निर्माण) या अन्य परीक्षाओं के माध्यम से एक निश्चित आयु के बाद सटीक आयु अवधारण करना मुश्किल हो जाता है।
- न्यायालय ने कहा कि अनेक निर्णयों में यह कहा गया है कि डॉक्टरों द्वारा अवधारित आयु में दोनों ओर दो वर्ष की छूट दी जानी चाहिये।
- न्यायालय ने पाया कि जहाँ दो चिकित्सा बोर्डों ने अलग-अलग तिथियों पर अपीलकर्त्ता की परीक्षा की और समान राय (18-19 वर्ष की आयु के बीच) पर पहुँचे, जिसके परिणामस्वरूप दो अलग-अलग संभावित निष्कर्ष निकले, वहाँ उचित दृष्टिकोण औसत आयु अपनाने का होगा।
- न्यायालय ने प्रताप सिंह बनाम झारखंड राज्य (संविधान पीठ) के मामले का हवाला देते हुए इस बात पर बल दिया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2000 केवल उन्हीं लंबित मामलों पर लागू होगा, जिनमें संबंधित व्यक्ति ने 1 अप्रैल, 2001 तक 18 वर्ष की आयु पूर्ण न की हो।
- न्यायालय ने यह भी अवलोकन किया कि आयु निर्धारण में विभिन्न कारकों पर समग्र रूप से विचार आवश्यक है, तथा विद्यालय रजिस्टर की प्रविष्टियों का साक्ष्यमूल्य सीमित होता है, जब तक यह स्पष्ट न हो कि आयु किस आधार पर दर्ज की गई थी।
- न्यायालय ने पाया कि दोनों मेडिकल बोर्ड रिपोर्टों पर औसत विधि लागू करने पर, 1 अप्रैल, 2001 को अपीलकर्त्ता की आयु 18 वर्ष से अधिक होगी।
निष्कर्ष
- न्यायालय ने अपील को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने अपीलकर्त्ता के अवयस्क होने के दावे में कोई दम नहीं पाया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि कई कारकों के आधार पर - जिसमें कूटरचित दस्तावेज़ी साक्ष्य और दो सुसंगत चिकित्सा बोर्ड रिपोर्ट सम्मिलित हैं – अधीनस्थ न्यायालयों ने सही ढंग से निर्धारित किया कि अपीलकर्त्ता 1 अप्रैल, 2001 को 18 वर्ष से अधिक आयु का था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि उसने औसत विधि का प्रयोग केवल विशिष्ट मामले के लिये किया था और आयु अवधारण के संबंध में विधि का कोई सामान्य सिद्धांत स्थापित करने का उसका कोई आशय नहीं था।
- न्यायालय ने इस बात को बरकरार रखा कि आयु का अवधारण सभी उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और पूर्व के न्यायालय के आदेशों के व्यापक मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिये, जिसमें साक्ष्य अधिनियम की धारा 35 के अधीन सुसंगत साक्ष्य मानकों को लागू किया जाना चाहिये।